हेमंत की भाजपा का एक्शन..इंतजार मुख्यमंत्री के रिएक्शन का..!.'हेमंत' ने मंत्रियों को खारिज कर 'मोहन' का रास्ता किया साफ..! भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की नई प्रदेश कार्यकारिणी ने संगठन के भीतर कई नए राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं.. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समर्थन में खुलकर खड़े होने के बाद खंडेलवाल ने जिस तरह नई टीम का गठन किया है, उसे केवल संगठनात्मक कवायद नहीं बल्कि भविष्य की राजनीतिक दिशा के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है..भविष्य की भाजपा पर केंद्रित एक कसी हुई टीम कई नेता एडजस्ट नहीं हो पाए लेकिन इसे हेमंत की दूरदर्शिता और समन्वय की सियासत का सकारात्मक नतीजा ही माना जाएगा.. इस बीच खास तौर पर उन मंत्रियों को लेकर चर्चाएं तेज हैं, जो संगठन की नई संरचना में अपेक्षित महत्व हासिल नहीं कर सके या पूरी तरह अनुपस्थित दिखाई दिए..ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या संगठन ने मुख्यमंत्री को यह संदेश दे दिया है कि सरकार और संगठन की कसौटी पर अब नए सिरे से समीक्षा से आगे अब फैसले का समय आ गया है..? कांग्रेस के लगातार हमलों के बीच जिस तरह भाजपा संगठन मुख्यमंत्री के बचाव में मजबूती से सामने आया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी नेतृत्व फिलहाल मोहन यादव के साथ पूरी ताकत से खड़ा है..वहीं कार्यकारिणी गठन के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या संगठन ने अप्रत्यक्ष रूप से उन मंत्रियों के प्रति अपनी असंतुष्टि दर्ज कराई है,जो क्षेत्रीय प्रभाव,संगठनात्मक उपयोगिता, कार्यशैली या प्रदर्शन के स्तर पर अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए..? भाजपा में सत्ता और संगठन दोनों की अपनी-अपनी कसौटियां हैं..ऐसे में नई कार्यकारिणी को 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी के साथ-साथ संभावित मंत्रिमंडलीय पुनर्गठन के संकेतों से जोड़कर भी देखा जा रहा है.. बड़ा सवाल यही है कि क्या हेमंत खंडेलवाल ने संगठन की नई टीम के जरिए मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के लिए राजनीतिक रास्ता और अधिक सहज कर दिया है..और क्या आने वाले समय में सरकार के कुछ चेहरों को लेकर बड़े फैसलों की भूमिका भी तैयार हो चुकी है..? राजनीति में कई बार संदेश शब्दों से नहीं, बल्कि सूची में दिखाई देने वाले नामों और गायब चेहरों से पढ़े जाते हैं.. भाजपा की नई कार्यकारिणी फिलहाल ऐसे ही कई संकेतों और संभावनाओं को जन्म दे रही है..! बड़ा सवाल इन 13 मंत्रियों का परफॉर्मेंस से जुड़ा यदि यह अघोषित रिपोर्ट कार्ड का संकेत है तो क्या इसमें दूसरे मंत्रियों के लिए भी संदेश छुपा हुआ है..मुख्यमंत्री की अपने मंत्रियों की परफॉर्मेंस रिपोर्ट पर रिएक्शन से पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का एक्शन सामने आ चुका है..इसे जो मंत्री कार्यकारिणी में शामिल नहीं हो पाए इससे जोड़कर देखा जा रहा है. (संगठन के लिए ये मंत्री उपयोगी नहीं तो क्यों) भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति से 13 मंत्रियों की अनुपस्थिति ने एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा कर दिया है, क्या यह केवल संगठनात्मक संतुलन का मामला है या फिर पार्टी इन चेहरों की राजनीतिक उपयोगिता का नए सिरे से आकलन कर रही है? मंत्रियों के प्रदेश बीजेपी दफ्तर बैठने की नई व्यवस्था में क्या इन मंत्रियों का परफॉर्मेंस सवालों के घेरे में आ चुका है..भाजपा में केवल चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं माना जाता.. पार्टी नेतृत्व ऐसे नेताओं को अधिक महत्व देता है जो सरकार और संगठन के बीच मजबूत सेतु बन सकें, कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता रखते हों, चुनावी रणनीति में योगदान दे सकें और अपने क्षेत्र में पार्टी का विस्तार कर सकें.. यदि कोई मंत्री प्रशासनिक रूप से सक्रिय है लेकिन संगठनात्मक रूप से प्रभावी नहीं माना जाता, तो उसकी उपयोगिता सीमित हो जाती है.. डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनने के बाद जो मंत्रिमंडल मिला,उसमें कई चेहरे पूर्व नेतृत्व के दौर के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों का हिस्सा थे..