तारिक रहमान 17 साल बाद लौटे, बांग्लादेश की सियासत गरम

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तारिक रहमान 17 साल बाद लौटे, बांग्लादेश की सियासत गरम

तारिक रहमान की ऐतिहासिक वापसी के साथ बांग्लादेश की राजनीति में हलचल

बांग्लादेश ने 17 साल बाद अपने एक बड़े राजनीतिक चेहरे की वापसी देखी, जब बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान लंदन से ढाका पहुंचे। उनकी घर वापसी ने देश की राजनीति, आने वाले चुनाव और क्षेत्रीय समीकरणों पर नई बहस छेड़ दी है।

शानदार स्वागत, रोड शो और भावुक क्षण

ढाका के हजरत शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तारिक रहमान के स्वागत के लिए बीएनपी के एक लाख से अधिक कार्यकर्ता और समर्थक जुटे। एयरपोर्ट से 300 फीट रोड तक उनके काफिले ने करीब 13 किलोमीटर लंबा रोड शो किया, जिसे पूरा करने में तीन घंटे से अधिक समय लगा। खास तौर पर तैयार लाल-हरे रंग की बस, सुरक्षा के कड़े इंतजाम और सड़कों के किनारे लगे बैनरों ने इसे एक बड़े शक्ति प्रदर्शन में बदल दिया।

एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही तारिक ने जूते उतारकर नंगे पैर जमीन पर कदम रखा और थोड़ी मिट्टी उठाकर माथे से लगाया, जिससे लौटने के भावुक क्षणों की झलक मिली। उनकी पत्नी जुबैदा रहमान, बेटी जैमा और परिवार के अन्य सदस्य भी उनके साथ थे, यहां तक कि वे अपनी पालतू बिल्ली जीबू को भी विशेष व्यवस्था के तहत साथ लाए।

खालिदा जिया से मुलाकात, बीमारी ने बढ़ाया राजनीतिक भार

रोड शो के बाद तारिक सीधे बसुंधरा आवासीय इलाके के एवरकेयर अस्पताल पहुंचे, जहां 80 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी अध्यक्ष खालिदा जिया गंभीर बीमारी के चलते आईसीयू में भर्ती हैं। वे लिवर, किडनी, डायबिटीज, गठिया और आंखों से जुड़ी समस्याओं से लंबे समय से जूझ रही हैं और हाल में सीने के इंफेक्शन ने उनकी स्थिति और नाजुक कर दी है।

अस्पताल के भीतर उनके साथ बीएनपी के शीर्ष नेता मौजूद रहे, जबकि बाहर हजारों कार्यकर्ता और समर्थक नारे लगाते रहे। मां से मुलाकात के बाद तारिक अपने गुलशन स्थित पैतृक आवास के लिए रवाना हुए, जो उनके पिता और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की संपत्ति है। खालिदा पास के ही फिरोजा नामक बंगले में रहती हैं।

भाषण में शांति, लोकतंत्र और सुरक्षित बांग्लादेश की बात

300 फीट रोड पर आयोजित स्वागत समारोह में तारिक ने लगभग 17 मिनट का भाषण दिया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की जनता बोलने का अधिकार वापस चाहती है और अब समय है कि सभी मिलकर देश का निर्माण करें। उन्होंने बांग्लादेश को पहाड़ों और मैदानों के लोगों, मुसलमानों, हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों का साझा देश बताते हुए एक सुरक्षित बांग्लादेश का संकल्प दोहराया, जहां हर महिला, पुरुष और बच्चा सुरक्षित रूप से घर से निकल और लौट सके।

तारिक ने हिंसा से बचने की अपील की और कहा कि बांग्लादेश का पुनर्निर्माण लोकतांत्रिक नींव और मजबूत आर्थिक आधार पर होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि उनके पास देश को बेहतर बनाने के लिए एक स्पष्ट योजना है और शांति व गरिमा की रक्षा हमेशा पहली प्राथमिकता रहेगी। भाषण में उन्होंने मार्टिन लूथर किंग जूनियर के “आई हैव ए ड्रीम” वाले भाषण का जिक्र करते हुए शांति और अधिकारों की लड़ाई को उदाहरण के रूप में पेश किया।

दिलचस्प रूप से, पूरे संबोधन में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का नाम तक नहीं लिया, जबकि 2008 में उन्हीं की सरकार के समय भ्रष्टाचार मामलों के बीच वे देश छोड़कर गए थे। सोशल मीडिया पर उन्होंने एक पोस्ट में यह भी लिखा कि सत्ता देना और छीनना ईश्वर के हाथ में है, और सम्मान व अपमान भी वही तय करता है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि: ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ से नई पिच तक

बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से दो नेताओं – अवामी लीग की शेख हसीना और बीएनपी की खालिदा जिया – के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 1980 के दशक में दोनों ने मिलकर सैन्य शासन के खिलाफ संघर्ष किया था, लेकिन 1991 में खालिदा के सत्ता में आने के बाद दोनों के बीच राजनीतिक दुश्मनी गहराती गई। इसे मीडिया ने ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ नाम दिया।

अब अवामी लीग पर प्रतिबंध लग चुका है और अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस साफ कर चुके हैं कि हसीना की पार्टी आगामी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेगी। ऐसे माहौल में बीएनपी देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देखी जा रही है और तारिक की वापसी इस शक्ति संतुलन को और निर्णायक बना सकती है।

