फ्री स्कीम और कर्ज के जाल में फंसते भारतीय राज्य
कई राज्यों ने पिछले एक दशक में मुफ्त योजनाओं और सब्सिडी को सत्ता में आने और बने रहने का आसान तरीका बना लिया है। इसका नतीजा यह निकला है कि उनकी वित्तीय स्थिति तेजी से बिगड़ रही है और विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन नहीं बच रहा।
राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और सब्सिडी में खर्च
राज्यों की आय और व्यय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उनकी कमाई का 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन, सब्सिडी और कर्ज पर ब्याज चुकाने जैसे अनिवार्य खर्चों में खत्म हो जाता है। कई राज्यों के पास अपनी कुल आय का सिर्फ 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा ही बचता है जिसे विकास परियोजनाओं और पूंजीगत व्यय पर लगाना होता है।
स्थिति इतनी गंभीर है कि पंजाब जैसे राज्य के पास कुल आय का लगभग 7 प्रतिशत ही ऐसा पैसा बचता है जिसे वह नए कामों में लगा सके। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में भी राजस्व का बड़ा भाग वेतन, पेंशन और अन्य आवश्यक मदों में निकल जाता है, जिससे बुनियादी ढांचे और विकास योजनाओं के लिए बहुत सीमित धन उपलब्ध रहता है।
पंजाब और राजस्थान पर भारी कर्ज का बोझ
पंजाब को इस वित्तीय वर्ष में लगभग 90 हजार करोड़ रुपये का मूलधन चुकाना है। इतने बड़े दायित्व के मुकाबले उसके पास खर्च के लिए उपलब्ध राशि बेहद कम है, इसलिए राज्य को कर्ज चुकाने के लिए भी नया कर्ज लेना पड़ रहा है। अक्टूबर 2025 में पंजाब लगभग 20 हजार करोड़ रुपये का बाजार से कर्ज ले चुका है, लेकिन यह राशि भविष्य की जरूरतों के सामने नाकाफी है।
राजस्थान की स्थिति भी गंभीर है। राज्य सरकार को इस बार करीब 1.50 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का मूलधन चुकाना है। अब तक वह लगभग 32 हजार करोड़ रुपये का नया कर्ज उठा चुकी है, लेकिन शेष बकाया उसकी उधारी की सीमा से भी अधिक है। यानी राजस्थान को पुराने कर्जों की अदायगी के लिए भी आगे और कर्ज लेना पड़ेगा, जिससे कर्ज का चक्र और सख्त होता जाएगा।
बिहार और मध्य प्रदेश में दिवालियेपन का खतरा
मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और बिहार जैसे राज्यों का कुल कर्ज उनकी राज्य की जीडीपी के लगभग एक तिहाई या उससे अधिक के बराबर पहुंच चुका है। इस अनुपात के कारण आगामी वर्षों में मूलधन और ब्याज चुकाने का दबाव और तेज होने की आशंका है।
बिहार के संदर्भ में अनुमान है कि यदि राज्य सरकार अपने सभी चुनावी वादों को पूरा करती है तो इस पर आने वाला बोझ उसके मौजूदा पूंजीगत व्यय का लगभग 25 गुना हो सकता है। ऐसी स्थिति में बिहार के लिए दिवालिया जैसी हालत पैदा हो सकती है, जहां विकास कार्य लगभग ठप हो जाएं और पूरा ध्यान सिर्फ वेतन, पेंशन और कर्ज चुकाने पर केंद्रित रह जाए।
ऊर्जा परियोजनाएं अटकी, विकास योजनाओं पर ब्रेक
कई राज्यों की वित्तीय तंगी का सीधा असर ऊर्जा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर भी दिख रहा है। राजस्थान समेत कई राज्यों में करीब 45 गीगावाट क्षमता की सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं केवल इस वजह से अटकी हुई हैं कि सरकारें बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर करने की स्थिति में नहीं हैं।
