✅✅ फिल्मी गाने की यह पंक्ति अगर दतिया की सियासत पर फिट बैठाई जाए तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है “यह मुलाकात एक बहाना है… प्यार का सिलसिला पुराना है…” मगर सियासत में प्यार शब्द थोड़ा बदल जाता है… यहां प्यार की जगह पावर और सिलसिले की जगह सियासी समीकरण पढ़े जाते हैं… दतिया की हार के बाद मुलाकातों का मेला लगा है… कभी घर पर गुफ्तगू… कभी संगठन से संवाद… कभी मुख्यमंत्री से संपर्क… कभी दिल्ली दरबार में दस्तक… सवाल यही कि ये सिर्फ शिष्टाचार की श्रृंखला है या सियासत की सीढ़ी?.. दादा की दस्तक में दम है… दादा की दिशा में दांव है… दादा के संवाद में दूर की राजनीति का दर्शन है… कभी जिन रिश्तों में चुनावी गर्मी की आंच थी… अब वही रिश्ते मुलाकात की मिठास में मापे जा रहे हैं… मानो राजनीति कह रही हो—“रूठे राही को रास्ते पर लाना है… पुराने रिश्तों को फिर से निभाना है…” लेकिन सियासत में मुलाकात मतलब मंजिल नहीं… मुस्कान मतलब मुहर नहीं… तस्वीर मतलब टिकट नहीं… और दिल्ली की दस्तक मतलब नई जिम्मेदारी भी नहीं… फिर भी तस्वीरें बोलती हैं… चेहरे के भाव पढ़े जाते हैं… साथ खड़े होने की दूरी तक राजनीतिक गणित में गिनी जाती है… दतिया में एक अध्याय हार का था… अब दूसरा अध्याय मेल, मनुहार और भविष्य की मंथन-मुद्रा का दिखाई दे रहा है… तो क्या दादा फिर दांव पर हैं?.. या दादा ने सिर्फ इतना समझ लिया है कि सियासत में हार से हिसाब होता है… लेकिन राजनीति हार के बाद भी जारी रहती है… आखिर गाने की अगली पंक्ति जैसी सियासत भी शायद यही कह रही है— “मुलाकातें बढ़ती जाएंगी… उम्मीदें करवट लेती जाएंगी… और वक्त बताएगा कि यह सिर्फ मुलाकात थी… या वापसी की भूमिका!” ✅बॉक्स✅ ✅✅( दतिया की हार का चैप्टर क्लोज… दादा के फिर बढ़ते कदम)✅✅ दतिया उपचुनाव में हार के बाद भाजपा के भीतर उठे सवालों की स्याही अभी पूरी तरह सूखी भी नहीं थी कि सियासत की तस्वीर बदलती दिखाई देने लगी… चुनाव में टिकट कटने से लेकर चुनावी हार तक जिन रिश्तों में गर्मी दिखाई दे रही थी, उन्हीं रिश्तों में अब मेल-मुलाकात की मिठास क्यों घुलने लगी?.. भोपाल से दिल्ली तक बढ़ती मुलाकातें क्या महज शिष्टाचार हैं या सियासत के बदलते मौसम का संकेत?.. क्या दतिया की हार का चैप्टर सचमुच क्लोज हो गया या भाजपा ने हार की फाइल बंद कर भविष्य की फाइल खोल दी है?.. राजनीति भी गजब की पाठशाला है… चुनाव के समय जो नेता दूर दिखाई देते हैं, नतीजे आने के बाद वही तस्वीर में पास खड़े नजर आने लगते हैं… कल तक टिकट, संगठन और चुनावी प्रबंधन पर सवाल थे… आज मुलाकात, सम्मान और संवाद सुर्खियों में हैं… तो क्या भाजपा की राजनीति में “बीती बात को भूलो, आगे की राह देखो” का नया अध्याय शुरू हो गया है?.. या फिर यह उस संगठन की रणनीतिक शतरंज है, जहां मोहरे नहीं बदले जाते… बस उनकी चाल का वक्त बदला जाता है?.. नरोत्तम मिश्रा से आशुतोष तिवारी की मुलाकात… मुख्यमंत्री से संवाद… प्रदेश नेतृत्व से संपर्क… संगठन के वरिष्ठ नेताओं की आवाजाही… ओरछा के मंच पर सम्मानजनक मौजूदगी… और फिर दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात… इन घटनाओं को अलग-अलग तस्वीर मानें तो सामान्य मुलाकातें हैं… लेकिन इन्हें एक साथ रखें तो सवाल बड़ा है—क्या दतिया की हार ने भाजपा के भीतर टकराव की राजनीति को पीछे धकेलकर तालमेल की राजनीति को आगे कर दिया है?.. सियासत का संदेश शायद इतना ही है… हार का हिसाब जरूरी है, लेकिन भविष्य की राजनीति उससे भी ज्यादा जरूरी… अब