सत्ता में रहकर सड़क पर क्यों भाजपा?.. राहुल की रामलीला रैली पर अमित शाह के हैदराबाद से पलटवार पदयात्राओं के पीछे क्या है सियासी रणनीति? (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)

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सत्ता में रहकर सड़क पर क्यों भाजपा?..
राहुल की रामलीला रैली पर अमित शाह के हैदराबाद से पलटवार  पदयात्राओं के पीछे क्या है सियासी रणनीति? (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)

सवाल दर सवाल | विशेष राजनीतिक विश्लेषण ✅ # सत्ता में रहकर सड़क पर क्यों भाजपा?✅ दिल्ली के रामलीला मैदान से राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोला, तो चौबीस घंटे के भीतर हैदराबाद की सड़क से अमित शाह ने जवाबी हमला बोल दिया। दूसरी ओर मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव और भाजपा का पूरा संगठन पदयात्राओं में उतर आया है। सवाल दिलचस्प है कि केंद्र में एनडीए और प्रदेश में भाजपा की सरकार होते हुए भी सत्ताधारी दल को सड़क पर अपनी बात कहने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या यह विपक्ष के अभियान का जवाब है, संगठन को सक्रिय रखने की रणनीति है या बदलते राजनीतिक विमर्श पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश? सवाल पहला—राहुल की चुनौती का जवाब सड़क से क्यों? एक नवंबर को राहुल गांधी ने दिल्ली की महारैली में कथित वोट चोरी के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ भविष्य में कानूनी कार्रवाई की बात कही। उन्होंने इसे संविधान और मताधिकार की लड़ाई बताया। इसके अगले दिन हैदराबाद में अमित शाह ने विपक्ष की ‘वोट बचाओ’ रैली को ‘घुसपैठिया बचाओ’ रैली बताया। उन्होंने मॉक संसद पर राहुल का उपहास करते हुए विशेष संसदीय सत्र में चर्चा की चुनौती भी दी। स्पष्ट है कि अब दोनों पक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की अपनी-अपनी व्याख्या जनता तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन दावों का फैसला भाषणों से नहीं, सत्यापित तथ्यों से होगा। सवाल दूसरा—मध्यप्रदेश में भाजपा को किसकी चिंता? मध्यप्रदेश में दिसंबर 2003 से भाजपा लगभग लगातार सत्ता में रही है। अपवाद दिसंबर 2018 से मार्च 2020 तक कमलनाथ सरकार का करीब पंद्रह महीने का कार्यकाल था। लंबे शासन में उपलब्धियों के साथ जनअपेक्षाएं और जवाबदेही भी बढ़ती हैं। ऐसे में इंदौर के बाद दो नवंबर को जबलपुर में मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और मंत्री राकेश सिंह की सक्रियता केवल राष्ट्रीय अभियान का विस्तार नहीं, प्रदेश संगठन के लिए जनसंपर्क का अवसर भी है। जबलपुर में मेघवाल ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने का आरोप लगाया। उनका तर्क था कि सड़कों पर मार्च निकालने से सत्ता परिवर्तन नहीं होता, चुनाव में जनता के सामने जाना पड़ता है। लेकिन इसी बयान से उलटा प्रश्न भी उठता है। यदि राजनीतिक फैसले जनादेश से होते हैं, तो भाजपा स्वयं सड़क की राजनीति को इतना महत्व क्यों दे रही है? सवाल तीसरा—भोपाल में राजनाथ की मौजूदगी का संदेश क्या? चार नवंबर को भोपाल के अटल पथ पर प्रस्तावित पदयात्रा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने की घोषणा हो चुकी है। विधायक रामेश्वर शर्मा ने बूथ स्तर से कार्यकर्ताओं की भागीदारी पर जोर दिया है। इसका एक अर्थ संगठनात्मक लामबंदी है। हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में यह अभियान कार्यकर्ताओं को साझा मुद्दा देकर उनकी सक्रियता और समन्वय की परीक्षा भी बन सकता है। लेकिन भोपाल में कांग्रेस ने पदयात्रा के मार्ग और संभावित यातायात अवरोध पर आपत्ति जताई है। इससे नया सवाल पैदा होता है कि लोकतंत्र के नाम पर सड़क पर उतरने वाले दल आम नागरिकों और व्यापारियों की सुविधा का कितना ध्यान रखेंगे? सवाल चौथा—क्या कांग्रेस की दिल्ली वाली ऊर्जा प्रदेश पहुंचेगी? रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन की एकजुटता दिखाई दी, लेकिन मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनौती अलग है। जीतू पटवारी और उमंग सिंघार को दिल्ली के राजनीतिक आरोपों के साथ प्रदेश के रोजगार, किसान, कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन के मुद्दों पर भी निरंतर सक्रियता दिखानी होगी। राहुल गांधी के आरोपों का प्रमाण प्रस्तुत करना और वैधानिक रास्तों पर आगे बढ़ना भी जरूरी है। बड़ी रैली अपने आप संगठनात्मक मजबूती का प्रमाण नहीं होती। सवाल पांचवां—मोहन सरकार के लिए असली कसौटी क्या? प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी लगभग दो वर्ष दूर हैं। भाजपा के लिए यह समय संगठन को सक्रिय रखने के साथ शासन के कामकाज की समीक्षा का भी है। रोजगार, निवेश के धरातलीय परिणाम, किसान आय और कानून-व्यवस्था पर सरकार को जनता के सवालों के जवाब देने होंगे। सड़क पर बड़ी भीड़ और राजनीतिक नारों से प्रशासनिक जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती। तो आखिर सत्ता में रहकर सड़क पर क्यों भाजपा? इसका एक संभावित राजनीतिक अर्थ है कि भाजपा राष्ट्रीय विमर्श को विपक्ष के हवाले नहीं छोड़ना चाहती। दूसरा, लंबे शासन के बावजूद संगठन की सक्रियता बनाए रखना चाहती है। लेकिन इसे राजनीतिक भय या जनसमर्थन का प्रमाण मानना भी जल्दबाजी होगी। असल सवाल यह है कि क्या राहुल की महारैली और भाजपा की पदयात्राएं संसद में तथ्यपूर्ण बहस तथा प्रदेश में जनता की समस्याओं के समाधान का रास्ता खोलेंगी? या लोकतंत्र बचाने के दो अलग-अलग नारों के बीच जनता के वास्तविक सवाल फिर पीछे छूट जाएंगे? सड़क पर सियासत का शोर है, लेकिन सत्ता और विपक्ष दोनों की परीक्षा सड़क से आगे जनता के सवालों के जवाब में होगी।

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