ऐसे प्रोजेक्ट न केवल स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य को पीछे धकेल रहे हैं, बल्कि निवेश, रोजगार और औद्योगिक विकास को भी प्रभावित कर रहे हैं। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों पर ब्याज का बोझ उनके शिक्षा बजट से भी अधिक हो चुका है, जबकि मध्य प्रदेश में भी कर्ज तेजी से बढ़ रहा है।
पुरानी योजनाएं बंद न करने से बढ़ रहा बोझ
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और राज्य वित्त मामलों के विशेषज्ञ अजीत केसरी के अनुसार, किसी भी मुफ्त योजना या सब्सिडी की घोषणा से पहले यह देखना जरूरी है कि आय के स्रोत कितने मजबूत हैं और दीर्घकाल में कितना बोझ उठाया जा सकता है। अक्सर नई सरकारें सत्ता में आने पर अपनी योजनाएं तो शुरू करती हैं, लेकिन पुरानी सरकार की योजनाओं को बंद नहीं करतीं।
उनके मुताबिक, सरकारों को डर रहता है कि योजनाएं बंद करने से जनता नाराज हो सकती है, इसलिए वे राजनीतिक जोखिम नहीं लेना चाहतीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि असम सरकार ने पिछली सरकार की कई योजनाएं समाप्त कर दी थीं, जिससे वहां बोझ कुछ कम हुआ। अन्य राज्य भी यदि ऐसी कठोर लेकिन जरूरी नीति अपनाएं तो वित्तीय स्थिति में सुधार की गुंजाइश बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की फ्रीबीज पर कड़ी टिप्पणी
12 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के समय घोषित मुफ्त योजनाओं, यानी फ्रीबीज, पर सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सरकारें लोगों को मुफ्त राशन और बिना काम किए पैसे देकर उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने के बजाय निर्भरता की मानसिकता बढ़ा रही हैं।
बेंच ने टिप्पणी की कि इस तरह की नीतियां समाज में परजीवी मानसिकता को बढ़ा सकती हैं और यह पूछा कि क्या यह बेहतर नहीं होगा कि ऐसे लोगों को कौशल, रोजगार और अवसर देकर देश के विकास की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जाए। न्यायालय ने केंद्र सरकार की चिंताओं को समझने की बात भी कही और संकेत दिया कि टिकाऊ विकास के लिए मुफ्त वितरण की जगह उत्पादक भागीदारी को बढ़ावा देना आवश्यक है।
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बीच राज्यों की चुनौती
इन सबके समानांतर, केंद्र सरकार ने जानकारी दी है कि भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 4.18 ट्रिलियन डॉलर, यानी करीब 374.5 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। अनुमान है कि मौजूदा गति जारी रही तो भारत 2030 तक जर्मनी को भी पीछे छोड़ सकता है।
हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था के विस्तार की यह तस्वीर राज्यों की वित्तीय तंगी से उलट दिखाई देती है। यदि राज्यों के कर्ज और अनियंत्रित मुफ्त योजनाएं इसी तरह बढ़ती रहीं, तो समग्र विकास की संभावनाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
निष्कर्ष: संतुलित नीतियों और कठिन फैसलों की जरूरत
मुफ्त योजनाएं और सब्सिडी अल्पकाल में राजनीतिक लाभ दे सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में वे राज्य की वित्तीय सेहत को कमजोर कर रही हैं। कर्ज के बढ़ते बोझ, सीमित विकास व्यय और अटकी परियोजनाएं संकेत देती हैं कि अब नीति निर्माताओं को कठिन लेकिन जरूरी फैसले लेने होंगे। पुरानी योजनाओं की समीक्षा, लक्षित सब्सिडी, आय बढ़ाने के स्थायी उपाय और फ्रीबीज पर नियंत्रण के बिना राज्यों के लिए वित्तीय स्थिरता और सतत विकास दोनों ही मुश्किल हो सकते हैं।
Amit Pateria