पुतिन भारत पहुंचे S-400, Su-57 और ऊर्जा डील पर नजर

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पुतिन भारत पहुंचे S-400, Su-57 और ऊर्जा डील पर नजर

पुतिन का भारत दौरा: रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक संतुलन पर फोकस

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अपने पहले भारत दौरे पर आ रहे हैं। वे करीब 30 घंटे भारत में रहेंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज शाम उनके सम्मान में एक प्राइवेट डिनर की मेजबानी करेंगे। यह यात्रा भारत-रूस रणनीतिक संबंधों के 25 वर्ष पूरे होने के मौके पर हो रही है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी और पुतिन के बीच हुई रणनीतिक साझेदारी से मानी जाती है।

भारत-रूस समिट और संभावित समझौते

पुतिन इस दौरे के दौरान 23वीं भारत-रूस समिट में भाग लेंगे, जो दोनों देशों के बीच होने वाली वार्षिक शिखर बैठक का हिस्सा है। इस समिट का मुख्य उद्देश्य है कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर के स्तर तक ले जाया जाए। वर्तमान में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 60 अरब डॉलर के आसपास है।

बैठक में ऊर्जा, निवेश, तकनीक, उद्योग, स्पेस, न्यूक्लियर एनर्जी, विज्ञान-तकनीक और पोर्ट डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में नई साझेदारियों पर चर्चा तय मानी जा रही है। तमिलनाडु के कूडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर भी बातचीत होने की संभावना है।

रक्षा सहयोग: S-400, S-500 और Su-57 पर नजर

भारत और रूस के बीच इस दौरे के दौरान रक्षा क्षेत्र के कई अहम मुद्दों पर बातचीत की उम्मीद है। भारत पहले से ही रूस से खरीदे गए S-400 मिसाइल सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी जेट गिराने के लिए महत्वपूर्ण माना गया था। अब भारत S-400 की अतिरिक्त यूनिट्स और उसके उन्नत संस्करण S-500 को खरीदने पर चर्चा कर सकता है, जो लंबी दूरी से आने वाली मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों को भी रोकने में सक्षम माना जाता है।

रूस ने भारत को अपना पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट Su-57 और उसकी तकनीक बिना शर्त उपलब्ध कराने की पेशकश की है। Su-57 को अमेरिका के F-35 के मुकाबले का विमान माना जाता है। रूस का कहना है कि इंजन, रडार, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और आधुनिक हथियारों सहित इसकी तकनीक भारत के साथ साझा की जा सकती है और यदि भारत चाहे तो Su-57 का उत्पादन भारत में ही किया जा सकता है। साथ ही, दो-सीटर Su-57 को लेकर संयुक्त योजना का प्रस्ताव भी दिया गया है।

भारतीय वायुसेना फिलहाल फाइटर जेट्स की कमी का सामना कर रही है और उसके बेड़े में पहले से ही 200 से अधिक रूसी विमान हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड लंबे समय से रूसी विमानों की सर्विसिंग और मरम्मत करती रही है, इसलिए Su-57 जैसे नए जेट की ऑपरेशनल और मेंटेनेंस व्यवस्था भारत में स्थापित करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है।

पनडुब्बी डील पर स्पष्टीकरण

हाल के दिनों में मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि भारत ने पुतिन की यात्रा से पहले रूस के साथ 2 अरब डॉलर की नई परमाणु पनडुब्बी डील फाइनल कर ली है। हालांकि सरकारी एजेंसी PIB फैक्ट चेक ने इन दावों को भ्रामक बताया है। एजेंसी के अनुसार भारत और रूस के बीच कोई नई पनडुब्बी डील साइन नहीं हुई है, बल्कि जिस प्रोग्राम का जिक्र हो रहा है, उसका कॉन्ट्रैक्ट मार्च 2019 में ही हो चुका था। डिलीवरी में देरी के कारण केवल नई टाइमलाइन 2028 तय की गई है।

रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक संतुलन

पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब प्रधानमंत्री मोदी वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत-रूस संबंध सोवियत काल से गहरे रहे हैं और पुतिन ने इस रिश्ते को लगातार प्राथमिकता दी है। दूसरी ओर, भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस की खुलकर आलोचना से बचते हुए बातचीत को ही युद्ध का समाधान बताया है। इस नीति को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के रूप में देखा जाता है, जिसमें भारत न रूस से दूरी बनाना चाहता है, न पश्चिमी देशों को पूरी तरह नाराज करना।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ते तेल की बड़ी मात्रा में खरीद की, जिससे भारत को आर्थिक लाभ हुआ, लेकिन अमेरिका और यूरोप ने इस पर नाराजगी जताई। रिपोर्टों के अनुसार पहले भारत रूस से लगभग 2.5% तेल खरीदता था, जो युद्ध के बाद बढ़कर करीब 35% तक चला गया। बाद में अमेरिकी टैरिफ और दबाव के चलते भारत ने रूसी तेल की खरीद में कमी की। इस पृष्ठभूमि में पुतिन की यात्रा मोदी के लिए कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा मानी जा रही है, जहां भारत को रूस के भरोसेमंद साझेदार की छवि बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापारिक वार्ताओं को भी पटरी पर रखना है।

