सांसद जनार्दन का वार, क्या राजेंद्र के खिलाफ मोर्चा?: रीवा से उठे स्वास्थ्य व्यवस्था के सवाल, भोपाल और दिल्ली तक हलचल** सियासत के समीकरण( महेंद्र विश्वकर्मा)

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सांसद जनार्दन का वार, क्या राजेंद्र के खिलाफ मोर्चा?: रीवा से उठे स्वास्थ्य व्यवस्था के सवाल, भोपाल और दिल्ली तक हलचल**
सियासत  के समीकरण( महेंद्र विश्वकर्मा)

रीवा की राजनीति में भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा के तीखे तेवरों ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। डॉक्टरों को नोट छापने की मशीन बताने और उनके मेडिकल लाइसेंस निरस्त करने की मांग क्या केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर नाराजगी है, या इसके राजनीतिक निशाने पर मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल भी हैं? एक ही जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले भाजपा के दो प्रभावशाली नेताओं की अलग-अलग भूमिकाओं ने इस बयान को राजनीतिक महत्व दे दिया है। जनार्दन दिल्ली की संसद में रीवा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि राजेंद्र भोपाल में स्वास्थ्य विभाग की कमान संभालते हैं। ऐसे में सवाल स्वास्थ्य सेवाओं से आगे सरकार की जवाबदेही तक पहुंचता है। जनार्दन मिश्रा ने चिकित्सकों के खिलाफ बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया। उनका कहना है कि डॉक्टर मरीजों की सेवा के बजाय निजी कमाई को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि उनका वश चले तो सभी डॉक्टरों के लाइसेंस निरस्त कर दें। सवाल यह है कि जिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सत्ताधारी पार्टी का सांसद सार्वजनिक नाराजगी जता रहा है, उसकी राजनीतिक जवाबदेही आखिर किसकी बनती है? रीवा में प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत सहित इलाज में कथित लापरवाही के कई मामलों ने स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठाए हैं। कल्पना मिश्रा प्रकरण में चिकित्सकों और नर्सिंग अधिकारियों के निलंबन के साथ जांच की कार्रवाई भी हुई। राजेंद्र शुक्ल ने स्वयं पीड़ित परिवार से मुलाकात कर मजिस्ट्रियल जांच के निर्देश दिए थे। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन प्रश्न कार्रवाई की घोषणा से आगे उसके परिणाम और स्थायी सुधार का है। राजनीतिक दृष्टि से दिलचस्प पहलू यह है कि जनार्दन और राजेंद्र के रिश्ते लंबे समय से निकट रहे हैं। सांसद स्वयं वर्षों पुराने आपसी भरोसे का उल्लेख कर चुके हैं। ऐसे में ताजा बयान को सीधे भाजपा की गुटबाजी का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। फिर भी एक ही क्षेत्र के सांसद और मंत्री के बीच स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर उभरे सार्वजनिक सवाल पार्टी के आंतरिक समीकरणों पर चर्चा जरूर पैदा करते हैं। यहां तीसरा महत्वपूर्ण चेहरा कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा का है। वह पहले से राजेंद्र शुक्ल के खिलाफ स्वास्थ्य सेवाओं का मुद्दा उठाते रहे हैं। सितंबर में प्रसूता की मौत के मामले में उन्होंने भोपाल में प्रदर्शन कर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की थी। अब भाजपा सांसद की नाराजगी कांग्रेस के आरोपों को नया राजनीतिक आधार दे सकती है। सवाल यह भी है कि क्या सत्तापक्ष के भीतर से उठी आवाज अनजाने में विपक्ष को मोहन सरकार पर प्रहार करने का अवसर दे रही है? मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने भी यह केवल रीवा का स्थानीय विवाद नहीं है। स्वास्थ्य सेवाएं राज्य सरकार की सामूहिक जवाबदेही का हिस्सा हैं। यदि सांसद के आरोपों में व्यवस्थागत खामियां सामने आती हैं, तो जवाबदेही विभागीय नेतृत्व के साथ सरकार तक पहुंचेगी। दूसरी तरफ भाजपा प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के लिए प्रश्न होगा कि सांसद की नाराजगी को प्रशासनिक सुधार की मांग माना जाए या राजनीतिक असहमति का संकेत। फिलहाल किसी संगठनात्मक हस्तक्षेप की पुष्टि नहीं हुई है। सवाल यह है कि जनार्दन ने डॉक्टरों के खिलाफ आवाज उठाई है या उनके बयान ने राजेंद्र शुक्ल के नेतृत्व वाले स्वास्थ्य विभाग की राजनीतिक परीक्षा शुरू कर दी है? इसका उत्तर नेताओं की बयानबाजी नहीं, बल्कि जांच के निष्कर्ष, मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं और सरकार के अगले कदम देंगे। यदि व्यवस्था सुधरती है तो सांसद की नाराजगी का सकारात्मक परिणाम सामने आएगा। अन्यथा रीवा से उठा यह विवाद भोपाल की सरकार और भाजपा संगठन के लिए जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बना रहेगा।

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