राज्य सभा:जार्ज और सुमेर बीजेपी के लिए ज़रूरी या मजबूरी..! एमपी का केरल कनेक्शन और सवाल ..आदिवासी चेहरा क्या बदलेगा.. सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री)

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राज्य सभा:जार्ज और सुमेर बीजेपी के लिए ज़रूरी या मजबूरी..! एमपी का केरल कनेक्शन और  सवाल ..आदिवासी चेहरा क्या बदलेगा.. सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री)

(राज्यसभा की दो सीटें, भाजपा का बड़ा गणित और सवाल ) मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस की तीसरी सीट पर है, लेकिन भाजपा के सामने भी कम दिलचस्प चुनौती नहीं है.. पार्टी के कब्जे वाली दो सीटों केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन और आदिवासी चेहरे सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्ति की ओर है.. सवाल सिर्फ यह नहीं कि दोनों रिपीट होंगे या नहीं, बल्कि यह भी कि भाजपा इन सीटों के जरिए 2028 विधानसभा चुनाव, सोशल इंजीनियरिंग, दक्षिण भारत की रणनीति और प्रदेश के भीतर राजनीतिक संतुलन को किस तरह साधना चाहती है.. क्या पार्टी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तरजीह देगी, या मध्य प्रदेश के भीतर प्रतिनिधित्व और असंतोष के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बदलाव का जोखिम उठाएगी? राज्यसभा की ये दो सीटें अब सिर्फ संसदीय प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि भाजपा की भविष्य की राजनीतिक बिसात का हिस्सा बनती दिख रही हैं..जॉर्ज और सुमेर रिपीट या वक्त है बदलाव का.. यह बड़ा सवाल जिसकी अपनी वजह, पार्टी लाइन राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति और मध्य प्रदेश भाजपा की अपेक्षा से जुड़ा है.. भाजपा के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है..राज्यसभा की दो सीटों पर भाजपा का बड़ा सियासी गणित मध्य प्रदेश से राज्यसभा की जिन दो सीटों पर भाजपा का कब्जा है, उनमें एक केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन और दूसरी आदिवासी चेहरे सुमेर सिंह सोलंकी की सीट है.. दोनों का कार्यकाल समाप्ति की ओर है.. लेकिन इस बार सवाल सिर्फ रिपीट होने या न होने का नहीं है.. सवाल भाजपा की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं, सोशल इंजीनियरिंग, दक्षिण भारत रणनीति और 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी से भी जुड़ा दिखाई देता है.. राजनीति में कई फैसले सिर्फ व्यक्ति आधारित नहीं होते, बल्कि उनके पीछे संदेशों की राजनीति छिपी होती है.. यही वजह है कि भाजपा के सामने यह चुनाव सिर्फ उम्मीदवार चयन नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत तय करने का अवसर भी है.. पहला सवाल: जॉर्ज कुरियन भाजपा के लिए अभी भी जरूरी हैं या मजबूरी बन चुके हैं?जॉर्ज कुरियन भाजपा के लिए सिर्फ एक राज्यसभा सांसद नहीं रहे.. वे 90 के दशक से पार्टी से जुड़े संघर्ष के साक्षी वरिष्ठ संगठनात्मक चेहरों में गिने जाते हैं.. ईसाई समाज से आने वाले जॉर्ज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार में मंत्री बनाकर स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी.. खासकर दक्षिण भारत और केरल को लेकर..भाजपा लंबे समय से केरल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है.. हिंदुत्व के एजेंडे के साथ सामाजिक विस्तार और ईसाई समाज में संवाद उसकी प्राथमिकता रहा है.. ऐसे में जॉर्ज कुरियन सिर्फ नेता नहीं, बल्कि भाजपा की दक्षिण भारत रणनीति का प्रतीक चेहरा बनकर सामने आए..यही वजह रही कि भाजपा ने उन्हें सिर्फ मंत्री नहीं बनाया, बल्कि केरल विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग भी किया.. मकसद साफ था.. ईसाई समाज के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना और यह संदेश देना कि भाजपा सिर्फ हिंदुत्व की सीमित राजनीति तक नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक विस्तार की ओर बढ़ रही है..लेकिन यहां सवाल खड़ा होता है.. क्या यह प्रयोग सफल रहा? केरल का प्रतिनिधित्व गोपी मोदी मंत्रिमंडल में कर रहे.. राजनीतिक विश्लेषण और चुनावी चर्चा यही कहती है कि जॉर्ज कुरियन अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए.. चुनाव हार गए, और यह धारणा भी बनी कि उन्हें अपने समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी भाजपा को उम्मीद थी.. ऊपर से कांग्रेस की सत्ता में वापसी ने भाजपा की रणनीति पर नए सवाल खड़े कर दिए..तो क्या इसका मतलब यह कि जॉर्ज कुरियन की उपयोगिता समाप्त हो गई?