बंगाल और लद्दाख के राज्यपालों का इस्तीफा, ममता ने केंद्र पर एकतरफा फैसले का आरोप लगाया
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस और लद्दाख के उपराज्यपाल कवींद्र गुप्ता ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। सीवी आनंद बोस ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा है और फिलहाल वे दिल्ली में मौजूद हैं।
पश्चिम बंगाल में नए राज्यपाल की नियुक्ति और ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया
तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि को पश्चिम बंगाल का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस नियुक्ति पर हैरानी व्यक्त की। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृहमंत्री ने उन्हें सूचित किया है कि आरएन रवि को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया जा रहा है। ममता बनर्जी ने इस फैसले को केंद्र का एकतरफा निर्णय बताते हुए कहा कि इस संबंध में उनसे कोई राय नहीं ली गई है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने X पर लिखा, "बोस के इस्तीफे की खबर अचानक आने से मैं हैरान हूं। अभी तक मुझे उनके इस्तीफे की असली वजह के बारे में जानकारी नहीं है।" उन्होंने आगे कहा, "केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुझे बताया है कि आरएन रवि को बंगाल का नया गवर्नर बनाया जा रहा है। यह एकतरफा फैसला है। तय परंपरा के अनुसार मुझसे कोई सलाह नहीं ली गई।"
राज्यपाल बोस का कार्यकाल और प्रमुख विवाद
सीवी आनंद बोस ने 23 नवंबर 2022 को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का पद संभाला था। उनके कार्यकाल के दौरान ममता सरकार और राजभवन के बीच कई बार मतभेद सामने आए। ये मतभेद विशेष रूप से विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों, प्रशासनिक हस्तक्षेप और कुछ संवैधानिक मुद्दों को लेकर थे। लद्दाख के उपराज्यपाल कवींद्र गुप्ता ने 18 जुलाई 2025 को कार्यभार संभाला था।
CM ममता और राज्यपाल बोस के बीच सामने आए प्रमुख विवाद
राज्यपाल बोस ने राज्य के कई विश्वविद्यालयों में कुलपतियों (VC) की नियुक्ति की, जिस पर राज्य सरकार ने आपत्ति जताई। सरकार का आरोप था कि ये नियुक्तियां राज्य की सलाह के बिना हुईं, जबकि राज्यपाल ने इसे कानून के तहत अपना अधिकार बताया। यह मामला अदालत तक पहुंचा, जिससे उच्च शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई।
राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि राज्यपाल कई विधेयकों पर मंजूरी में देरी कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने इसे 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा' बताया। राज्यपाल का पक्ष था कि विधेयकों की संवैधानिक जांच आवश्यक है। इससे सरकार और राज्यपाल के संबंध और तनावपूर्ण हुए।
राज्यपाल ने मनरेगा सहित केंद्रीय योजनाओं में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए। राज्य सरकार ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया। दोनों पक्षों के बयानों से केंद्र-राज्य संबंधों पर भी असर पड़ा।
राज्यपाल के जिलों के दौरे और जनता से सीधे संवाद पर सरकार ने आपत्ति जताई। सरकार ने इसे 'समानांतर प्रशासन' जैसा बताया, जबकि राज्यपाल ने इसे जनता से जुड़ने का अपना संवैधानिक दायित्व बताया था।
पश्चिम बंगाल लोक भवन से जुड़े यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आए, जिस पर राज्य सरकार ने जांच और कार्रवाई की मांग की। राज्यपाल ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे राजनीतिक दुर्भावना बताया। यह मामला राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहा, लेकिन तनाव बढ़ता रहा।
Satyam Tripathi