ऊर्जा, पेमेंट सिस्टम और आर्कटिक प्रोजेक्ट

ऊर्जा सहयोग इस यात्रा का एक और अहम मुद्दा है। रूस भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल बेच रहा है, लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों और वित्तीय प्रतिबंधों के कारण पेमेंट में समय-समय पर दिक्कतें आती रही हैं। दोनों देश ऐसे वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम पर सहमति की कोशिश कर सकते हैं, जिससे द्विपक्षीय व्यापार बिना रुकावट जारी रह सके। इसमें रुपया-रूबल व्यापार, डिजिटल भुगतान व्यवस्था या तीसरे देश के बैंकों के माध्यम से लेनदेन जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा रूस भारत को आर्कटिक क्षेत्र की ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश के अवसर भी दे सकता है, जहां वह बड़े पैमाने पर तेल और गैस के भंडार विकसित कर रहा है। इस क्षेत्र में प्रवेश भारत को ऊर्जा सुरक्षा के दीर्घकालिक विकल्प दे सकता है।

स्किल्ड वर्कर्स और मोबिलिटी पैक्ट

युद्ध के बाद रूस में कई क्षेत्रों में कुशल कामगारों की कमी पैदा हुई है। इसी के मद्देनजर दोनों देशों के बीच एक स्किल डेवलपमेंट और मोबिलिटी पैक्ट पर भी चर्चा हो सकती है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत भारत से लगभग 10 लाख कुशल कर्मचारियों, जैसे तकनीकी विशेषज्ञ, इंजीनियर, मेडिकल स्टाफ और अन्य प्रोफेशनल्स को रूस में रोजगार मिलने की संभावना जताई जा रही है।

भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक उसके मोबिलिटी पैक्ट मुख्यतः जर्मनी और इजराइल जैसे देशों के साथ हैं, जबकि सिविल न्यूक्लियर सहयोग ज्यादातर अमेरिका और फ्रांस के साथ केंद्रित रहा है। रूस के साथ ऐसा समझौता भारतीय कामगारों के लिए नए वैश्विक अवसर खोल सकता है।

हथियार आपूर्ति में बदलता संतुलन

पिछले दो दशकों में भारत के रक्षा आयात में रूस की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार 2000 के दशक में भारत के 70 से 90 प्रतिशत हथियार रूस से आते थे, जो अब घटकर लगभग 36 प्रतिशत रह गए हैं। भारत ने हाल के वर्षों में अमेरिका, फ्रांस और अन्य पश्चिमी देशों से हथियारों की खरीद बढ़ाई है, हालांकि रूस अभी भी सबसे बड़ा रक्षा सप्लायर बना हुआ है, खासकर परमाणु पनडुब्बी, मिसाइल डिफेंस और कुछ विशेष तकनीकों जैसे क्षेत्रों में।

इसके बावजूद भारत और रूस के बीच ‘स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ कायम है, जिसके तहत दोनों देश लंबे समय से रक्षा और तकनीकी सहयोग करते आए हैं। Su-57 जेट, S-400 और संभावित S-500 डील्स इसी रिश्ते की अगली कड़ी मानी जा रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय दबाव और पुतिन की यात्राएं

मार्च 2023 में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) ने यूक्रेन में बच्चों के अपहरण और जबरन डिपोर्टेशन के आरोपों के आधार पर पुतिन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। यह पहली बार था जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी स्थायी सदस्य देश के सर्वोच्च नेता पर ICC ने यह कदम उठाया। इसके बाद पुतिन ने कई अंतरराष्ट्रीय बैठकों में व्यक्तिगत रूप से भाग लेने से परहेज किया और पिछले साल भारत में हुई G20 समिट में भी नहीं आए। उनकी जगह विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने प्रतिनिधित्व किया था।

पुतिन ने आखिरी बार दिसंबर 2021 में संक्षिप्त भारत दौरा किया था, जिसमें मात्र 4 घंटे की यात्रा के दौरान 28 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। वर्तमान दौरे से दोनों देशों को 2030 तक के लिए नए आर्थिक रोडमैप को आगे बढ़ाने की उम्मीद है।

निष्कर्ष: रिश्तों की नई दिशा तय करने वाला दौरा

पुतिन का यह भारत दौरा केवल औपचारिक शिष्टाचार भर नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत-रूस संबंधों की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। एक ओर भारत रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में रूस के साथ गहरे सहयोग को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपने आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को भी मजबूत कर रहा है।

इस पृष्ठभूमि में पुतिन और मोदी की मुलाकात से यह साफ होगा कि दोनों देश रक्षा सौदों, ऊर्जा आपूर्ति, पेमेंट मैकेनिज्म और स्किल्ड वर्कफोर्स के मुद्दों पर किस हद तक आगे बढ़ते हैं। साथ ही, यह दौरा भारत की उस कूटनीति की भी परीक्षा है जिसमें वह रूस के साथ विशेष साझेदारी को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों से रिश्तों में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

L. N. Bhargava