आगामी चुनाव, उम्मीदवार और नए समीकरण

बांग्लादेश में आम चुनाव 12 फरवरी 2026 को तय हैं और अंतरिम सरकार हिंसा के बीच भी तारीख बरकरार रखने पर अड़ी है। बीएनपी ने घोषणा की है कि तारिक बोगुरा-6 सीट से चुनाव लड़ेंगे, जो पहले उनकी मां खालिदा जिया की परंपरागत सीट रही है।

जुलाई 2024 में शेख हसीना के खिलाफ हुए आंदोलनों के बाद उभरी नेशनल सिटिजन्स पार्टी (एनसीपी) अब बीएनपी की मुख्य चुनावी चुनौती मानी जा रही है। एनसीपी की जड़ें जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन से जुड़ी हैं। पहले शेख हसीना सरकार ने जमात पर हिंसा के आरोप में प्रतिबंध लगाया था, लेकिन अंतरिम सरकार के दौरान यह प्रतिबंध हट गया और सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी का पंजीकरण बहाल कर दिया।

रिपोर्टों के अनुसार एनसीपी, जमात-ए-इस्लामी के साथ सीटों के बंटवारे पर बातचीत कर रही है। माना जा रहा है कि एनसीपी को लगभग 30 सीटें मिल सकती हैं और बाकी पर वह अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी, बल्कि जमात को समर्थन देगी। इस संभावित गठबंधन को लेकर एनसीपी के भीतर विरोध भी उभरा है, जिसके चलते संयुक्त सदस्य सचिव मीर अरशदुल हक ने इस्तीफा दे दिया और खुले तौर पर तारिक के दृष्टिकोण को समर्थन देने की बात कही।

समर्थन, विरोध और सुरक्षा की चुनौतियां

तारिक की वापसी पर अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने इसे बांग्लादेश की राजनीति में खालीपन भरने वाला कदम बताया और उनकी सुरक्षा में हर संभव मदद का आश्वासन दिया। तारिक खुद भी यूनुस को फोन कर सुरक्षा और व्यवस्थाओं के लिए धन्यवाद दे चुके हैं।

दूसरी ओर, अवामी लीग के छात्र संगठन बांग्लादेश स्टूडेंट्स लीग ने इस वापसी को “फासीवादी राजनीति” और एकतरफा चुनाव की तैयारी बताया। उनके नेताओं ने आरोप लगाया कि तारिक 2004 के हमले सहित कई मामलों में दोषी ठहराए गए हैं और न्यायिक प्रक्रिया से बचते रहे हैं, इसलिए उनकी वापसी से देश की समस्याएं हल नहीं होंगी, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है।

जमीन पर भी तनाव साफ दिखा। तारिक के स्वागत कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ढाका जा रहे बीएनपी के छात्र संगठन के एक कार्यकर्ता की रास्ते में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, जिससे माहौल और संवेदनशील हो गया। सुरक्षा एजेंसियों ने ढाका और एयरपोर्ट के आसपास कड़ी व्यवस्था की, कई सड़कों को बंद रखा और सेना, पुलिस तथा सीमा सुरक्षा बल के अतिरिक्त जवान तैनात किए।

क्षेत्रीय और भारतीय परिप्रेक्ष्य

भारतीय रणनीतिक विश्लेषकों की नजर भी तारिक की वापसी पर है। जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार के अनुसार, उनका ऐसे समय लौटना जब अवामी लीग चुनावी मैदान से बाहर है, बहुत महत्वपूर्ण घटना है। हालांकि वे मानते हैं कि तारिक के प्रधानमंत्री बनने पर अभी निश्चित टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि जमात-ए-इस्लामी भी अपना उम्मीदवार सामने लाने की तैयारी में है।

विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर तारिक आगे चलकर सत्ता में आते हैं, तो बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के प्रभाव बढ़ने की आशंका से भारत चिंतित हो सकता है। पाकिस्तान के साथ लंबे समय से लंबित रक्षा समझौते को आगे बढ़ाने की संभावना भी बताई जा रही है, जो पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम जैसे सीमावर्ती भारतीय राज्यों के लिए सुरक्षा चुनौती बन सकती है।

निष्कर्ष: एक वापसी, कई सवाल

तारिक रहमान की 17 साल बाद वापसी केवल एक राजनीतिक नेता का घर लौटना नहीं, बल्कि बांग्लादेश की बदलती सत्ता राजनीति, धर्म आधारित दलों की भूमिका, अंतरिम सरकार की विश्वसनीयता और क्षेत्रीय सुरक्षा की नई कहानी की शुरुआत है। एक तरफ बीएनपी समर्थक उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की उम्मीद के रूप में देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनके विरोधी उन्हें दोषसिद्ध नेता और अस्थिरता का कारण बता रहे हैं।

आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष, गंभीर रूप से बीमार मां की राजनीतिक विरासत को किस तरह संभालते हैं, एनसीपी और जमात-ए-इस्लामी के गठजोड़ का क्या रूप बनता है और अंतरिम सरकार कितनी निष्पक्षता से चुनाव करा पाती है। फिलहाल इतना तय है कि ढाका की सड़कों पर उमड़े जनसमूह ने बांग्लादेश की अगली राजनीतिक पारी को लेकर उत्साह और अनिश्चितता, दोनों को एक साथ सामने रख दिया है।

Lokendra Mishra