आयुष्मान भारत योजना: मध्य प्रदेश में 295 निजी अस्पताल बाहर होने की कगार पर
मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार के एक नए आदेश के तहत निजी अस्पतालों के लिए नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (NABH) का सर्टिफिकेट अनिवार्य किया गया है। इस नियम के कारण भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों के लगभग 295 निजी अस्पताल इस योजना से बाहर हो सकते हैं, जिससे मरीजों के इलाज पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।
निजी अस्पतालों का विरोध प्रदर्शन
सरकार के इस फैसले के विरोध में यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल डायरेक्टर एसोसिएशन ने मंगलवार को आयुष्मान कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। एसोसिएशन ने सरकार से इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की है। उनके अनुसार, यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया है और इससे आयुष्मान भारत जैसी महत्वपूर्ण योजना केवल कुछ बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों तक ही सीमित रह जाएगी।
मरीजों और स्वास्थ्य क्षेत्र पर असर
एसोसिएशन के वाइस प्रेसीडेंट धनंजय मिश्रा ने बताया कि NABH फाइनल लेवल सर्टिफिकेट हासिल करना एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है, जिसे सभी अस्पताल तुरंत पूरा नहीं कर सकते। यदि छोटे और मध्यम आकार के अस्पताल योजना से बाहर होते हैं, तो मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी और उनके पास विकल्पों की कमी होगी। भोपाल जैसे शहर में केवल 22 अस्पताल ही बचेंगे जहां आयुष्मान कार्डधारकों को इलाज मिल पाएगा। इस स्थिति से छोटे अस्पताल, फार्मास्युटिकल कंपनियां और इस क्षेत्र से जुड़े लगभग ढाई लाख लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि देश के कई अन्य राज्यों में आयुष्मान योजना के लिए इस तरह की सख्त शर्तें लागू नहीं हैं।
सरकार का पक्ष: गुणवत्ता सुधारना उद्देश्य
दूसरी ओर, स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता में सुधार करना है। NABH सर्टिफिकेशन से मरीजों को बेहतर सुविधाएं और मानक उपचार मिल सकेगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर ऊपर उठेगा। हालांकि, निजी अस्पतालों का तर्क है कि गुणवत्ता सुधार के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में अस्पतालों को योजना से बाहर करना मरीजों के लिए मुश्किलें बढ़ाएगा।
Sharad Shrivastava