( मोहन काल: तीर्थ परिक्रमा से ‘जल राष्ट्रवाद’ तक )..(गंगा दशहरा पर मां शिप्रा, मोहन सरकार और हिंदुत्व की नई सांस्कृतिक राजनीति...)....FAILAAN... (सवाल दर सवाल), (राकेश अग्निहोत्री)

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( मोहन काल: तीर्थ परिक्रमा से ‘जल राष्ट्रवाद’ तक )..(गंगा दशहरा पर मां शिप्रा, मोहन सरकार और हिंदुत्व की नई सांस्कृतिक राजनीति...)....FAILAAN... (सवाल दर सवाल), (राकेश अग्निहोत्री)

गंगा दशहरा पर उज्जैन में मां शिप्रा को 300 फीट चुनरी अर्पित करने जा रहे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं बन रहे, बल्कि वे मध्यप्रदेश की राजनीति, संस्कृति और हिंदुत्व की नई वैचारिक धारा के अब वो जनता की नजर में सार्वजनिक ब्रांड एंबेसडर के रूप में सामने आ रहे हैं...उज्जैन में 25-26 मई को आयोजित “शिप्रा तीर्थ परिक्रमा” और भोपाल में 27 मई से 2 जून तक होने वाला “सदानीरा समागम” केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हैं, सियासत की नजर से देखें तो यह मोहन सरकार की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं जिसमें धर्म, जल संरक्षण, लोक संस्कृति, सनातन परंपरा और वैश्विक विमर्श को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश दिखाई दे रही है...प्रदेश की राजनीति में संभवतः यह पहला अवसर है जब किसी सरकार ने नदी, तालाब, जल संरचनाओं और धार्मिक चेतना को इतने बड़े वैचारिक और प्रशासनिक अभियान में बदला है... “जल गंगा संवर्धन अभियान” अब सरकारी योजना की सीमा पार कर “जनअभियान” बन चुका है... सरकार के दावों पर यकीन करें तो 1 लाख 77 हजार से अधिक जल संरक्षण कार्यों का पूरा होना केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का हिस्सा है जिसमें भाजपा यह बताना चाहती है कि विकास और धर्म अब अलग-अलग विषय नहीं हैं... यानि मोहन सरकार का नया मॉडल ,विकास,धर्म ,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद... के आगे बढ़ रहा है.. ✅✅✅ डॉ. मोहन यादव लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि उनकी राजनीति केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की राजनीति है...उज्जैन, महाकाल, विक्रमादित्य, शिप्रा, गंगा दशहरा और पंचमहाभूत जैसे प्रतीकों को जिस प्रकार एक साथ जोड़ा जा रहा है, वह भाजपा के पारंपरिक हिंदुत्व एजेंडे का नया संस्करण दिखाई देता है...यदि शिवराज सिंह चौहान के दौर में सामाजिक सरोकारों से जोड़कर “जनकल्याण” भाजपा की पहचान था, तो डॉक्टर मोहन यादव उस पहचान में “सभ्यता और सांस्कृतिक गौरव” का नया अध्याय जोड़ते दिख रहे हैं...यह प्रयोग केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश को “सनातन सांस्कृतिक राजधानी” के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा का संकेत है... यही कारण है कि मुख्यमंत्री स्वयं इस अभियान के केंद्र में हैं...मां शिप्रा को चुनरी अर्पित करना केवल धार्मिक भावनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सरकार स्वयं नदी को “मां” मानती है और जल संरक्षण को आस्था से जोड़ रही है... (विक्रमादित्य शोधपीठ : सांस्कृतिक वैचारिकी का नया केंद्र...) जल गंगा संवर्धन इस पूरे अभियान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है “महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ”... अब तक शोध और सांस्कृतिक अध्ययन तक सीमित दिखने वाली यह संस्था मोहन सरकार में वैचारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का सक्रिय केंद्र बनती जा रही है... करने के लिए बहुत कुछ मैदान साफ.. मोदी शाह योगी जो हिंदुत्व के एजेंट के पोस्टर बॉय इंदौर में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को एक नई पहचान देने के लिए उनके संस्कृति सलाहकार और शोधपीठ के निदेशक श्रीराम तिवारी ने जिस प्रकार “शिप्रा तीर्थ परिक्रमा” और “सदानीरा समागम” को व्यापक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया है, उससे स्पष्ट है कि सरकार केवल आयोजन नहीं कर रही, बल्कि एक वैचारिक वातावरण तैयार कर रही है... विक्रमादित्य शोधपीठ अब केवल इतिहास का अध्ययन करने वाली संस्था नहीं रह गई, बल्कि यह “भारतीय ज्ञान परंपरा”, “सनातन सभ्यता”, “जल संस्कृति”, “लोक तीर्थ”, “पंचमहाभूत” और “भारतीय पर्यावरण दृष्टि” को केंद्र में रखकर नई विमर्शधारा गढ़ रही है... राजनीतिक रूप से देखें तो यह भाजपा और संघ की उस वैचारिक लाइन का विस्तार है जिसमें भारत की प्राचीन परंपराओं को आधुनिक नीतियों से जोड़ा जा रहा है...यानी जल संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि “धर्म” और “राष्ट्र चेतना” का विषय भी है... (उज्जैन को नई पहचान देने की तैयारी...) मोहन सरकार उज्जैन को केवल धार्मिक शहर नहीं रहने देना चाहती...महाकाल लोक के बाद अब सरकार शिप्रा, विक्रमादित्य और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से उज्जैन को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक-आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में बढ़ रही है...