मोहन मंत्रिमंडल : मानसून सत्र का इंतजार या मोदी के दौरे से पहले और बाद.. दिल्ली में सत्ता और संगठन में मध्य प्रदेश के एडजस्टमेंट पर सवाल ( सवाल दर सवाल ) (राकेश अग्निहोत्री)

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मोहन मंत्रिमंडल : मानसून सत्र का इंतजार या मोदी के दौरे से पहले और बाद.. दिल्ली में सत्ता और संगठन में मध्य प्रदेश के एडजस्टमेंट पर सवाल ( सवाल दर सवाल ) (राकेश अग्निहोत्री)

मध्यप्रदेश की सियासत खासतौर से भाजपा इन दिनों कई परतों वाले राजनीतिक सस्पेंस से घिरी हुई है..सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 6 जून के प्रस्तावित मध्यप्रदेश दौरे से पहले मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करेंगे या फिर इसके बाद नई राजनीतिक तस्वीर सामने आएगी? वह भी तब जब राज्यसभा चुनाव के लिए 8 जून नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख है.. ऐसे में जब मुख्यमंत्री धार्मिक और आध्यात्मिक की यात्रा के बीच दिल्ली उज्जैन के बीच अपनी मौजूदगी दर्द करते हुए अचानक भोपाल से दूरी बनाए हुए तब सत्ता, संगठन और दिल्ली के संकेतों के बीच यह चर्चा अब सिर्फ अटकल नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित का केंद्र बन चुकी है.. बिहार में नीतीश की जगह भाजपा के नए सम्राट चौधरी और पश्चिम बंगाल से लेकर असम में भगवा फहराने के बाद दिल्ली में भाजपा संगठन के भीतर बदलाव, नितिन नवीन की नई टीम की सक्रियता, NDA की बैठकों और केंद्र में संभावित मंत्रिमंडलीय फेरबदल की चर्चाओं के बीच मध्यप्रदेश भाजपा की अगली स्क्रिप्ट को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई है.., सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन मंत्री बनेगा या बाहर जाएगा, बल्कि यह भी कि क्या डॉ. मोहन यादव को अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के अनुरूप टीम बनाने का स्पष्ट अवसर मिलेगा? क्या कुछ वरिष्ठ या विवादों में रहे चेहरों की भूमिका बदलेगी? क्या सरकार और संगठन के बीच नए संतुलन का संकेत सामने आएगा? इसी बीच राजनीतिक उत्सुकता को और बढ़ाने वाली एक अहम तारीख है ..मध्यप्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव प्रक्रिया के तहत नामांकन की अंतिम तिथि भी 8 जून है.. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी के दौरे 6जून से पहले भाजपा राज्यसभा उम्मीदवारों के चेहरे और दावेदार स्पष्ट कर देगी, या फिर दौरे के बाद एक साथ संगठन, मंत्रिमंडल और संसदीय राजनीति की नई पटकथा सामने आएगी?भाजपा की राजनीति में फैसले अक्सर अंतिम समय में और व्यापक संदेश के साथ सामने आते हैं.. इसलिए निगाह अब इस पर है कि पहले कौन-सी गुत्थी सुलझती है, देखना दिलचस्प होगा मोहन मंत्रिमंडल, राज्यसभा चेहरे या फिर दोनों के जरिए भविष्य की भाजपा का बड़ा संकेत क्या निकाल कर सामने आता है.. 2बॉक्स (मोहन देंगे स्थिरता, उपयोगिता और 2028 की तैयारी का संकेत?) यदि डॉ. मोहन यादव मंत्रिमंडल में पुनर्गठन या विस्तार करते हैं, तो इसका पहला राजनीतिक संदेश उनकी नेतृत्व स्वीकार्यता, स्थिरता और “अनिवार्यता से आगे उपयोगिता” पर हाईकमान की मुहर के रूप में पढ़ा जाएगा,.. मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरुआती चरण में उन्हें संतुलन आधारित सत्ता संरचना के भीतर काम करना पड़ा, लेकिन ढाई साल बाद यदि बदलाव होता है तो संकेत यह होगा कि अब नेतृत्व को अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के अनुसार टीम गढ़ने का अधिक अवसर मिल रहा है..यहीं से सियासत की असली बिसात शुरू होती है,कौन मंत्री रहेगा, कौन बाहर जाएगा, किसे संगठन में भूमिका मिलेगी और किन चेहरों को भविष्य की राजनीति के लिए तैयार किया जाएगा..