(सवाल दर सवाल राकेश अग्निहोत्री) इंट्रो (राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस तीसरी सीट से होगी मजबूत या बिखर जाएगी) (राज्यसभा: तीसरी सीट परअरविंद भदौरिया' डार्क हॉर्स ' साबित होंगे..!) मध्यप्रदेश में राज्यसभा उपचुनाव भले संख्या बल के लिहाज से खाली हो रही तीन सीमित सीटों का चुनाव हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने बेहद व्यापक नजर आने लगे हैं.. जिसकी अपनी वजह भी है.. वजह बीजेपी कांग्रेस की इंटरनल पॉलिटिक्स, विधानसभा का अंकगणित और दोनों दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप और दिलचस्पी..यह चुनाव बैक डोर एंट्री के जरिए केवल विधायकों द्वारा राज्यसभा का सांसद चुनने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के भीतर भविष्य की राजनीति, नेतृत्व संतुलन, संगठनात्मक ताकत और दिल्ली दरबार में प्रभाव की नई तस्वीर भी तय करेगा.. यही वजह है कि चुनाव आयोग की तारीखों के ऐलान के साथ ही भोपाल से दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है..तीन सीटों वाले इस चुनाव में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर है कि आखिर भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने राजनीतिक संदेश किस रूप में देने जा रही हैं, भाजपा के पास संख्या बल की मजबूती है, लेकिन उसके सामने चुनौती “किसे भेजें” की है.. वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती “सीट बचाने” की बन गई है, यानी भाजपा के लिए यह अवसरों का चुनाव है, तो कांग्रेस के लिए अस्तित्व और एकजुटता की बड़ी परीक्षा.. जो मध्य प्रदेश की राजनीति में मोहन काल में बड़ा संदेश होगा..दिल्ली की पसंद इस चुनाव में सबसे निर्णायक फैक्टर मानी जा रही है.. भाजपा में अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और संगठन नेतृत्व की रणनीति के अनुरूप होगा, जबकि कांग्रेस में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की राजनीतिक प्राथमिकताएं उम्मीदवार तय करेंगी.. ऐसे में प्रदेश के नेता भले सक्रिय लॉबिंग में जुटे हों, लेकिन सब जानते हैं कि अंतिम मुहर हाईकमान की ही होगी..भाजपा के भीतर यह चुनाव कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य से सीधे जुड़ गया है.. आधी आबादी महिला नेतृत्व से पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस समेत, कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा और अरविंद भदौरिया जैसे नाम अलग-अलग कारणों से चर्चा में हैं, कैलाश विजयवर्गीय को लेकर सवाल यह है कि क्या भाजपा उन्हें फिर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देने के लिए दिल्ली वापस बुलाएगी? नरोत्तम मिश्रा के लिए यह चुनाव राजनीतिक वापसी का रास्ता बन सकता है, हालांकि दतिया और विधानसभा की राजनीति भी उनके सामने विकल्प के तौर पर मौजूद है.. वहीं अरविंद भदौरिया का नाम संगठन आधारित राजनीति और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के करीबी चेहरे और नीति निर्धारकों की पहली पसंद के रूप में तेजी से उभरा है.. यदि भाजपा नए संतुलन और नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे बढ़ाने का संदेश देना चाहती है, तो भदौरिया “डार्क हॉर्स” साबित हो सकते हैं.. दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह चुनाव कहीं ज्यादा संवेदनशील है.. पार्टी को केवल उम्मीदवार तय नहीं करना, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि विधानसभा के मौजूदा अंकगणित में उसकी सीट सुरक्षित रहे.. किसी अनुसूचित जाति वर्ग के दावे को मजबूत करने की बात कह चुके दिग्विजय सिंह की राजनीतिक विरासत, कमलनाथ की भूमिका, जीतू पटवारी के नेतृत्व और राहुल गांधी की रणनीति सबकी परीक्षा इस एक चुनाव में दिखाई दे रही है.. यदि कांग्रेस सीट बचा लेती है, तो यह संगठनात्मक स्थिरता का संदेश होगा..