शिप्रा तीर्थ परिक्रमा का रूट भी प्रतीकात्मक है... रामघाट से लेकर नृसिंहघाट, मंगलनाथ, सांदीपनि आश्रम, गढ़कालिका और सिद्धवट तक की यात्रा उज्जैन की आध्यात्मिक विरासत को पुनः जीवंत करने का प्रयास है...यह केवल धार्मिक पर्यटन नहीं, बल्कि “सिविलाइज़ेशनल नैरेटिव” का निर्माण है... भाजपा खासतौर से मोहन काल में मुख्यमंत्री यादव यह संदेश देना चाहते है कि उज्जैन केवल मध्यप्रदेश का शहर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की धुरी है... इसके पीछे संघ की सोच और एक बड़ी टीम लंबी एक्सरसाइज करती आ रही है.. इस बार इसीलिए इस आयोजन में हरिकथा, भजन, लोकगायन, भारतीय नौसेना बैंड, मैथिली ठाकुर जैसे लोकप्रिय चेहरे और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को जोड़ा गया है...सरकार समझती है कि आधुनिक दौर में संस्कृति को केवल शास्त्रों से नहीं, बल्कि जनभागीदारी और जनमाध्यमों से जीवंत बनाया जाता है... (“जल” को हिंदुत्व की नई राजनीतिक भाषा बनाना...) भाजपा लंबे समय से राम मंदिर, काशी, महाकाल और सनातन प्रतीकों के माध्यम से सांस्कृतिक राजनीति करती रही है...लेकिन मोहन सरकार इस राजनीति में “जल” को नया वैचारिक आधार बना रही है...भारतीय परंपरा में नदियां केवल जलधारा नहीं, बल्कि देवी स्वरूप मानी जाती हैं...गंगा, नर्मदा, क्षिप्रा, गोदावरी और कावेरी भारतीय धार्मिक मानस का हिस्सा हैं...मोहन सरकार इसी भावनात्मक आधार को आधुनिक जल संरक्षण अभियान से जोड़ रही है... यही कारण है कि “जल गंगा संवर्धन अभियान” केवल तकनीकी परियोजना नहीं दिखता, बल्कि उसमें धार्मिक प्रतीकों का समावेश किया गया है...शिप्रा परिक्रमा, गंगा दशहरा, चुनरी अर्पण और पंचमहाभूत पर विमर्श यह सब मिलकर “आस्था आधारित पर्यावरण राजनीति” का नया मॉडल बना रहे हैं... राजनीतिक दृष्टि से यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भाजपा ग्रामीण, धार्मिक और पर्यावरण चेतना वाले समाज को एक साथ जोड़ने में सफल हो सकती है... बॉक्स हाईलाइट करना (सदानीरा समागम : स्थानीय से वैश्विक तक...) भोपाल में होने वाला “सदानीरा समागम” इस पूरी रणनीति का वैश्विक संस्करण कहा जा सकता है...इसमें नौ देशों के राजनयिक प्रतिनिधियों की भागीदारी, इसरो, टाटा ट्रस्ट, जेएसडब्ल्यू, ओएनजीसी, वेदांता, एचयूएल जैसी संस्थाओं की मौजूदगी और पंचमहाभूत पर विमर्श यह संकेत देता है कि मोहन सरकार “जल संरक्षण” को अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है...यह पहला अवसर है जब मध्यप्रदेश किसी सांस्कृतिक आयोजन के माध्यम से पर्यावरण, जल और भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच पर रखने की कोशिश कर रहा है... इसमें एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है... भाजपा की मोहन सरकार यह दिखाना चाहती है कि भारतीय संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की वैज्ञानिक दृष्टि भी मौजूद है...यानी “सनातन” को आधुनिकता के विरोध में नहीं, बल्कि समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है...संघर्ष भी कम नहीं...हालांकि इस पूरी वैचारिक यात्रा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं...विपक्ष निश्चित रूप से इसे “हिंदुत्व एजेंडा” और “धार्मिक ब्रांडिंग” कहकर सवाल उठाएगा... यह भी पूछा जाएगा कि क्या जल संरक्षण के वास्तविक परिणाम जमीन पर दिखाई देंगे या यह केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रहेगा...प्रदेश में कई नदियां अब भी प्रदूषण, अतिक्रमण और अवैध दोहन की समस्या से जूझ रही हैं...शिप्रा स्वयं वर्षों से जल संकट और प्रदूषण का प्रतीक रही है...ऐसे में मोहन सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह प्रतीकात्मकता को वास्तविक परिणामों में बदले...लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के लिए यह प्रयोग बेहद उपयोगी साबित हो सकता है... क्योंकि इससे सरकार “धर्म”, “पर्यावरण”, “संस्कृति”, “लोकभागीदारी” और “विकास” पांचों को एक साथ जोड़ने में सफल होती दिखाई दे रही है... (कल... आज... और कल का संदेश...) यदि अतीत देखें तो उज्जैन सदियों से भारतीय कालगणना, ज्योतिष, दर्शन और सनातन परंपरा का केंद्र रहा है...आज मोहन सरकार उसी गौरव को आधुनिक राजनीतिक और सांस्कृतिक परियोजना में बदलने की कोशिश कर रही है...और आने वाले समय में यही मॉडल मध्यप्रदेश की नई पहचान बन सकता है...यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार है ..जहां नदी केवल जल नहीं, संस्कृति है...जहां परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, सामाजिक जागरण है...जहां जल संरक्षण केवल सरकारी काम नहीं, जनधर्म है.. शायद यही कारण है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं इस अभियान के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं...वे प्रशासनिक मुखिया से आगे बढ़कर “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” और “जल चेतना” के प्रतीक के रूप में अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ने में जुटे दिखाई दे रहे हैं...उज्जैन की शिप्रा से उठी यह धारा आने वाले समय में मध्यप्रदेश की राजनीति और भाजपा के वैचारिक अभियान दोनों की दिशा तय कर सकती है...

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