भाजपा में घोषित मानक भले परफॉर्मेंस, संगठन और सामाजिक संतुलन हों, लेकिन मुख्यमंत्री की पसंद-नापसंद भी राजनीतिक संकेत बन जाती है.. ऐसे में कुछ वरिष्ठ मंत्रियों की भूमिका बदल सकती है, विभागीय फेरबदल हो सकता है या कुछ प्रभावशाली चेहरे सीमित भूमिका में भी दिख सकते हैं.. मध्य प्रदेश की सरकार और संगठन ही नहीं राष्ट्रीय नेतृत्व तक दबदबा रखने वाले यदि विवादों में रहे मंत्रियों पर उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर रखने की कार्रवाई होती है, तो यह “चाल, चरित्र और चेहरा” की राजनीतिक पुनर्पुष्टि होगी.. लेकिन राजनीति केवल छवि नहीं, समीकरण भी देखती है; इसलिए हर विवादित चेहरा बाहर होगा, यह तय मानना जल्दबाजी होगी.. दूसरी तरफ संगठनात्मक बदलाव हेमंत खंडेलवाल की सक्रियता, संघ पृष्ठभूमि वाले नीति-निर्धारकों की भूमिका और संगठन महामंत्री स्तर पर संभावित पुनर्संरचना सरकार और संगठन के नए समीकरण की तरफ संकेत दे सकती है.. बड़ा सवाल यही है. क्या यह टीम केवल आज की सत्ता चलाने के लिए बनेगी या 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भाजपा की अगली राजनीतिक पारी की नींव रखेगी? (मोहन काल का अगला अध्याय: और सवाल) मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव सरकार अपने ढाई साल पूरे कर चुकी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 साल पूरे होने पर जश्न मनाने की तैयारी में है..राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ी चर्चा में से एक संभावित मंत्रिमंडल पुनर्गठन को लेकर है.. यह कब होगा... मानसून सत्र के आसपास या फिर निकट भविष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 6 जून की मध्य प्रदेश यात्रा के पहले या बाद.. क्योंकि भाजपा की पटकथा में सिर्फ मंत्रिमंडल का पुनर्गठन ही नहीं बल्कि हेमंत की भाजपा की प्रदेश कार्य समिति और रुके हुए फैसलों के साथ निगम मंडल में नियुक्ति, केंद्र में नितिन नवीन की टीम और मोदी मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. लगभग आधा कार्यकाल पूरा कर आगे बढ़ रही मोहन सरकार में यह केवल कुछ मंत्रियों के विभाग बदलने या नए चेहरों को शामिल करने की औपचारिक कवायद नहीं होगी, बल्कि इसे “मोहन काल” की राजनीतिक दिशा, प्रशासनिक प्राथमिकता और भाजपा की भविष्य की रणनीति के संकेतक के रूप में देखा जाएगा.. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कौन मंत्री रहेगा और कौन जाएगा, बल्कि यह भी है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपनी राजनीतिक पहचान, कार्यशैली और नेतृत्व की छाप किस रूप में स्थापित करना चाहते हैं.. (विरासत में मिली टीम बनाम अपनी नई टीम) डॉ. मोहन यादव जब मुख्यमंत्री बने, तब उनके सामने पहली राजनीतिक वास्तविकता यह थी कि उन्हें तत्कालीन शक्ति-संतुलन, वरिष्ठ नेतृत्व की प्राथमिकताओं और संगठनात्मक समीकरणों के बीच एक ऐसी मंत्रिपरिषद मिली, जिसे काफी हद तक “विरासत की टीम” कहा गया.. उस वक्त दो डिप्टी सीएम समेत दिल्ली से मध्य प्रदेश लौट कुछ वरिष्ठ नेताओं का एडजस्टमेंट जरूरी साबित हुआ..भाजपा की राजनीति में मुख्यमंत्री का चयन जितना केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे का परिणाम होता है, उतना ही मंत्रिमंडल का स्वरूप संगठन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, जातीय समीकरण और सत्ता-संतुलन से प्रभावित रहता है.. ऐसे में ढाई साल बाद जब भी पुनर्गठन होता है तो यह डॉ. मोहन यादव के लिए पहली वास्तविक राजनीतिक परीक्षा भी होगी, जिसमें वे यह संकेत देने की कोशिश करेंगे कि अब सरकार केवल परिस्थितियों से संचालित नहीं, बल्कि उनकी प्राथमिकताओं से निर्देशित होगी.. (क्या परफॉर्मेंस होगी सबसे बड़ी कसौटी?) संगठन के नीति निर्धारकों के साथ चिंतन मंथन और परफॉर्मेंस रिपोर्ट के अलावा पिछले कुछ समय में मुख्यमंत्री लगातार विभागीय समीक्षा बैठकें कर रहे हैं, प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही, योजनाओं की मॉनिटरिंग और समयबद्ध क्रियान्वयन पर जोर दिखाई देता है.. इससे यह धारणा बनी है कि संभावित पुनर्गठन में “परफॉर्मेंस” एक अहम पैमाना बन सकती है..