लेकिन यदि सीट हाथ से निकलती है, तो यह केवल हार नहीं बल्कि प्रदेश कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संकट, गुटबाजी और कमजोर पकड़ का बड़ा संकेत माना जाएगा.. खासतौर पर जीतू पटवारी के नेतृत्व पर सीधे सवाल उठ सकते हैं..राज्यसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों इसे भविष्य की राजनीति से जोड़कर देख रही हैं. भाजपा के लिए यह चुनाव 2029 की रणनीतिक तैयारी, सामाजिक संतुलन और राष्ट्रीय विस्तार का माध्यम बन सकता है.. वहीं कांग्रेस के लिए यह तय करेगा कि पार्टी मध्यप्रदेश में अब भी प्रभावी विपक्ष के तौर पर खुद को बचाए रख सकती है या नहीं..यानी यह चुनाव केवल तीन सांसदों का नहीं…बल्कि कई नेताओं की नई राजनीतिक पारी, कई महत्वाकांक्षाओं की दिशा और मध्यप्रदेश की भविष्य की सियासत का संकेतक बन चुका है.. कांग्रेस यदि तीसरी सीट नहीं बचा पाई तो क्या विधानसभा चुनाव से पहले ही कांग्रेस का कुनबा बिखर जाएगा.. या फिर यह राहुल गांधी की मध्य प्रदेश में पहली पसंद के बावजूद नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़ा होने के साथ प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित होगा.. ✅ बॉक्स (राज्यसभा बनते बिगड़ते समीकरण: कैलाश, नरोत्तम या अरविंद) आखिर दिल्ली की पसंद कौन? राज्यसभा की तीन सिम खासतौर से समर और जॉर्ज करियर की खाली हो रही सीट पर रिपीट होने की स्थिति में तीसरी सीट पर कांग्रेस को चुनौती देने वाला पसंदीदा उम्मीदवार आखिर कौन.. मंत्री कैलाश विजयवर्गी विधानसभा चुनाव की आहट के बीच की दहलीज पर खड़े नरोत्तम मिश्रा या फिर डॉग हॉर्स साबित हो सकते पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया.. मध्यप्रदेश में राज्यसभा उपचुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही भाजपा के भीतर नई राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा तेज हो गई है..आधिकारिक तौर पर भले किसी बड़े नेता ने दावेदारी पेश नहीं की हो, लेकिन सियासी गलियारों में तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं ,कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा और पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया.. तीनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा, संगठनात्मक भूमिका और वर्तमान परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन एक समानता जरूर है, तीनों को भाजपा की भविष्य की राजनीति में अब भी महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या राज्यसभा इन नेताओं की नई राजनीतिक पारी का मंच बन सकती है? फोटो (कैलाश विजयवर्गी अरविंद भदौरिया और नरोत्तम मिश्रा) (2023 के चुनाव ने बदली तीनों की भूमिका) 2023 विधानसभा चुनाव के बाद मध्यप्रदेश भाजपा की राजनीति में इन तीनों नेताओं की स्थिति पहले जैसी नहीं रही.. मोहन काल में इन तीनों के लिए राज्यसभा चुनाव एक मौका.. जो सम्मान के साथ सुविधा की सियासत का एक नया मार्ग प्रशस्त करसकते हैं.. बसंत के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की पसंद बने और हाई कमान का वृद्धास्ट उन्हें प्राप्त हो.. मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, जो लंबे समय तक राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर दिल्ली और पश्चिम बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहे, अचानक 2023 विधानसभा चुनाव लड़ने मैदान में उतरे..