रायपुर में फेल कमिश्नरी मॉडल लागू, एक शहर दो पुलिसिंग से बढ़ेंगी दिक्कतें

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रायपुर में फेल कमिश्नरी मॉडल लागू, एक शहर दो पुलिसिंग से बढ़ेंगी दिक्कतें

रायपुर में दोहरी पुलिस व्यवस्था वाला कमिश्नरी सिस्टम लागू होने की तैयारी

शहर में कमिश्नरी, देहात में एसपी सिस्टम

छत्तीसगढ़ में पहली बार राजधानी रायपुर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम 23 जनवरी 2026 से लागू होने जा रहा है। मंत्री परिषद की मंजूरी के बाद गृह विभाग इसका ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत नगरीय निकाय क्षेत्र के 22 शहरी थाने पुलिस कमिश्नर के अधीन होंगे, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के 15 थानों के लिए अलग से ग्रामीण एसपी की तैनाती की जाएगी। इसे भोपाल और इंदौर की तर्ज पर लागू करने की बात कही जा रही है, जिसका उद्देश्य नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिसिंग को अलग-अलग प्रभावी बनाना बताया जा रहा है।

कानपुर-वाराणसी में फेल हो चुका है ऐसा मॉडल

यही तरह की दोहरी पुलिस व्यवस्था उत्तर प्रदेश के कानपुर और वाराणसी में लागू की गई थी, जहां शहर में कमिश्नरी और देहात में एसपी सिस्टम रखा गया था। एक ही जिले में दो तरह की पुलिस व्यवस्था के कारण कई व्यावहारिक दिक्कतें और समन्वय की कमी सामने आई। सीमा विवाद, अपराध नियंत्रण में कठिनाइयां और समन्वय की समस्याओं के चलते अपराध भी बढ़ने लगे थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग एक साल में यह प्रयोग बंद कर पूरे जिले में कमिश्नरी सिस्टम लागू कर दिया। अब उसी मॉडल को रायपुर में लागू करने की तैयारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं और चर्चा है कि मध्य प्रदेश में भी इस तरह की व्यवस्था पर विचार हो रहा है।

वीआईपी मूवमेंट और सुरक्षा में समन्वय की चुनौती

प्रस्तावित मॉडल की सबसे बड़ी दिक्कतों में से एक वीआईपी मूवमेंट को लेकर बताई जा रही है। पुराने शहर से नवा रायपुर के बीच यात्रा के दौरान दो अलग-अलग पुलिस व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी आएगी। नगर निगम सीमा तक सुरक्षा और कारकेड की व्यवस्था कमिश्नरी पुलिस के पास होगी, जबकि सीमा के आगे देहात पुलिस के अधिकारी वीआईपी को अपने कारकेड में ले जाएंगे। इस तरह एक ही सफर में दो बार कारकेड बदलने जैसी स्थिति बनेगी, जिससे समन्वय संबंधी दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

एयरपोर्ट और नवा रायपुर की सुरक्षा ग्रामीण एसपी के पास

रायपुर में प्रस्तावित कमिश्नरी सिस्टम के तहत एयरपोर्ट ग्रामीण एसपी के क्षेत्राधिकार में आएगा। सिविल लाइन क्षेत्र में स्थित मुख्यमंत्री निवास, राजभवन (लोक भवन) और मंत्री बंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस कमिश्नर के पास होगी। वहीं नवा रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास, मंत्री बंगले, लोकभवन, विधानसभा, मंत्रालय और सचिवालय की सुरक्षा ग्रामीण एसपी के अधीन रहेगी। इस बंटवारे से राजधानी क्षेत्र के महत्वपूर्ण और उच्च सुरक्षा वाले ढांचे की सुरक्षा दो अलग-अलग कमांड में बंट जाएगी।

अपराध की घटनाओं में सीमा विवाद की आशंका

हत्या, लूट, चोरी और डकैती जैसी गंभीर वारदातों के दौरान शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की सीमा पर jurisdiction को लेकर विवाद की स्थिति बन सकती है। अगर कोई घटना नगरीय निकाय और देहात की सीमा पर घटित होती है, तो जांच अधिकार क्षेत्र पर विवाद खड़ा हो सकता है और पड़ताल में देरी तथा दिक्कतें आ सकती हैं। देहात क्षेत्र में जांच के लिए अलग से अनुमति लेनी होगी। इसके अलावा ड्यूटी, ट्रांसफर-पोस्टिंग, क्वार्टर आवंटन जैसे कई प्रशासनिक कार्य शासन स्तर पर तय होंगे, जिन पर कमिश्नर या एसपी स्तर पर सीधे निर्णय संभव नहीं होगा।

ओपी सिंह की राय: पूरे जिले में कमिश्नरी और मजबूत अधिकार

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह के अनुभव के अनुसार, लखनऊ में 13 जनवरी 2020 से पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू हुआ और मार्च 2021 में इसे कानपुर व वाराणसी तक बढ़ाया गया। शुरुआत में वहां भी नगरीय क्षेत्र में कमिश्नरी और देहात में एसपी सिस्टम रहा, लेकिन नवंबर 2022 में इसे बदलकर पूरे जिले में कमिश्नरी सिस्टम लागू कर दिया गया, जिससे अपराध में कमी और पुलिसिंग में सुधार देखने को मिला।