ऐसे मंत्री जिनके अपने गृह क्षेत्र और प्रभार वाले जिलों के साथ विभागों की उपलब्धियां जमीन पर स्पष्ट नहीं दिखीं, जिनकी सार्वजनिक छवि कमजोर हुई या जिनके कामकाज पर लगातार सवाल उठे, उनके लिए चुनौती बढ़ सकती है.. बशर्ते मूल्यांकन पारदर्शिता के साथ हो..भाजपा लंबे समय से “गुड गवर्नेंस” और परिणाम आधारित राजनीति की बात करती रही है.. इसलिए संदेश यह भी हो सकता है कि केवल राजनीतिक वजन काफी नहीं, बल्कि प्रशासनिक परिणाम भी जरूरी हैं.. भाजपा का घोषणा पत्र ,मंत्रियों की जवाबदेयी और डिलीवरी सिस्टम के आधार पर मूल्यांकन शायद वक्त का तकाजा ही साबित होगा.. हालांकि राजनीति में परफॉर्मेंस अकेला मापदंड नहीं होता.. कई बार क्षेत्रीय, सामाजिक और चुनावी संतुलन किसी मंत्री की उपयोगिता तय करते हैं.. इसलिए पुनर्गठन में केवल योग्यता नहीं, राजनीतिक आवश्यकता भी निर्णायक कारक होगी.. (सवाल चाल.. चरित्र ..और चेहरा के मापदंड पर कौन खरा और कौन खोटा ) भाजपा की राजनीति लंबे समय से “चाल, चरित्र और चेहरा” के सिद्धांत को अपने वैचारिक आधार के रूप में प्रस्तुत करती रही है..ऐसे में यदि कुछ मंत्री विवादों में घिरे हों, उनकी कार्यशैली सवालों में रही हो, या उनके नाम को लेकर संगठन और जनता के बीच असहज चर्चा हो, तो मुख्यमंत्री के सामने कठिन निर्णय की स्थिति बन सकती है.. राजनीतिक रूप से यह भी सच है कि हर विवाद मंत्री की विदाई का कारण नहीं बनता..कई बार पार्टी चुनावी समीकरण, सामाजिक प्रभाव और संगठनात्मक मजबूरी के चलते ऐसे चेहरों को बचाने का रास्ता निकालती है.. इसलिए संभव है कि कुछ विवादित मंत्रियों के विभाग बदले जाएं, कुछ को “कम दृश्यता” वाले विभागों में भेजा जाए या कुछ को संगठनात्मक भूमिका देकर सरकार से दूरी बनाई जाए.. यदि ऐसे मामलों में सख्ती दिखाई जाती है तो यह संदेश जाएगा कि डॉ. मोहन यादव “इमेज करेक्शन” और जवाबदेही को गंभीरता से लेते हैं.. (क्षेत्रीय और जातीय संतुलन की बड़ी चुनौती) मध्यप्रदेश की राजनीति केवल प्रशासनिक दक्षता से संचालित नहीं होती, यहां क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और जातीय संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है.. मालवा, महाकौशल, विंध्य, बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल, भोपाल-नर्मदापुरम—हर क्षेत्र अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी चाहता है..इसी तरह महिला आरक्षण और महिला नेतृत्व की 33 से 50% की भागीदारी की नई बहस के बीच ओबीसी, सवर्ण, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और प्रभावशाली स्थानीय सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से जरूरी रहता है..चूंकि डॉ. मोहन यादव स्वयं ओबीसी चेहरे के रूप में उभरे हैं, इसलिए पुनर्गठन में यह देखना अहम होगा कि क्या भाजपा सामाजिक विस्तार की अपनी राजनीति को और मजबूत करती है या परंपरागत शक्ति-संतुलन बनाए रखती है..विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों, अनुसूचित जाति बहुल इलाकों और शहरी वोट बैंक को साधने के संकेत पुनर्गठन के जरिए दिए जा सकते हैं.. (जरूरी या मजबूरी पीढ़ी परिवर्तन का संकेत?) भाजपा में पिछले कुछ वर्षों से “जनरेशन शिफ्ट” की चर्चा लगातार रही है.. कई राज्यों में पार्टी ने अपेक्षाकृत नए चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि संगठन भविष्य की तैयारी कर रहा है। मध्यप्रदेश में भी संभावना यही मानी जा रही है कि कुछ नए, अपेक्षाकृत युवा और आक्रामक राजनीतिक चेहरों को मौका दिया जा सकता है.. ऐसे चेहरे जो मीडिया में प्रभावी हों, सोशल मीडिया नैरेटिव संभाल सकें और जमीनी राजनीति में सक्रिय दिखाई देते हों..