उन्हें मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भी देखा गया.. हालांकि बाद में मोहन यादव मुख्यमंत्री बने और कैलाश को मंत्रिमंडल में जगह मिली.. दूसरी तरफ डॉ. नरोत्तम मिश्रा, जो शिवराज सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में गिने जाते थे, दतिया से चुनाव हार गए.. यानी भाजपा के सबसे आक्रामक और अनुभवी चेहरों में शामिल नेता अचानक सत्ता और विधानसभा दोनों से बाहर हो गए.. चुनाव हारने के बाद नवग्रह मंदिर का संकल्प पूरा किया और अब राजनीति में सक्रियता बरकरार रखने में जुटे.. दतिया विधानसभा सीट के उपचुनाव की संभावना को लेकर व्यस्त जिसे वह एक मौका मानते हैं.. इसी तरह अरविंद भदौरिया भी चुनाव हार गए, लेकिन हार के बावजूद संगठन में उनकी सक्रियता और स्वीकार्यता कम नहीं हुई,बल्कि मोहन यादव सरकार बनने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री का करीबी और भरोसेमंद चेहरा माना जाने लगा.. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के समकालीन अरविंद अब क्या मोहन यादव की पहली पसंद बनेंगे.. (कैलाश विजयवर्गीय: क्या दिल्ली वापसी की तैयारी?) कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के उन नेताओं में हैं जिनका राजनीतिक अनुभव प्रदेश की सीमाओं से कहीं बड़ा है.. उनका अपना स्वभाव, लंबा अनुभव दिल्ली में पकड़ जो सियासत में स्वाभिमान और सम्मान से समझौता करने को तैयार नहीं.. वे संगठन, चुनाव प्रबंधन और राष्ट्रीय रणनीति तीनों में दक्ष माने जाते हैं, कैलाश का राज्यसभा में पहुंचना यानी इंदौर में एक और उपचुनाव.. पुत्र आकाश विजयवर्गीय विधायक रह चुके.. मध्य प्रदेश में दूसरे राज्यों के मुकाबले भाजपा के अंदर परिवार बाद एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.. मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहते हुए भी कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उनका स्वाभाविक राजनीतिक स्पेस दिल्ली की राजनीति में ज्यादा दिखाई देता है..ऐसे में यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि भाजपा यदि संगठनात्मक पुनर्संतुलन करती है, तो कैलाश विजयवर्गीय को फिर किसी राष्ट्रीय भूमिका में भेजा जा सकता है..राज्यसभा का रास्ता उनके लिए केवल संसद पहुंचने का माध्यम नहीं होगा, बल्कि यह उनके राजनीतिक कद और वरिष्ठता को बनाए रखने का संकेत भी माना जाएगा..क्योंकि भाजपा में कई बार वरिष्ठ नेताओं को राज्यसभा के जरिए संगठन या केंद्र में नई जिम्मेदारी देने की परंपरा रही है.. (नरोत्तम मिश्रा: वापसी का रास्ता दिल्ली या दतिया?) डॉ. नरोत्तम मिश्रा का मामला थोड़ा अलग है,वे भाजपा के उन नेताओं में रहे हैं जिनकी पहचान केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक राजनीतिक शैली और सत्ता संचालन से जुड़ी रही है.. ऑपरेशन लोटस का चर्चित चेहरा रह चुके नरोत्तम 2023 की हार के बाद अपनी राजनीतिक दिशा को लेकर सजग ही नहीं सतर्क और सक्रिय बने हुए हैं..अब राज्यसभा चुनाव ने उनके नाम को फिर चर्चा में ला दिया है,हालांकि नरोत्तम के सामने एक दूसरा विकल्प भी खुला हुआ है,दतिया और भविष्य के विधानसभा चुनाव..यदि पार्टी उन्हें फिर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रखना चाहती है, तो संभव है कि उन्हें राज्यसभा भेजने की बजाय विधानसभा की वापसी का मौका दिया जाए.. यानी भाजपा यह भी सोच सकती है कि नरोत्तम जैसे जमीन से जुड़े नेता को दिल्ली की बजाय प्रदेश में ज्यादा उपयोगी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है,फिर भी यह संभावना खत्म नहीं होती कि पार्टी अनुभव और राजनीतिक आक्रामकता को देखते हुए उन्हें संसद भेज दे.. यदि निकट भविष्य में मोहन यादव मंत्रिमंडल से उनसे सीनियर वरिष्ठ मंत्रियों की भूमिका बदलती है तो फिर किसी पीढ़ी के नरोत्तम के विधानसभा उपचुनाव लड़ने पर भी सस्पेंस पढ़ सकता है.. (अरविंद भदौरिया: क्या सबसे मजबूत “डार्क हॉर्स”?) इन तीनों नामों में सबसे दिलचस्प चर्चा अरविंद भदौरिया को लेकर है,वे भले बड़े सार्वजनिक चेहरे के तौर पर कैलाश या नरोत्तम जितने चर्चित न हों, लेकिन संगठन के भीतर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है,हाल ही में भाजपा की नई प्रदेश कोर कमेटी में उन्हें शामिल किया जाना भी इस बात का संकेत माना गया कि पार्टी नेतृत्व उन पर भरोसा करता है,मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से उनकी नजदीकी और संगठनात्मक समझ उन्हें बाकी दावेदारों से अलग बनाती है..