कई मंत्री उपयोगिता से ज्यादा अलग-अलग कारण से एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स में उसे वक्त शामिल कर लिएगए..ढाई साल बाद संगठन के सामने सवाल यह है कि 2028 के विधानसभा चुनाव में कौन से चेहरे भाजपा को अतिरिक्त राजनीतिक लाभ दिला सकते हैं और कौन केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित हैं.. कुछ मंत्रियों के सामने क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की चुनौती रही है, कुछ अपने विभागीय प्रदर्शन को राजनीतिक उपलब्धि में नहीं बदल पाए, जबकि कुछ विवादों या स्थानीय असंतोष के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके..प्रदेश बीजेपी दफ्तर में बैठकर क्या ये मंत्री संगठन ने नेतृत्व की नजर में कसौटी पर खड़ा नहीं उतरे हैं..क्या ऐसे में कार्यसमिति से दूरी को संगठन की एक प्रकार की "परफॉर्मेंस रेटिंग" के रूप में भी देखा जा रहा है..सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि भाजपा अब व्यक्ति आधारित नहीं, बल्कि क्षेत्र और सामाजिक वर्ग आधारित विकल्प तैयार करने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है.. यदि किसी मंत्री की जगह उसी क्षेत्र, वर्ग या जातीय समीकरण से अधिक सक्रिय और संगठननिष्ठ चेहरा उपलब्ध है, तो भविष्य में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.. यानी सवाल केवल यह नहीं है कि ये मंत्री कार्यसमिति में क्यों नहीं हैं,बल्कि यह भी है कि क्या भाजपा इनके समानांतर नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश शुरू कर चुकी है,तो क्या इन 13 मंत्रियों में से कई पर संगठन की भृकुटी तनने के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के लिए फैसला लेना आसान हो जाएगा..यही वह संकेत है, जिस पर राजनीतिक गलियारों की नजर टिकी हुई है. प्रदेश कार्यसमिति से 13 मंत्रियों की दूरी...क्या यह सिर्फ संगठनात्मक संतुलन है या भविष्य की सियासी पटकथा? क्या पार्टी संविधान के तहत सीमित सदस्यों वाली प्रदेश कार्यसमिति में इन मंत्रियों को शामिल नहीं कर इशारों इशारों में ही सही बड़ा संदेश इन मंत्रियों के साथ जिन्हें शामिल किया गया उन्हें भी एक बड़ा संदेश दिया जा चुका है..मध्य प्रदेश भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति के गठन के बाद सबसे अधिक चर्चा किसी नाम के शामिल होने की नहीं, बल्कि कुछ नामों के नहीं होने की हो रही है..प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल द्वारा घोषित 106 सदस्यीय कार्यसमिति और 41 स्थाई सदस्यों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार के 31 मंत्रियों में से 13 मंत्रियों को स्थान नहीं मिला है..इनमें करण सिंह वर्मा, प्रद्युम्न सिंह तोमर, नागर सिंह, राकेश शुक्ला, धर्मेंद्र लोधी, गौतम टेटवाल, दिलीप जायसवाल, नारायण सिंह पवार, नरेंद्र पटेल, लखन पटेल, राधा सिंह, प्रतिमा बागरी और दिलीप अहिरवार शामिल हैं.. क्या इनके अपने क्षेत्र से जिन्हें शामिल किया गया वह इसे ज्यादा उपयोगी और भारी साबित हो रहे हैं. राजनीति में कई बार जो दिखाई देता है, उससे अधिक महत्वपूर्ण वह होता है जो दिखाई नहीं देता.. भाजपा जैसी कैडर आधारित पार्टी में प्रदेश कार्यसमिति केवल संगठनात्मक मंच नहीं होती, बल्कि भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेतक भी मानी जाती है..ऐसे में मंत्रिमंडल के 13 सदस्यों का इस सूची से बाहर रह जाना स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े कर रहा है..जो अपने सहयोगी मंत्रियों की तुलना में ही सही पार्टी के लिए उपयोगी नहीं माने गए.. या फिर उनके अपने विधानसभा और जिला क्षेत्र में उनसे ज्यादा किसी नए या दूसरे पुराने चेहरे को उपयोगी और संगठन के लायक समझा गया.. हेमंत खंडेलवाल ने कार्यसमिति की घोषणा करते समय नई पीढ़ी को अवसर देने, संगठन को अधिक सक्रिय और भविष्य उन्मुख बनाने की बात कही थी.. कार्यसमिति की संरचना को देखें तो इसमें युवा नेतृत्व, हर क्षेत्र से महिला नेतृत्व को सामने लाना,सक्रिय संगठनकर्ता और आगामी चुनावी रणनीति में उपयोगी माने जाने वाले चेहरों को प्राथमिकता दी गई है, इसके विपरीत कई वरिष्ठ नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाकर सम्मानजनक स्थान दिया गया है..