शिवराज सरकार के जातीय सामाजिक बोर्डों पर दो साल में शून्य खर्च, सिर्फ पद-सुविधा

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मध्यप्रदेश में सामाजिक बोर्डों पर दो साल में खर्च शून्य, बिना समीक्षा सभी बोर्ड भंग

मध्यप्रदेश में 2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विभिन्न जातियों और समाजों को साधने के उद्देश्य से कई सामाजिक बोर्डों का गठन किया था। इन बोर्डों के अध्यक्षों को मंत्री का दर्जा दिया गया, ताकि वे अपनी-अपनी जातियों और समाजों के वोट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को दिलाने में सक्रिय भूमिका निभा सकें। चुनावों में इन नेताओं ने अपनी जातियों के बीच प्रभाव का उपयोग किया और भाजपा सरकार बनाने में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई।

दो साल में 8.34 करोड़ की स्वीकृति, लेकिन एक रुपये का भी व्यय नहीं

तकनीकी शिक्षा राज्य मंत्री गौतम टेटवाल ने विधानसभा में विधायक प्रताप ग्रेवाल के एक प्रश्न के लिखित उत्तर में जानकारी दी कि विभिन्न समाजों के कल्याण के लिए बनाए गए 9 समाज कल्याण बोर्डों पर दो साल में एक रुपये का भी खर्च नहीं किया गया। इन बोर्डों के लिए कुल 8.34 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन किसी भी बोर्ड को वास्तविक रूप से राशि जारी नहीं हुई। परिणामस्वरूप, इन बोर्डों के माध्यम से किसी भी समाज के किसी भी व्यक्ति को लाभ नहीं मिल सका।

सरकार ने अक्टूबर 2023 में इन बोर्डों का गठन दो वर्ष की अवधि के लिए किया था। इसके बावजूद 17 सितंबर 2025 को बिना किसी समीक्षा के सभी बोर्ड भंग कर दिए गए। इस पूरे कार्यकाल में न तो योजनाएं जमीन पर उतर सकीं और न ही समाजों के लिए कोई ठोस कार्यक्रम शुरू हो पाया।

बैठकों का हाल: जिलास्तर पर एक भी बैठक नहीं

बैठकों और रणनीति से जुड़े सवाल पर मंत्री गौतम टेटवाल ने बताया कि जिला स्तर पर किसी भी बोर्ड की एक भी बैठक आयोजित नहीं की गई। केवल कुछ बोर्डों ने औपचारिक बैठकों का आयोजन किया। तीन बोर्डों ने 9 सितंबर 2024 को बैठक की, जबकि तीन बोर्डों ने फरवरी–मार्च 2025 के दौरान बैठकें कीं। इसके अलावा, तीन बोर्डों ने वर्ष 2025 में बैठक की, लेकिन तीन बोर्ड ऐसे भी रहे जिन्होंने अपने अस्तित्व की अवधि में एक भी बैठक नहीं की।

विधायक प्रताप ग्रेवाल का आरोप: समाजों को चुनाव में गुमराह किया गया

कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल ने इस पूरे मामले को समाजों के साथ छल बताते हुए गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि मंत्री के उत्तर से यह स्पष्ट हो गया है कि इन बोर्डों का गठन मुख्य रूप से चुनाव के समय समाजों को गुमराह करने और उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए किया गया था, न कि उनके वास्तविक कल्याण के लिए।

ग्रेवाल ने आरोप लगाया कि भाजपा पदाधिकारियों को इन बोर्डों में अध्यक्ष और सदस्य बनाकर वाहन, मानदेय, गृह-भत्ता और दूरभाष जैसी सुविधाएं तो दे दी गईं, लेकिन बोर्ड के उद्देश्यों के नाम पर एक रुपये का भी उपयोग नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि समाजों के युवाओं, बेरोजगारों और संभावित हितग्राहियों के लिए न कोई योजना बनी, न कोई दीर्घकालिक रणनीति तय हुई, और न ही लाभार्थियों का कोई चयन किया गया।

प्रताप ग्रेवाल ने यह भी उल्लेख किया कि अप्रैल 2023 में, जो कि चुनाव वर्ष था, कुल 15 समाज बोर्ड बनाए गए थे। इनमें से 9 बोर्ड कौशल विकास विभाग के अधीन रखे गए। इसके बावजूद, विभागीय स्तर पर भी कोई ठोस कार्यवाही या ठोस परिणाम सामने नहीं आए।

नियुक्तियाँ अधूरी, कई बोर्ड निष्क्रिय ही रहे

दस्तावेजों से यह भी सामने आया कि कई बोर्डों में नियुक्तियों की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हो पाई। महाराणा प्रताप बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव की नियुक्ति ही नहीं की गई और बाद में यह बोर्ड बिना नियुक्ति के ही भंग कर दिया गया। इसी तरह तेलघानी बोर्ड और जय मीनेष बोर्ड में सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गई, जिसके कारण ये बोर्ड प्रभावी रूप से सक्रिय नहीं हो सके।

रजक बोर्ड और वीर तेजाजी बोर्ड में चार-चार सदस्यों की स्वीकृत संख्या के स्थान पर केवल एक-एक सदस्य की नियुक्ति की गई। अपर्याप्त सदस्य संख्या के कारण इन बोर्डों के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर भी असर पड़ा।

कर्मचारियों की लेट आउटसोर्स नियुक्ति और फिर हटाया जाना

इन बोर्डों के लिए कर्मचारियों की आउटसोर्स नियुक्ति उनके गठन के लगभग डेढ़ साल बाद नवंबर 2024 में की गई। यानी बोर्ड बनने के लंबे समय बाद जाकर प्रशासनिक सहयोग का इंतजाम किया गया। हालांकि, अप्रैल से अगस्त 2025 के बीच इन आउटसोर्स कर्मचारियों को भी हटा दिया गया, जिससे बोर्डों का सीमित प्रशासनिक ढांचा भी समाप्त हो गया।

निष्कर्ष: राजनीतिक लाभ के आरोप, समाजों को ठोस लाभ नहीं

पूरे प्रकरण से यह तस्वीर उभरती है कि चुनाव से ठीक पहले बनाए गए सामाजिक बोर्डों को पर्याप्त वित्तीय और प्रशासनिक समर्थन नहीं दिया गया। आवंटित बजट जारी नहीं हुआ, बैठकों की संख्या नगण्य रही, कई बोर्डों में नियुक्तियां अधूरी रहीं और अंततः बिना समीक्षा के सभी बोर्ड भंग कर दिए गए।

विपक्षी विधायक प्रताप ग्रेवाल का आरोप है कि इन बोर्डों का मुख्य उद्देश्य समाजों के कल्याण से ज्यादा चुनावी लाभ उठाना था। सरकार की ओर से दिए गए लिखित उत्तर में भी यह स्पष्ट है कि व्यावहारिक स्तर पर समाजों के लिए कोई ठोस योजना लागू नहीं हो सकी, जिससे लक्षित वर्गों के बीच इन बोर्डों की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं।

Adarsh Chaurasiya