भाजपा में अक्सर ऐसे नेताओं को राज्यसभा के जरिए आगे बढ़ाया जाता रहा है, जो जमीन और संगठन दोनों पर संतुलन रखते हों,यही वजह है कि अरविंद भदौरिया को “बैकडोर एंट्री” वाले संभावित चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है.. संगठन लॉबी भी अहम फैक्टर भाजपा में राज्यसभा का फैसला केवल लोकप्रियता से तय नहीं होता.. संगठनात्मक समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद सबसे महत्वपूर्ण होती है..अरविंद भदौरिया के पक्ष में यह माना जा रहा है कि राष्ट्रीय संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह जैसे नेताओं के साथ उनकी कार्यशैली का बेहतर तालमेल है..यदि भाजपा जातीय, क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन से इतर संगठनात्मक भरोसे को प्राथमिकता देती है, तो अरविंद का नाम अचानक मजबूत हो सकता है.. अरविंद भदौरिया न सिर्फ राज्यसभा के बड़े दावेदार बल्कि नितिन नवीन की टीम का भी एक बड़ा चेहरा साबित होसकते हैं.. (क्या सुमेर सिंह सोलंकी और कुरियन की जगह बन सकती है?) राज्यसभा की मौजूदा सीटों में आदिवासी प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय संतुलन दोनों महत्वपूर्ण हैं.. सुमेर सिंह सोलंकी आदिवासी चेहरे के तौर पर भाजपा के लिए अहम रहे हैं, जबकि केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन दक्षिण भारत की राजनीति के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखते हैं..ऐसे में सवाल यह है कि क्या भाजपा इन दोनों में से किसी की जगह नए चेहरे को मौका देगी?यदि पार्टी सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता देती है, तो सोलंकी का रिपीट होना संभव है.. यदि राष्ट्रीय रणनीति को प्राथमिकता मिली, तो कुरियन जैसे चेहरे को फिर मौका मिल सकता ह..लेकिन यदि भाजपा संगठन आधारित नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का प्रयोग करती है, तो अरविंद भदौरिया जैसे नाम सबसे ज्यादा फायदे में दिखाई देते हैं.. (मोहन-विष्णु फैक्टर और अरविंद का समय) राजनीतिक विश्लेषक एक और दिलचस्प पहलू की ओर इशारा कर रहे हैं..डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री बन चुके हैं,पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.. यानी भाजपा में उसी पीढ़ी के कई नेता नई भूमिकाओं में पहुंच चुके हैं..ऐसे में मोहन यादव और वीडी शर्मा के समकालीन माने जाने वाले अरविंद भदौरिया के लिए भी यह सही समय माना जा रहा है.. यदि अभी मौका नहीं मिला, तो भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं..आखिर फैसला किस आधार पर?भाजपा का अंतिम फैसला तीन बातों पर निर्भर करेगा..भविष्य की राष्ट्रीय रणनीति..सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन..संगठनात्मक भरोसा कैलाश विजयवर्गीय अनुभव और राष्ट्रीय कद का चेहरा हैं..नरोत्तम मिश्रा आक्रामक राजनीति और प्रशासनिक अनुभव का..जबकि अरविंद भदौरिया संगठन और भविष्य की राजनीतिक निवेश रणनीति का प्रतीक माने जा रहे हैं..अब देखना यह होगा कि भाजपा “अनुभव” को प्राथमिकता देती है…“राजनीतिक वापसी” को…या फिर “नई पारी” की शुरुआत करने वाले चेहरे पर दांव लगाती है.. बॉक्स 3 फोटो जीतू पटवारी (कांग्रेस से ज्यादा जीतू की परीक्षा, बीजेपी की रणनीति और दिल्ली का हस्तक्षेप ) मध्यप्रदेश समेत देश की कई और राज्यसभा सीटों पर उपचुनाव का ऐलान होते ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है... मध्यप्रदेश की तीन सीटें इस चुनावी गणित का हिस्सा हैं और सबसे ज्यादा चर्चा उस सीट को लेकर है, जिसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के राजनीतिक उत्तराधिकार से जोड़कर देखा जा रहा है...