राकेश अग्निहोत्री: चुनाव दर चुनाव बदलते जनमत, महंगाई, बेरोजगारी और ध्रुवीकरण की आक्रामक राजनीति के बीच गठबंधन पॉलिटिक्स की दशा और दिशा का जब मूल्यांकन शुरू हो चुका.. तब बड़ा सियासी संकेत बीजेपी की इंटरनल पॉलिटिक्स से सामने निकल कर आ सकता है.. इसे देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच प्रस्तावित मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार और नितिन नवीन की नई टीम से जोड़कर देखा जा सकता है..ऐसे में पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम टीएमसी नेताओं पर कथित हमलों के आरोप, सड़क पर बढ़ता राजनीतिक तनाव और उसके बाद तेज बयानबाजी सिर्फ एक राज्य की घटना नहीं मानी जा सकती.. यह सवाल अब राष्ट्रीय स्तर पर भी खड़ा हो रहा है कि क्या भारतीय राजनीति धीरे-धीरे जनसंपर्क से ज्यादा जन-टकराव की तरफ बढ़ रही है... क्या राजनीतिक संवाद की जगह राजनीतिक टकराव ले रहा है... और क्या राजनीतिक दल जनता के बदलते मनोविज्ञान को समय रहते समझ पा रहे हैं... लोकतंत्र में विरोध नया नहीं है... नारेबाजी, प्रदर्शन, राजनीतिक गुस्सा और सवाल लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा माने जाते हैं... लेकिन चिंता तब बढ़ती है जब विरोध की प्रकृति आक्रामकता में बदलने लगे... जब राजनीतिक मतभेद सड़कों पर तनाव, व्यक्तिगत हमलों, हिंसक आरोपों और टकराव की घटनाओं में दिखाई देने लगें... तब यह केवल राजनीति नहीं रहती, बल्कि सामाजिक मनोदशा का संकेत भी बन जाती है...पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक संघर्ष और वैचारिक ध्रुवीकरण का केंद्र रहा है... सत्ता परिवर्तन के बाद नई राजनीतिक परिस्थितियों ने वहां की प्रतिस्पर्धा को और तीखा बनाया है... लेकिन बंगाल का यह परिदृश्य देश के दूसरे हिस्सों में भी दिखने वाली एक व्यापक राजनीतिक बेचैनी से जुड़ा नजर आता है... चुनावी जीत और हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप, तीखी बयानबाजी, समर्थकों की आक्रामक प्रतिक्रिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण कई राज्यों में सामान्य होता दिख रहा है... लेकिन इस पूरे परिदृश्य के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि जनता आखिर क्या देख रही है... क्या जनता केवल राजनीतिक लड़ाई में दिलचस्पी रखती है या फिर वह अपने जीवन से जुड़े सवालों के जवाब भी चाहती है... महंगाई का सवाल लगातार लोगों की जिंदगी पर असर डाल रहा है... पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में बदलाव का प्रभाव केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता... परिवहन महंगा होता है... घरेलू उपयोग की वस्तुओं की लागत प्रभावित होती है... फल-सब्जियों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक कीमतों का दबाव आम परिवार के बजट पर दिखाई देता है... मध्यम वर्ग, छोटे व्यापारी और निम्न आय वर्ग पर इसका असर अलग-अलग रूप में महसूस होता है...इसके साथ रोजगार और आर्थिक अवसरों का प्रश्न भी बड़ा राजनीतिक कारक बनता जा रहा है... युवा पीढ़ी—जिसे व्यापक रूप से Gen Z कहा जाता है,राजनीति को पुराने ढर्रे पर नहीं देखती... यह वर्ग सोशल मीडिया से प्रभावित है, तेजी से राय बनाता है और मुद्दों को सीधे जीवन से जोड़कर देखता है... नौकरी, आय, अवसर, महंगाई, शिक्षा और भविष्य की स्थिरता उसके लिए राजनीतिक नारों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं... राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी दल के लिए चुनावी जीत को स्थायी जनसमर्थन मान लेना जोखिम भरा हो सकता है... कई बार जनता बड़े जनादेश देती है, लेकिन समय के साथ वही जनता आर्थिक दबाव, स्थानीय असंतोष, सामाजिक तनाव या अधूरी उम्मीदों के आधार पर अपनी राय बदल देती है... लोकतंत्र में मतदाता स्थायी नहीं होता, उसका मूड परिस्थितियों के साथ बदलता है...