दिल्ली की ललकार, लखनऊ में सत्ता संग्राम......( शाह के भरोसे और अखिलेश की चुनौती के बीच सियासी परीक्षा 2027 )..... खबरों की खबर*** (राजीव त्रिपाठी)

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दिल्ली की ललकार, लखनऊ में सत्ता संग्राम......( शाह के भरोसे और अखिलेश की चुनौती के बीच सियासी परीक्षा 2027 ).....
 खबरों की खबर*** (राजीव त्रिपाठी)

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सियासी बिसात बिछ चुकी है। दिल्ली से लखनऊ और हैदराबाद तक नेताओं के बयान संकेत दे रहे हैं कि मिशन 2027 की लड़ाई अब केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही। भाजपा सत्ता में बने रहने का विश्वास जता रही है, जबकि समाजवादी पार्टी परिवर्तन की जमीन तैयार करने में जुटी है। तीस अक्टूबर को लखनऊ में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति से अमित शाह ने चुनावी शंखनाद किया। भाजपा की सरकार को ‘अंगद का पांव’ बताकर उन्होंने कार्यकर्ताओं को अडिग रहने का संदेश दिया। 403 विधानसभा सीटों में 350 सीटें जीतने का लक्ष्य और तीसरी बार सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा भी सामने आया। यह केवल चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि संगठन को आक्रामक चुनावी मुद्रा में लाने की रणनीति थी। इसके ठीक दो दिन बाद दिल्ली के रामलीला मैदान से अखिलेश यादव ने शाह की चुनौती का जवाब दिया। उन्होंने पूछा कि पैरों के नीचे जमीन ही नहीं बचेगी तो अंगद का पांव कहां टिकेगा? मैदान को ‘लोकतंत्र की हल्दीघाटी’ बताकर अखिलेश ने 2027 में भाजपा की विदाई का दावा किया। स्पष्ट है कि अखिलेश राष्ट्रीय विपक्ष के मंच से उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का माहौल बनाना चाहते हैं। दिल्ली की महारैली में राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और कथित वोट चोरी को मुद्दा बनाया। निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए। दूसरी तरफ भाजपा ने आरोपों को खारिज करते हुए मतदाता सूची की शुद्धता को आवश्यक बताया। अब लोकतंत्र और जनादेश की व्याख्या को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। सोमवार, दो नवंबर को यह सियासी टकराव हैदराबाद पहुंच गया। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा में अमित शाह ने विपक्ष की दिल्ली रैली को ‘घुसपैठिया बचाओ’ अभियान करार दिया। राहुल गांधी की मॉक संसद पर भी कटाक्ष किया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने भागलपुर और कोलकाता में पदयात्राओं के जरिए विपक्षी अभियान का जवाब दिया। संदेश स्पष्ट है कि भाजपा सत्ता में रहते हुए भी सड़क की सियासत में पीछे नहीं रहना चाहती। खबरों की खबर यह है कि भाजपा अपनी संगठनात्मक ताकत, योगी सरकार के कामकाज और राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे तीसरी जीत का रास्ता तलाश रही है। दूसरी ओर अखिलेश पीडीए समीकरण, विपक्षी एकजुटता और सत्ता विरोधी मुद्दों को जनसमर्थन में बदलना चाहते हैं। लेकिन रोजगार, महंगाई, किसानों की स्थिति, कानून व्यवस्था और स्थानीय समीकरण चुनावी भाषणों से कहीं बड़ी कसौटी होंगे। दिल्ली की ललकार अब लखनऊ के सत्ता संग्राम का आधार बन रही है। शाह भाजपा की जमीन मजबूत होने का दावा कर रहे हैं, तो अखिलेश उसी जमीन के खिसकने की बात कह रहे हैं। सवाल यह नहीं कि किसका नारा अधिक प्रभावशाली है, बल्कि यह है कि किसकी बात मतदाता के विश्वास तक पहुंचती है। क्योंकि 2027 का जनादेश राजनीतिक दावों से नहीं, जनता के फैसले से निकलेगा। --- ### विशेष बॉक्स | भरोसा स्थिरता पर या बदलाव की बेचैनी पर? उत्तर प्रदेश की जनता अमित शाह के स्थिर सरकार के वादे पर भरोसा करेगी या अखिलेश यादव के सत्ता परिवर्तन के आह्वान पर? भाजपा निरंतरता, मजबूत संगठन और विकास के भरोसे चुनावी मैदान में उतरना चाहती है। समाजवादी पार्टी बदलाव, सामाजिक समीकरणों और सत्ता विरोधी असंतोष को अपनी ताकत मान रही है। लेकिन राजनीतिक सभाओं की भीड़ को जनादेश का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी। जमीनी परिस्थितियों, सामाजिक समीकरणों और मतदाताओं के वास्तविक रुझान की तस्वीर अभी स्पष्ट होनी बाकी है। सवाल केवल भाजपा की सत्ता बचने या सपा की वापसी का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का है। आखिर 2027 में उत्तर प्रदेश स्थिरता को चुनेगा या परिवर्तन को? अंतिम फैसला मतदाता ही करेगा।

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