चुनाव आयोग की तारीखों के ऐलान के बाद अब नजरें दिल्ली की ओर टिक गई हैं, क्योंकि फैसला केवल उम्मीदवारों का नहीं होगा, बल्कि इससे आने वाले समय की राजनीतिक दिशा भी तय होगी... भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह सिर्फ राज्यसभा चुनाव नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व और भविष्य की रणनीति का टेस्ट बन गया है...कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती से इनकार नहीं किया जा सकता.. सिर्फ तीसरी सीट बचाना चुनौती नहीं बल्कि नेतृत्व पर खड़े होने वाले सवालों की आशंका से भी पार्टी को बाहर निकलना होगा..मध्यप्रदेश विधानसभा के मौजूदा अंकगणित में कांग्रेस की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं है... कई विधायकों के पाला बदलने और लगातार चुनावी हार के बाद पार्टी पहले ही दबाव में है... ऐसे में राज्यसभा की सीट बचाना कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है...सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस दिग्विजय सिंह की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए किस चेहरे पर भरोसा करेगी... जबकि राजा ने अनुसूचित जाति के उम्मीदवार की अपनी ओर से इच्छा जताकर एकदम खेल दिया.. जो सीधे-सीधे कमलनाथ की दावेदारी को खत्म करता है..ऐसे में जब मल्लिकार्जुन खड़गे राष्ट्रीय अध्यक्ष की व्यापारी खुद की खत्म हो रही..तब क्या पार्टी किसी अनुभवी नेता को मौका देगी, या फिर राहुल गांधी और राष्ट्रीय नेतृत्व नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का जोखिम उठाएंगे... यहीं से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है...यदि उम्मीदवार चयन में कमलनाथ की राय हावी होती और सज्जन सिंह वर्मा राजा और नाथ दोनों की पसंद बनकर सामने आते, तो संदेश जाएगा कि आज भी मध्यप्रदेश कांग्रेस में उनका प्रभाव बरकरार है...लेकिन यदि राहुल गांधी और दिल्ली नेतृत्व किसी नए चेहरे को आगे बढ़ाते हैं, तो यह कांग्रेस में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत माना जाएगा... (“राजा की जगह कौन?” सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल) दिग्विजय सिंह को कांग्रेस में केवल नेता नहीं, बल्कि रणनीतिकार माना जाता है...राज्यसभा में उनकी मौजूदगी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में मध्यप्रदेश की आवाज बनकर देखी जाती रही है...ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस को अब ऐसा चेहरा मिलेगा जो संगठन, रणनीति और विपक्षी राजनीति तीनों स्तरों पर उनकी भूमिका निभा सके...कांग्रेस के सामने मुश्किल यह भी है कि यदि टिकट वितरण में संतुलन नहीं बैठा, तो गुटबाजी खुलकर सामने आ सकती है...प्रदेश संगठन पहले ही कई धड़ों में बंटा नजर आता है... कमलनाथ खेमे, दिग्विजय समर्थक, युवा नेतृत्व और क्षेत्रीय दावेदारों के बीच खींचतान किसी से छिपी नहीं है...यदि किसी एक गुट की पसंद को प्राथमिकता दी गई, तो बाकी गुटों की नाराजगी चुनाव के दौरान असर डाल सकती है... (जीतू पटवारी के नेतृत्व की भी परीक्षा) यह चुनाव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के लिए भी बड़ा राजनीतिक टेस्ट माना जा रहा है... लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस लगातार संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही है... ऐसे में यदि पार्टी अपनी राज्यसभा सीट सुरक्षित नहीं रख पाती, तो इसका सीधा असर पटवारी के नेतृत्व पर पड़ेगा...राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस की सीट भाजपा के खाते में चली गई, तो इसे केवल एक चुनावी हार नहीं माना जाएगा, बल्कि यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में भी असफल रही...ऐसी स्थिति में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और रणनीति को लेकर बहस तेज हो सकती है... कोई बात और है कि पिछला विधानसभा चुनाव हार गए प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राज्यसभा की अपनी दावेदारी को पहले ही नकार दियाहै..फिर भी यह चुनाव जीतू पटवारी के लिए सिर्फ सीट बचाने का नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करने का मौका भी है... उधर भाजपा अक्सर राज्यसभा के जरिए बड़े राष्ट्रीय संदेश भी देती रही है... ऐसे मेंसबसे दिलचस्प राजनीतिक चर्चा कांग्रेस के कब्जे वाली तीसरी सीट को लेकर है... विधानसभा में कांग्रेस की संख्या पहले से कमजोर हुई है और भाजपा लगातार संगठनात्मक बढ़त बनाए हुए है.. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या भाजपा “गुणा-भाग” की राजनीति के जरिए कांग्रेस की सीट पर भी दावा ठोकने की कोशिश करेगी... यदि भाजपा ऐसा करती है, तो इसके लिए उसे कांग्रेस विधायकों में सेंध लगानी होगी या क्रॉस वोटिंग की स्थिति बनानी होगी... मध्यप्रदेश की राजनीति में अतीत में ऐसे घटनाक्रम देखे जा चुके हैं... इसलिए कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता यही है कि कहीं संख्या बल की कमजोरी चुनाव के दिन भारी न पड़ जाए...यदि कांग्रेस सीट हार गई तो क्या होगा?यदि कांग्रेस अपनी पारंपरिक सीट नहीं बचा पाई, तो इसका असर सिर्फ राज्यसभा तक सीमित नहीं रहेगा...पहला संदेश यह जाएगा कि प्रदेश कांग्रेस संगठनात्मक रूप से कमजोर है...दूसरा, यह सवाल उठेगा कि क्या पार्टी अपने विधायकों पर नियंत्रण बनाए रखने में सक्षम है...तीसरा, राहुल गांधी के नेतृत्व और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की भविष्य की रणनीति पर भी बहस शुरू हो जाएगी... राजनीतिक तौर पर यह भाजपा के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ होगा...वहीं कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और असंतोष खुलकर सामने आ सकता है...दिल्ली क्यों तय करेगी पूरा खेल?राज्यसभा चुनाव भले मध्यप्रदेश में हो रहा हो, लेकिन असली फैसला दिल्ली में होगा...क्या मंत्रिमंडल विस्तार से जुड़े हैं संकेत?राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि राज्यसभा चुनाव को भविष्य के केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है... यदि भाजपा किसी नए चेहरे को राज्यसभा भेजती है, तो यह संकेत हो सकता है कि भविष्य में उसे केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी...मध्यप्रदेश भाजपा में कई ऐसे चेहरे हैं, जिन्हें राष्ट्रीय राजनीति में जगह देने की चर्चा समय-समय पर होती रही है... इसलिए उम्मीदवार चयन केवल राज्यसभा सीट भरने का मामला नहीं, बल्कि 2029 की राजनीतिक तैयारी का हिस्सा भी माना जा रहा है...कुल मिला करमध्यप्रदेश का राज्यसभा उपचुनाव इस बार सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं रह गया है...यह चुनाव कांग्रेस के संगठन, नेतृत्व और एकजुटता की परीक्षा है, तो भाजपा के लिए रणनीतिक विस्तार और राजनीतिक संदेश देने का अवसर...कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सीट बचाने और आंतरिक संतुलन बनाए रखने की है...वहीं भाजपा यह तय करेगी कि उसे सुरक्षित राजनीति करनी है या बड़ा राजनीतिक संदेश देना है...अब सबकी नजर दिल्ली पर है...कौन जाएगा राज्यसभा... किसे मिलेगा हाईकमान का भरोसा...और क्या मध्यप्रदेश से कोई ऐसा नाम निकलेगा, जो आने वाले वर्षों की राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा बन जाए...
राज्यसभा चुनाव; तीसरी सीट पर होगी मजबूत 'कांग्रेस' या बिखर जाएगी.. राकेश अग्निहोत्री (सवाल दर सवाल)