यदि ऐसा होता है तो यह संकेत होगा कि भाजपा 2028 और उसके बाद की राजनीति को ध्यान में रखकर नेतृत्व की दूसरी पंक्ति तैयार कर रही है.. (हाईकमान की अपेक्षाएं क्या कहती हैं?) भाजपा में मुख्यमंत्री शक्तिशाली होते हुए भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं माने जाते, केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति, संगठन की राय और चुनावी प्राथमिकताएं बेहद महत्वपूर्ण होती हैं.. इसलिए यह मानना कठिन है कि कोई बड़ा पुनर्गठन बिना राष्ट्रीय नेतृत्व की सहमति के होगा..केंद्रीय नेतृत्व संभवतः तीन बातें देखेगा—पहला, सरकार की छवि; दूसरा, संगठन और सरकार के बीच तालमेल; तीसरा, आगामी चुनावों के लिए राजनीतिक संदेश..यदि मंत्रिमंडल में ऐसे चेहरे आते हैं जो संगठन से निकले हैं, कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहे हैं या जिनकी स्वीकार्यता मजबूत है, तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी “कैडर आधारित राजनीति” की ओर लौट रही है,भाजपा की ताकत हमेशा उसका संगठन और कार्यकर्ता नेटवर्क रहा है। लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली किसी भी पार्टी के सामने यह चुनौती आती है कि कार्यकर्ताओं को लगने लगता है कि सरकार और संगठन के बीच दूरी बढ़ रही है..मध्यप्रदेश में भी समय-समय पर ऐसी आवाजें सुनाई देती रही हैं कि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की सुनवाई कम हुई है, यदि पुनर्गठन में ऐसे चेहरों को शामिल किया जाता है जिनकी पकड़ संगठन पर मजबूत हो या जो कार्यकर्ताओं से संवाद रखते हों, तो यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा..डॉ. मोहन यादव यह संकेत देना चाहेंगे कि सरकार सिर्फ सत्ता संचालन का माध्यम नहीं, बल्कि संगठन की राजनीतिक ऊर्जा का विस्तार है.. कांग्रेस फैक्टर भी अहम दूसरी ओर कांग्रेस भी संगठनात्मक पुनर्गठन और नए नेतृत्व को लेकर सक्रिय दिखने की कोशिश कर रही है। यदि कांग्रेस जिला स्तर पर नए चेहरे लाकर अपने ढांचे को मजबूत करती है, तो भाजपा के लिए भी राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर अधिक आक्रामक तैयारी जरूरी हो जाती है।इसलिए मंत्रिमंडल पुनर्गठन केवल आंतरिक संदेश नहीं होगा; यह विपक्ष को भी राजनीतिक जवाब देने का माध्यम बन सकता है.. (आखिर मोहन का संदेश क्या होगा?) यदि संभावित पुनर्गठन को राजनीतिक भाषा में समझें तो डॉ. मोहन यादव संभवतः तीन बड़े संदेश देना चाहेंगे..पहला—परफॉर्म करो या रास्ता छोड़ो.. सरकार परिणाम चाहती है और कामकाज समीक्षा के दायरे में है..दूसरा—चाल, चरित्र और चेहरा महत्वपूर्ण हैं..भाजपा की वैचारिक पहचान और सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार पर निगरानी है..तीसरा—भविष्य की भाजपा की तैयारी..नई पीढ़ी, नए सामाजिक समीकरण और संगठन आधारित राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश..अंततः मंत्रिमंडल पुनर्गठन केवल राजनीतिक नियुक्तियों की सूची नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि “मोहन काल” प्रशासनिक निरंतरता का दौर कहलाएगा या एक नई राजनीतिक शैली की शुरुआत सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा,क्या मुख्यमंत्री अपनी पसंद की टीम के जरिए सत्ता को नया संदेश देंगे, या फिर संतुलन की राजनीति ही सबसे बड़ा सच बनी रहेगी?

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