भोपाल समेत कई जिलों में पार्टी के आंतरिक समीकरण जरूर बदले हैं, लेकिन गैर जरूरी चेहरों से संगठन ने दूरी बना ली है, इसी फेहरिस्त में कुछ मंत्री ऐसे जिनका या तो विवाद ज्यादा बढ़ चुका है या फिर जो अपने क्षेत्र में जन आधार को रहे हैं,क्षेत्र में यह व्यवस्था अनुभव और सक्रिय राजनीति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास दिखाई देती है.. यहीं से इन 13 मंत्रियों की अनुपस्थिति का राजनीतिक अर्थ निकलना शुरू होता है..इनमें अधिकांश मंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार के गठन के समय सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए शामिल किए गए थे.. कई पहली बार मंत्री बने, जबकि कुछ अनुभवी चेहरे भी हैं, पिछले ढाई वर्षों में इनके कामकाज का मूल्यांकन लगातार मुख्यमंत्री कार्यालय, संगठन और पार्टी नेतृत्व के स्तर पर होता रहा है..भाजपा में प्रदर्शन आधारित राजनीति की चर्चा लंबे समय से होती रही है और समय-समय पर संगठन ने यह संकेत भी दिए हैं कि केवल पद पर बने रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संगठनात्मक उपयोगिता और जनस्वीकृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.. करण सिंह वर्मा और प्रद्युम्न सिंह तोमर जैसे नेता लंबे राजनीतिक अनुभव के साथ आते हैं, प्रद्युम्न सिंह तोमर का जमीन से जुड़ा होना ,जनसंपर्क और जमीनी सक्रियता हमेशा चर्चा में रही है, सिंधिया समर्थक गोविंद राजपूत को जगह मिलने के कारण कहीं तोमर से दूरी तो नहीं बनाई गई..इसी तरह कुछ अन्य मंत्री अपने क्षेत्र में प्रभावशाली होने के बावजूद प्रदेश स्तर पर अपेक्षित राजनीतिक विस्तार नहीं कर पाए.. मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के ही क्षेत्र से जुड़े गौतम टेटवाल का नया गणित समझ से परे, तो कई बार विवादों का केंद्र बिंदु बन चुके पूर्व सह मीडिया प्रभारी और मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल, लखन पटेल, विवादित मंत्रियों में शामिल प्रतिमा बागरी और सोशल इंजीनियरिंग में फिट दिलीप अहिरवार जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरे सिर्फ बुंदेलखंड ही नहीं बल्कि भाजपा की सामाजिक विस्तार रणनीति का हिस्सा रहे हैं..बुंदेलखंड के आंतरिक समीकरण में क्या उन्हें अनफिट मान लिया गया,राधा सिंह कैबिनेट की बैठक में विवाद के कारण चर्चा में रही,करण सिंह की पारी अब समाप्त मानी जा रही है,सिंधिया समर्थक प्रदुम सिंह तोमर यदि गोविंद राजपूत के कारण तो राकेश शुक्ला नरोत्तम मिश्रा के कारण संभवत संगठन में शामिल नहीं हो पाए..नागर सिंह का पुराना विवाद किसी से छुपा नहीं है..कुछ और नए विवाद उनके नाम से साथ जुड़ गए..सवाल मुख्यमंत्री और पार्टी दोनों ने इन चेहरों को पहले ही पद प्रतिष्ठा से नवाजा लेकिन क्या अब उनके विकल्प की तलाश शुरू हो चुकी है.. पार्टी ने विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने के लिए इन्हें अवसर दिया, हालांकि सरकार के ढाई वर्ष पूरे होने के बाद अब केवल प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि परिणामों के आधार पर मूल्यांकन की प्रक्रिया भी स्वाभाविक रूप से तेज हुई है..कुछ मंत्रियों के विभागों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है कुछ मामलों में प्रशासनिक निर्णयों पर विवाद हुए तो कुछ मंत्री अपने विभागों की उपलब्धियों को राजनीतिक रूप से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं कर सके.. भाजपा नेतृत्व के लिए यह भी महत्वपूर्ण होता है कि मंत्री केवल विभाग न चलाए, बल्कि संगठनात्मक संदेश और राजनीतिक लाभ भी सुनिश्चित करे.. यही कारण है कि कार्यसमिति से दूरी को केवल संयोग मान लेना कठिन है,हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि जिन मंत्रियों को कार्यसमिति में स्थान नहीं मिला, उनका राजनीतिक भविष्य समाप्त हो गया है..