बंगाल में कार्यक्रम स्थल बदलने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू नाराज: राज्य सरकार आदिवासियों का भला नहीं चाहती

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बंगाल में कार्यक्रम स्थल बदलने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू नाराज: राज्य सरकार आदिवासियों का भला नहीं चाहती

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल में कार्यक्रम स्थल बदलने पर जताई नाराजगी

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल में 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस के कार्यक्रम स्थल को बदले जाने पर अपनी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि राज्य सरकार आदिवासियों का भला नहीं चाहती है। राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनकी छोटी बहन जैसी हैं और वह स्वयं भी बंगाल की बेटी हैं।

कार्यक्रम स्थल का बदलाव और प्रोटोकॉल का उल्लंघन

राष्ट्रपति ने बताया कि मूल रूप से कार्यक्रम सिलीगुड़ी के बिधाननगर में होना था, लेकिन इसे बागडोगरा एयरपोर्ट के पास गोपालपुर के एक छोटे मैदान फांसिदेवा में शिफ्ट कर दिया गया। उन्होंने कहा कि बिधाननगर में पर्याप्त जगह थी जहां अधिक लोग शामिल हो सकते थे, लेकिन राज्य प्रशासन ने वहां अनुमति क्यों नहीं दी, यह उन्हें नहीं पता। इस छोटे स्थल के कारण कई लोग कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। इसके अतिरिक्त, उत्तर बंगाल दौरे पर राष्ट्रपति को रिसीव करने के लिए मुख्यमंत्री या कोई राज्य मंत्री मौजूद नहीं था, जिसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना गया।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घटना को "शर्मनाक" बताते हुए कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर है और इस पद की गरिमा हमेशा बनी रहनी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि पश्चिम बंगाल सरकार और तृणमूल कांग्रेस को अपनी गलती का एहसास होगा।

वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति मुर्मू के बयान पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल पर टिप्पणी करने से पहले राष्ट्रपति को भाजपा शासित राज्यों की स्थिति देखनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि भाजपा राज्य को बदनाम करने के लिए राष्ट्रपति का इस्तेमाल कर रही है और उन्हें राज्य प्रतिनिधियों की गैर-मौजूदगी के बारे में गलत जानकारी दी गई थी।

संथाल समुदाय को राष्ट्रपति का संदेश

इस कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संथाल समुदाय के युवाओं से शिक्षा अपनाने और अपनी भाषा व परंपराओं को बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संथाल समुदाय के योगदान को सही पहचान नहीं मिली है और कई महान हस्तियों को जानबूझकर इतिहास में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसी संथाल हस्तियों के योगदान को याद किया।

Satyam Tripathi