देखना यह है कि दतिया में अगला चेहरा कौन होगा—दादा या नई पीढ़ी?.. और बदलती भाजपा में दतिया की यह कहानी आखिर किस करवट बैठती है?.. ✅✅ दतिया उपचुनाव की हार ने भाजपा के भीतर जो सवाल खड़े किए थे… क्या अब उन सवालों पर धीरे-धीरे पर्दा गिर रहा है?.. क्या दतिया की हार का राजनीतिक हिसाब अब पीछे छूटता दिखाई दे रहा है और नरोत्तम मिश्रा यानी ‘दादा’ के कदम फिर उसी राजनीतिक गलियारे में बढ़ने लगे हैं, जहां कुछ समय पहले उनके सामने सवाल ही सवाल खड़े थे?.. सियासत में कभी-कभी एक तस्वीर पूरी कहानी नहीं बताती… लेकिन लगातार बनती तस्वीरों की श्रृंखला बहुत कुछ कह जाती है… दतिया उपचुनाव के बाद नरोत्तम मिश्रा और आशुतोष तिवारी की मुलाकात से शुरू हुआ मेल-मिलाप का सिलसिला… फिर प्रदेश नेतृत्व से संपर्क… मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात… प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से संवाद… संगठन के वरिष्ठ नेताओं की मुलाकातें… ओरछा की प्रदेश कार्यसमिति में नरोत्तम की सम्मानजनक मौजूदगी… और अंततः भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से दिल्ली में मुलाकात… इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो राजनीतिक संकेतों का एक नया फ्रेम बनता दिखाई देता है… दतिया की हार… या दतिया का हिसाब?.. उपचुनाव भाजपा के लिए परिणाम की दृष्टि से झटका था… आशुतोष तिवारी उम्मीदवार थे और नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना दतिया की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रसंग बना था… टिकट कटने के बाद समर्थकों की नाराजगी और सड़क पर हुए विरोध ने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि आखिर दतिया में संगठन और स्थानीय नेतृत्व के बीच वह कौन-सी दूरी थी, जिसने चुनावी प्रबंधन को प्रभावित किया?.. लेकिन चुनाव हारने के बाद राजनीति का अगला अध्याय शुरू हुआ… और इस अध्याय में सबसे पहली महत्वपूर्ण तस्वीर नरोत्तम मिश्रा और आशुतोष तिवारी की मुलाकात की सामने आई… इसे सिर्फ दो नेताओं की मुलाकात मानना आसान है… लेकिन राजनीति में मुलाकातें मौसम का तापमान बताती हैं… यदि चुनाव से पहले रिश्तों में तनाव था और चुनाव के बाद दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर आए, तो यह कम से कम इतना संकेत जरूर देता है कि दतिया की राजनीति को स्थायी टकराव के रास्ते पर ले जाने की इच्छा फिलहाल दिखाई नहीं देती… बर्फ पिघली… लेकिन पानी किस दिशा में बहेगा?.. यहीं से भाजपा की आंतरिक राजनीति का अगला सवाल शुरू होता है… दतिया जिला भाजपा संगठन की कार्यकारिणी पहले ही भंग की जा चुकी थी… ऐसे में संगठनात्मक पुनर्गठन और नेतृत्व का सवाल अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है… आशुतोष तिवारी स्वयं जिला अध्यक्ष की दावेदारी से इनकार कर चुके हैं… वहीं नए जिला अध्यक्ष और नई कार्यकारिणी की तस्वीर सामने आना अभी बाकी है… इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि दतिया का अध्याय पूरी तरह बंद हो गया… असल में चुनावी अध्याय बंद हो सकता है… लेकिन संगठनात्मक अध्याय अभी खुला है… यही वह जगह है जहां नरोत्तम और आशुतोष के बीच भविष्य की राजनीतिक भूमिका का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है… ‘दादा’ को सम्मान… क्या संदेश है? ओरछा की प्रदेश कार्यसमिति में नरोत्तम मिश्रा की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को नया राजनीतिक अर्थ दिया… खासकर तब, जब उनकी धमाकेदार