सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की देरी माफी पर आपत्ति जताई
1612 दिन लेट अपील के बावजूद बिना कारण देरी माफ
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें राज्य सरकार की ओर से दाखिल एक सिविल अपील में 1,612 दिन की देरी को बिना ठोस कारण दर्ज किए माफ कर दिया गया था। यह मामला भूमि और स्वामित्व से जुड़े सिविल विवाद से संबंधित है, जिसमें राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के पुराने फैसले के खिलाफ दूसरी अपील काफी देरी से दायर की थी।
हाई कोर्ट ने 1 सितंबर को यह देरी माफ कर दी थी, लेकिन अपने आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया कि करीब साढ़े चार साल की इतनी लंबी देरी के लिए पर्याप्त कारण क्या था। इसी बात पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच की नाराजगी
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति पीबी वराले की बेंच ने 5 दिसंबर को दिए आदेश में कहा कि वे यह देखकर हैरान हैं कि हाई कोर्ट ने मात्र अनुरोध पर 1,612 दिन की देरी माफ कर दी, जबकि आदेश में यह तक नहीं बताया गया कि देरी क्यों और कैसे हुई। बेंच ने संकेत दिया कि देरी माफी से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने और स्थापित फैसलों का पालन किया जाना जरूरी है।
पुराने फैसलों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने दो पूर्व निर्णयों का विशेष रूप से उल्लेख किया। पहले मामले में, केंद्र सरकार बनाम जहांगीर बाईरामजी में, केंद्र सरकार ने 12 साल से अधिक देरी से अपील दायर की थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि देरी कितनी भी हो, हर दिन की देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण देना आवश्यक है और केवल यह कहना कि सरकारी फाइलों में देरी हो गई, पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता।
दूसरे मामले शिवम्मा बनाम कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड में भूमि विवाद से जुड़ी अपील लगभग 11 साल यानी 3,966 दिन की देरी से दाखिल की गई थी। वहां हाई कोर्ट ने देरी माफ कर दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पलटते हुए कहा था कि लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत पूरी देरी अवधि के लिए ठोस और तार्किक कारण दिया जाना जरूरी है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि लंबी देरी को केवल सहानुभूति के आधार पर माफ नहीं किया जा सकता।
कोविड-19 का तर्क स्वीकार नहीं
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि देरी कोविड-19 महामारी के कारण हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट के आदेश में कहीं भी कोविड-19 का उल्लेख नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि बाद में दिया गया कारण हाई कोर्ट के पहले से दिए गए आदेश को सही नहीं ठहरा सकता, क्योंकि आदेश में स्वयं यह कारण दर्ज ही नहीं था।
मामला वापस हाई कोर्ट को
इन सभी पहलुओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट का देरी माफी वाला आदेश रद्द कर दिया। साथ ही, मामले को फिर से हाई कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया गया कि सभी पक्षों को सुनकर और स्थापित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए कानून के अनुसार नया फैसला किया जाए। इस तरह शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि देरी माफी के मामलों में न्यायालयों को कारणों का विस्तार से उल्लेख करना और सीमित अवधि संबंधित प्रावधानों का कड़ाई से पालन करना आवश्यक है।
Arvind Vishwakarma