शायद नहीं.. भाजपा चुनावी हार-जीत के आधार पर ही फैसले नहीं करती.. पार्टी अक्सर प्रतीकात्मक राजनीति और दीर्घकालिक रणनीति को भी महत्व देती है.. यदि केरल और ईसाई समाज में राजनीतिक विस्तार की योजना अभी भी प्राथमिकता में है, तो जॉर्ज कुरियन का रिपीट होना पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.. लेकिन यहीं मध्य प्रदेश का राजनीतिक कोण अलग सवाल खड़ा करता है.. क्या प्रदेश की राज्यसभा सीट का उपयोग फिर राष्ट्रीय प्रयोग के लिए होगा? या इस बार किसी स्थानीय वरिष्ठ चेहरे को मौका देकर प्रदेशीय संतुलन साधने की कोशिश होगी? दूसरा सवाल: सुमेर सिंह सोलंकी रिपीट होंगे या भाजपा नया आदिवासी चेहरा तलाशेगी? सुमेर सिंह सोलंकी भाजपा के आदिवासी चेहरों में गिने जाते हैं.. संगठनात्मक अनुभव रखते हैं और अब प्रदेश महामंत्री की भूमिका में भी सक्रिय हैं.. ऐसे में उनका कार्यकाल समाप्त होना भाजपा के सामने एक अलग प्रकार का समीकरण लेकर आता है..मध्य प्रदेश में आदिवासी राजनीति सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि सत्ता का गणित है..मालवा-निमाड़, महाकौशल और आदिवासी बहुल क्षेत्रों की राजनीति कई बार सरकार का भविष्य तय करती रही है.. भाजपा और कांग्रेस दोनों आदिवासी वोट बैंक को लेकर बेहद संवेदनशील रहती हैं..यहीं सवाल यह है.. क्या भाजपा आदिवासी प्रतिनिधित्व में जोखिम लेना चाहेगी?संभावना कम दिखती है.. क्योंकि पार्टी लंबे समय से आदिवासी नेतृत्व में निवेश करती रही है.. लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है.. यदि भाजपा यह मानती है कि सुमेर सिंह को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर प्रदेश राजनीति में ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है, तो राज्यसभा में किसी नए आदिवासी चेहरे को लाने की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता.. तीसरा सवाल: क्या अब स्वर्ण समाज के प्रतिनिधित्व की बारी है?यहीं से राजनीतिक चर्चा सबसे दिलचस्प हो जाती है..मध्य प्रदेश से भाजपा के राज्यसभा प्रतिनिधित्व को देखें तो महिला नेतृत्व, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग की उपस्थिति मजबूत दिखाई देती है.. यह भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा भी रही है..लेकिन सवाल यह है.. क्या इस प्रक्रिया में स्वर्ण समाज का प्रतिनिधित्व कमजोर महसूस किया जा रहा है?राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मध्य प्रदेश में ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया और अन्य सवर्ण वर्ग अब भी निर्णायक प्रभाव रखते हैं.. कई चुनावी आकलन बताते हैं कि करीब 20 प्रतिशत मतदाता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस वर्ग से जुड़े प्रभाव क्षेत्र में आते हैं.. ऐसे प्रदेश में जहां दो-तीन प्रतिशत वोट का झुकाव सरकार बदल सकता है, वहां प्रतिनिधित्व का सवाल राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन जाता है..बहुत पहले अजय प्रताप सिंह को राज्यसभा भेजना भी इसी संतुलन का हिस्सा माना गया था.. हालांकि बाद में उनका पार्टी से अलग होना भाजपा के लिए सुखद अनुभव नहीं रहा.. अब सवाल यह है.. क्या भाजपा इस बार कोई नया ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य या सवर्ण चेहरा सामने लाएगी? क्या लंबे समय से संगठन में सक्रिय कोई वरिष्ठ नेता दिल्ली भेजा जाएगा? क्या यह 2028 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश होगी?सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं में यह संकेत मिलते रहे हैं कि हाईकमान को भेजी गई संभावित सूची में ऐसे नामों पर विचार हुआ है.. हालांकि अंतिम फैसला हमेशा दिल्ली के राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक जरूरतों को ध्यान में रखकर होता है..सबसे बड़ी दुविधा क्या है?यदि जॉर्ज कुरियन को बदला जाता है तो क्या दक्षिण भारत और ईसाई समाज को दिया गया संदेश कमजोर होगा? यदि सुमेर सिंह को रिपीट नहीं किया जाता तो क्या आदिवासी प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल खड़े होंगे?और यदि दोनों रिपीट हो जाते हैं तो क्या प्रदेश भाजपा में लंबे समय से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे नेताओं की बेचैनी बढ़ेगी? यही वजह है कि राज्यसभा की ये दो सीटें साधारण संसदीय प्रक्रिया नहीं रह गईं.. ये भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन, राजनीतिक प्रबंधन और भविष्य की चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुकी हैं.. क्योंकि भाजपा अच्छी तरह जानती है कि चुनाव सिर्फ नेतृत्व और नारों के भरोसे नहीं जीते जाते.. प्रतिनिधित्व, सम्मान और राजनीतिक संदेश भी उतने ही अहम होते हैं..इसलिए सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है.. जॉर्ज और सुमेर रिपीट.. या बदलाव का वक्त?इसका जवाब चाहे दिल्ली तय करे, लेकिन उसका असर मध्य प्रदेश की राजनीति में दूर तक दिखाई देना तय माना जा रहा है..

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