एंट्री, सम्मान और बाद में वरिष्ठ नेताओं के साथ मौजूदगी चर्चा का विषय बनी… मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ उनकी तस्वीर… राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिव प्रकाश के साथ दिखाई देना… क्षेत्रीय सह-संगठन महामंत्री अजय जामवाल का उनसे मिलना… मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं का उनके आवास पहुंचना… और फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से दिल्ली में मुलाकात… इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक बात साफ दिखाई देती है—नरोत्तम मिश्रा अब राजनीतिक रूप से अलग-थलग दिखाई देने वाले नेता की तस्वीर में नहीं हैं… लेकिन इसका अर्थ यह निकालना भी उचित नहीं होगा कि उन्हें कोई नई जिम्मेदारी तय हो गई है या दतिया की राजनीति में उनकी भूमिका औपचारिक रूप से पुनर्स्थापित हो गई है… वह निष्कर्ष अभी उपलब्ध संकेतों से आगे निकल जाएगा… लेकिन राजनीति में कभी-कभी खामोशी भी संकेत होती है और सम्मान भी संकेत… एक्शन नहीं हुआ… क्या यही सबसे बड़ा संकेत है?.. दतिया उपचुनाव के बाद यदि संगठन के भीतर चुनावी प्रबंधन और स्थानीय राजनीति को लेकर सवाल उठे थे, तो अब तक किसी बड़ी सार्वजनिक कार्रवाई का सामने न आना भी अपने आप में राजनीतिक चर्चा का विषय है… क्या पार्टी नेतृत्व ने चुनाव को एक अलग घटना मानकर आगे बढ़ने का फैसला किया?.. क्या नरोत्तम के खिलाफ गंभीर संगठनात्मक कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार नहीं बना?.. या फिर भाजपा नेतृत्व ने यह समझ लिया कि दतिया की राजनीति को दंड की राजनीति से ज्यादा संवाद और पुनर्संयोजन की जरूरत है?.. इन सवालों के निश्चित उत्तर नेतृत्व ही जानता है… लेकिन घटनाक्रम की दिशा यह जरूर बता रही है कि भाजपा अब दतिया के पुराने विवाद को स्थायी राजनीतिक लड़ाई में बदलने के मूड में दिखाई नहीं देती… हेमंत की सियासत… टकराव नहीं, तापमान कम करने की कोशिश?.. यहां प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की शैली भी महत्वपूर्ण हो जाती है… हेमंत की राजनीति अब तक समन्वय, संवाद और संतुलन की राजनीति के रूप में दिखाई देती है… दतिया जैसे संवेदनशील राजनीतिक मामले में भी यदि पुरानी प्रतिस्पर्धाओं को स्थायी संघर्ष बनने से रोका जाता है, तो यह उसी कार्यशैली के अनुरूप दिखाई देगा… हेमंत के सामने चुनौती सिर्फ किसी एक नेता को साधने की नहीं है… उन्हें संगठन में यह संदेश भी देना है कि चुनावी हार के बाद समीक्षा होगी… लेकिन समीक्षा का अर्थ स्थायी गुटबंदी नहीं होगा… संगठन को सजा से ज्यादा संरचना चाहिए… शिकायत से ज्यादा समाधान चाहिए… और प्रतिस्पर्धा से ज्यादा परिणाम चाहिए… नरोत्तम बनाम आशुतोष… अगला चेहरा कौन?.. दतिया का सबसे बड़ा सवाल अब यही है… क्या भाजपा का चेहरा फिर नरोत्तम मिश्रा होंगे?.. या आशुतोष तिवारी को भविष्य की राजनीति के लिए आगे बढ़ाया जाएगा?.. यह मुकाबला केवल दो व्यक्तियों का नहीं है… यह भाजपा की दो राजनीतिक जरूरतों का भी प्रतीक बन सकता है… नरोत्तम मिश्रा के पास लंबा राजनीतिक अनुभव, प्रदेश स्तर की पहचान और संगठन तथा सत्ता के गलियारों का व्यापक अनुभव है… दूसरी तरफ आशुतोष तिवारी हालिया उपचुनाव में पार्टी के उम्मीदवार रहे और दतिया की नई राजनीतिक परिस्थितियों में उनकी अपनी भूमिका का सवाल मौजूद है… इसलिए भाजपा के लिए चुनौती किसी एक को चुनना भर नहीं है… चुनौती यह है कि दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा को संगठन