उनका मानना है कि कमिश्नर के पास धारा 144 लागू करने, धारा 188 के तहत कार्रवाई, गन लाइसेंस, आबकारी संबंधी कार्रवाई और जिला बदर जैसे अधिकार होते हैं और यही अधिकार रायपुर के कमिश्नर को भी दिए जाने चाहिए। साथ ही उनका सुझाव है कि कमिश्नर के पद पर आईजी या एडीजी रैंक के अधिकारियों की नियुक्ति हो, क्योंकि उनके पास एसपी की तुलना में अधिक अनुभव होता है, जिससे निर्णय प्रक्रिया बेहतर हो सकती है। ओपी सिंह के अनुसार, कमिश्नरी सिस्टम अपराध को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, लेकिन उसे नियंत्रित करने में मदद करता है। वे यह भी सुझाव देते हैं कि पुलिस को बार लाइसेंस जारी करने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए।

भास्कर विचार: एक शहर, दो पुलिसिंग से प्रशासनिक उलझन

स्थानीय संपादक हर्ष पाण्डेय के अनुसार, लगभग दो साल के इंतजार के बाद रायपुर में कमिश्नरी लागू होने की घोषणा तो सुधार के रूप में पेश की जा रही है, लेकिन यह व्यवस्था अंदर से दोहरी पुलिसिंग की स्कीम की तरह दिख रही है। वे प्रश्न उठाते हैं कि जब जिला और शहर एक है तो पुलिसिंग दो तरह की क्यों होनी चाहिए। उनका कहना है कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और सुरक्षा की समानता से जुड़ा है।

लेख में तर्क दिया गया है कि शहर के भीतर कमिश्नरी और शहर से बाहर एसपी सिस्टम का मॉडल कागज पर संतुलित नजर आ सकता है, लेकिन जमीन पर यह भ्रम, असमानता और जवाबदेही के संकट को जन्म देगा। अपराधी सीमा नहीं देखता, इसलिए अपराध की प्रकृति एक होने पर पुलिसिंग की सोच दोहरी नहीं होनी चाहिए। नवा रायपुर, एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर और नई कॉलोनियों को ‘देहात’ मानना वस्तुस्थिति से आंख मूंदने जैसा बताया गया है, क्योंकि ये क्षेत्र शहरी जीवन, हाईटेक इंफ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय आवागमन से जुड़े हैं।

हर्ष पाण्डेय का मत है कि इन इलाकों की पुलिसिंग को देहात के ढांचे में रखना अव्यावहारिक है और इससे शहर के भविष्य को पिछड़े ढांचे में कैद किया जा रहा है। एक ही शहर में दो सिस्टम बनने से अलग अधिकार और अलग प्रक्रिया पैदा होगी, जो आम नागरिक के लिए भ्रम और अपराधी के लिए अवसर बन जाएगी। यह व्यवस्था वन सिटी-वन कमांड के सिद्धांत के खिलाफ बताई गई है। लेख के अनुसार, अगर राजधानी एक है और कलेक्टर एक हैं, तो पुलिसिंग भी एक होनी चाहिए, अन्यथा यह पुलिस सुधार नहीं बल्कि प्रशासनिक पैचवर्क और आधा-अधूरा प्रयोग साबित होगा।

भारत की दो प्रमुख पुलिस व्यवस्थाएं

रिपोर्ट में यह भी समझाया गया है कि भारत में पुलिस व्यवस्था मुख्य रूप से दो तरीकों से काम करती है—सुपरिटेंडेंट सिस्टम और कमिश्नरेट सिस्टम। सुपरिटेंडेंट सिस्टम पारंपरिक व्यवस्था है, जो ज्यादातर जिलों, ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में लागू होती है। इसमें जिले का पुलिस प्रमुख एसपी होता है, जबकि कानून-व्यवस्था से जुड़े कार्यकारी अधिकार जिला मजिस्ट्रेट के पास रहते हैं, जैसे धारा 144, कर्फ्यू, हथियार लाइसेंस और भीड़ नियंत्रण आदि पर आदेश। एसपी इन मामलों में डीएम को रिपोर्ट करता है और उनके आदेशों का पालन करता है।

कमिश्नरेट सिस्टम बड़े शहरों और महानगरों के लिए बनाया गया है, जहां अपराध और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां अधिक जटिल होती हैं। इसमें प्रमुख अधिकारी पुलिस कमिश्नर होता है, जिसका रैंक आम तौर पर अतिरिक्त डीजीपी या आईजीपी के समकक्ष होता है। इस सिस्टम में धारा 144 लागू करना, कर्फ्यू, हथियार लाइसेंस जारी या रद्द करना और भीड़ नियंत्रण से जुड़े आदेश देने जैसे अधिकार सीधे पुलिस कमिश्नर के पास होते हैं। जब पुलिस कमिश्नर को मजिस्ट्रियल पावर भी मिल जाती है, तो इसे कमिश्नरेट सिस्टम कहा जाता है, जिसमें कमिश्नर इंटीग्रेटेड पुलिस कमांड का प्रमुख होता है और राज्य सरकार को जवाबदेह रहता है। विशेष हालात में एनएसए या गैंगस्टर एक्ट लागू करने का अंतिम फैसला भी पुलिस कमिश्नर के पास होता है।

निष्कर्ष: रायपुर में मॉडल पर सवाल, पूरे जिले में एक कमांड की मांग

रायपुर में 23 जनवरी 2026 से लागू होने वाले कमिश्नरी सिस्टम के मौजूदा स्वरूप पर विशेषज्ञों और संपादकीय विचारों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कानपुर और वाराणसी के अनुभव, वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था, सीमा विवाद की आशंका और नवा रायपुर जैसे आधुनिक क्षेत्रों को ग्रामीण ढांचे के तहत रखने की योजना को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। सुझाव यह है कि यदि कमिश्नरी सिस्टम लागू किया जाए तो पूरे जिले में एक समान और सशक्त कमांड के रूप में लागू हो, ताकि अपराध नियंत्रण, जवाबदेही और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और पुलिस सुधार वास्तव में प्रभावी साबित हो।

Sachin Saxena