यही कारण है कि राजनीतिक दलों के लिए यह समझना जरूरी हो जाता है कि जनता हर समय एक जैसी नहीं रहती... कभी वह राष्ट्रवाद, पहचान, नेतृत्व या वैचारिक मुद्दों के आधार पर मतदान करती है... तो कभी महंगाई, रोजगार, स्थानीय समस्याओं और जीवन स्तर को प्राथमिकता देती है... यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी वास्तविकता भी है... सियासी संकेत साफ हैं... जनता राजनीतिक आक्रामकता को एक सीमा तक देख सकती है, लेकिन अंततः उसकी अपेक्षा समाधान, स्थिरता और जवाबदेही से जुड़ती है... अगर राजनीतिक विमर्श लगातार टकराव और आरोपों तक सीमित होता गया, तो संभव है कि वही जनता किसी समय रोजमर्रा के मुद्दों को केंद्र में रखकर नए राजनीतिक संदेश देने लगे... लोकतंत्र की ताकत अंततः बहस, संवाद, जवाबदेही और जनादेश से बनती है... सड़क का तनाव और राजनीतिक आक्रामकता खबरें बना सकती है... लेकिन जनमत का अंतिम फैसला अक्सर रसोई, रोजगार, जेब और भविष्य की उम्मीदों से तय होता है... सियासत को शायद इसी बदलते संकेत को सबसे ज्यादा गंभीरता से पढ़ने की जरूरत है... बॉक्स (बदलती राजनीति .. जनता और नेताओं के लिए क्या बड़ा संदेश) पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर टकराव, हिंसा और आरोप-प्रत्यारोप के दौर में दिखाई दे रही है... पहले टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी पर दक्षिण सोनारपुर में हमला... फिर 24 घंटे के भीतर टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा हमले का आरोप... इन घटनाओं ने कई बड़े राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं... भाजपा और टीएमसी दोनों अपने-अपने दावे कर रही हैं... लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब लोकतांत्रिक संवाद की जगह सड़क की टकराहट में बदल रही है...यह सिर्फ एक दल या एक राज्य का मामला नहीं है... जब जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में भीड़, गुस्से, पत्थर, धक्का-मुक्की और हिंसक माहौल के बीच घिरने लगें... तो लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है... राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है... लेकिन हिंसक प्रतिक्रिया लोकतंत्र के लिए चेतावनी मानी जाती है... आखिर चिंता क्यों बढ़ रही है... पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा के आरोपों और प्रत्यारोपों का केंद्र रहा है... सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक ध्रुवीकरण और ज्यादा तेज दिख रहा है... चुनाव बाद हिंसा... कार्यकर्ताओं पर हमले... थानों के बाहर प्रदर्शन... नेताओं के काफिलों को घेरना ये घटनाएं केवल खबर नहीं... बल्कि राजनीतिक तापमान का संकेत भी हैं...अगर एक सांसद को सुरक्षा घेरे के बीच हेलमेट पहनाकर निकालना पड़े... या दूसरा सांसद पुलिस स्टेशन के बाहर खुद को असुरक्षित महसूस करे... तो संदेश सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहता... इससे आम नागरिक के मन में भी सवाल उठता है ,जब जनप्रतिनिधि सुरक्षित नहीं दिखते... तब सामान्य कार्यकर्ता या आम जनता कितनी सुरक्षित महसूस करेगी...लोकतंत्र में नेता जनता के बीच जाते हैं... विरोध... नारेबाजी... सवाल... नाराजगी यह सब लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है... लेकिन अगर राजनीतिक मतभेद हिंसा... भीड़ की आक्रामकता और शारीरिक हमले तक पहुंच जाएं... तो यह सभी दलों के लिए खतरे की घंटी है... आज एक दल का नेता निशाना बनता दिखे... कल दूसरा भी उसी स्थिति में हो सकता है...राजनीति में प्रतिस्पर्धा जरूरी है... लेकिन प्रतिशोध की राजनीति माहौल को अस्थिर करती है... चुने हुए जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच सुरक्षित संवाद का माहौल मिलना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है... जनता के गुस्से और राजनीतिक रणनीति के बीच एक रेखा होती है... जब वह रेखा टूटती है... तब व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ता है...सबसे बड़ा सवाल...क्या बंगाल की राजनीति अब “जनसंपर्क” से ज्यादा “जन-टकराव” की तरफ बढ़ रही है... और क्या राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संदेश दे पाएंगे कि लोकतंत्र में विरोध हो सकता है... लेकिन हिंसा नहीं...क्योंकि अंत में लोकतंत्र की ताकत बहस... चुनाव और जनादेश से आती है... सड़क की आक्रामकता से नहीं...
राजनीतिक क्या जनसंपर्क से ज्यादा जन टकराव की तरफ बढ़ रही.. (सवाल दर सवाल )(राकेश अग्निहोत्री)