की शक्ति बनाया जाए या प्रतिस्पर्धा को फिर संगठन की कमजोरी बनने दिया जाए?.. दादा के बढ़ते कदम… वापसी या सिर्फ संवाद?.. नरोत्तम मिश्रा की लगातार बढ़ती राजनीतिक दृश्यता को फिलहाल ‘वापसी’ कहना जल्दबाजी होगी… लेकिन इसे केवल संयोगों की श्रृंखला मान लेना भी राजनीति की भाषा को बहुत सरल कर देना होगा… प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात… मुख्यमंत्री से संवाद… संगठन के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क… ओरछा के मंच पर सम्मानजनक मौजूदगी… और राष्ट्रीय अध्यक्ष से दिल्ली में मुलाकात… एक मुलाकात संयोग हो सकती है… दो मुलाकातें संवाद हो सकती हैं… लेकिन लगातार बनती मुलाकातों की श्रृंखला राजनीतिक संकेत जरूर पैदा करती है… यही वजह है कि दतिया का चैप्टर शायद बंद नहीं हुआ… बल्कि उसकी फाइल का अगला पन्ना खुला है… दतिया में अब हार से ज्यादा भविष्य का सवाल दतिया की हार का राजनीतिक तापमान अब पहले जैसा नहीं दिखाई देता… बर्फ पिघलती दिखाई दे रही है… पुराने रिश्ते फिर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं… और ‘दादा’ के कदम फिर संगठन के बड़े फ्रेम में नजर आ रहे हैं… लेकिन अंतिम फैसला अभी बाकी है… जिला भाजपा की नई कार्यकारिणी कौन बनाएगा?.. उसमें किन चेहरों को जगह मिलेगी?.. नरोत्तम समर्थकों की भूमिका क्या होगी?.. आशुतोष की अगली राजनीतिक जिम्मेदारी क्या होगी?.. और सबसे बड़ा सवाल—क्या दोनों धाराओं को एक साथ चलाने का फार्मूला भाजपा खोज पाएगी?.. क्योंकि दतिया की राजनीति में चेहरा सिर्फ वह नहीं होता जो चुनाव लड़ता है… चेहरा वह भी होता है जिसके आसपास संगठन, कार्यकर्ता और राजनीतिक स्वीकार्यता फिर से जमा होने लगे… इस लिहाज से देखें तो दतिया उपचुनाव की हार का चैप्टर शायद क्लोज हो रहा है… लेकिन दतिया की भाजपा की नई कहानी अभी लिखी जानी बाकी है… और उस कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा— दादा के फिर बढ़ते कदम क्या सिर्फ पुराने रिश्तों की वापसी हैं?.. या भाजपा के भीतर नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक पुनर्संतुलन की शुरुआत?.. दतिया का चुनाव हार गया भाजपा उम्मीदवार… लेकिन दतिया की राजनीति की अगली बाजी कौन जीतेगा—नरोत्तम या आशुतोष?.. दोनों दतिया से विधानसभा का एक-एक चुनाव हार चुके.. आशुतोष सरकार में रहते उपचुनाव हार गए पुनरुत्तम पिछला विधानसभा का चुनाव जीत नहीं पाए.. अलबत्ता दतिया से ही जीत की हैट्रिक लगाकर उन्होंने भाजपा ही नहीं प्रदेश की राजनीति में अपनी सफलता सुनिश्चित की थी.. स्वतंत्रता दिवस पर दोनों समर्थकों के झंडा वंदन की प्रतिस्पर्धा कहे या जोर आजमाइश से जो दृश्य बना था क्या हुआ विवाद का अंत था या फिर शुरुआत इसके लिए इंतजार करना होगा.. यही सियासत की असली समस्या जिसका समाधान समय रहते बहुत जरूरी है… क्योंकि चुनाव का परिणाम एक दिन बताता है… लेकिन संगठन का फैसला आने वाले कई सालों की राजनीति तय करता है… प्रदेश अध्यक्ष हेमंतखंडेलवाल ने संगठन के मुखिया के नाते सिर्फ हर से उपजी समस्या का अवलोकन नहीं किया बल्कि भविष्य की चुनौती को ध्यान में रखते हुए कोई बड़ा अप्रत्याशित फैसला रोक कर जो फैसला लिया शायद उससे बर्फ पिघल रही है.. नेतृत्व की नजर में आज भी नरोत्तम उत्तम है तो आशुतोष की भी नई आस अपेक्षा को समझना होगा..
“यह मुलाकात एक बहाना है… दिल फिर से जीतकर आगे जाना है!” .( दादा की मुलाकातों में मेल-मिलाप है या मिशन की नई मुनादी?) सवाल दर सवाल ..(राकेश अग्निहोत्री)