भाजपा में संगठन और सरकार की भूमिकाएं अलग-अलग होती हैं, कई बार पार्टी जानबूझकर मंत्रियों को संगठनात्मक जिम्मेदारियों से दूर रखती है ताकि वे पूरी ऊर्जा शासन और प्रशासन पर केंद्रित कर सकें.. इसलिए इस निर्णय का एक व्यावहारिक पक्ष भी मौजूद है..लेकिन राजनीतिक विश्लेषण केवल औपचारिक तर्कों से नहीं चलता,वास्तविक राजनीति में संकेतों का महत्व अधिक होता है..यदि प्रदेश कार्यसमिति में अधिकांश प्रमुख मंत्री शामिल हैं और कुछ चेहरे लगातार बाहर रह जाते हैं,तो संदेश स्वाभाविक रूप से अलग निकलता है, इस पूरे घटनाक्रम को मंत्रिमंडल पुनर्गठन की संभावनाओं से जोड़कर भी देखा जा रहा है.. डॉ. मोहन यादव सरकार अपने कार्यकाल के मध्य चरण में पहुंच चुकी है.. भाजपा के सामने 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी का समय तेजी से नजदीक आ रहा है.. ऐसे में पार्टी संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर नई ऊर्जा, नए चेहरे और बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा कर सकती है..राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनाव से पहले भाजपा कई राज्यों में संगठन और सरकार दोनों में बदलाव कर चुकी है..यदि भविष्य में मंत्रिमंडल विस्तार या पुनर्गठन होता है तो स्वाभाविक रूप से मंत्रियों के प्रदर्शन, जनस्वीकार्यता, संगठनात्मक समन्वय और चुनावी उपयोगिता जैसे मानदंडों को आधार बनाया जाएगा, ऐसे में कार्यसमिति से बाहर रह गए मंत्रियों को लेकर अटकलों का बढ़ना अस्वाभाविक नहीं है.. एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या यह निर्णय केवल प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का है या इसमें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सहमति भी शामिल है..भाजपा की कार्यप्रणाली को देखते हुए इतने महत्वपूर्ण संगठनात्मक निर्णय शीर्ष नेतृत्व की व्यापक सहमति से ही लिए जाते हैं..प्रदेश अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, संगठन महामंत्री और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संवाद के बाद ही अंतिम स्वरूप तय होता है। इसलिए यह मानना कठिन है कि सरकार और संगठन के बीच इस विषय पर कोई समन्वय नहीं रहा होगा.यहीं से राजनीतिक संदेश और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. यदि मुख्यमंत्री और संगठन दोनों इस संरचना पर सहमत हैं, तो इसे केवल सूची निर्माण की तकनीकी प्रक्रिया नहीं माना जाएगा। यह उन चेहरों को भी संदेश है जिन्हें आने वाले समय में अपने प्रदर्शन और राजनीतिक सक्रियता को और बेहतर करना होगा..भाजपा का संगठन समय-समय पर ऐसे संकेत देता रहा है कि पद स्थायी नहीं होते और निरंतर मूल्यांकन उसकी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है. फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कार्यसमिति से बाहर रहना सीधे मंत्रिमंडल से बाहर होने का संकेत है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में धुआं अक्सर बिना आग के नहीं उठता.. नई कार्यसमिति ने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा अब 2028 की तैयारी को ध्यान में रखते हुए संगठनात्मक पुनर्संरचना के दौर में प्रवेश कर चुकी है.. इसलिए यह सूची केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि भविष्य की राजनीति के कई संभावित संकेतों का दस्तावेज भी है.. आने वाले महीनों में यदि मंत्रिमंडल पुनर्गठन, संगठनात्मक फेरबदल या चुनावी रणनीति में बदलाव दिखाई देता है, तो आज कार्यसमिति से बाहर दिखाई देने वाले ये 13 चेहरे उस चर्चा के केंद्र में हो सकते हैं.. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा ने एक संदेश दिया है.. संदेश कितना बड़ा है, उसका वास्तविक अर्थ क्या है और क्या यह बात सचमुच दूर तलक जाएगी, इसका उत्तर आने वाला राजनीतिक समय ही देगा.. प्रदेश कार्यसमित सदस्य-106 स्थाई आमंत्रित-41 मंत्री – सीएम समेत 31 भाजपा पदाधिकारी..9 उपाध्यक्ष,4 महामंत्री,9 मंत्री,1 कोषाध्यक्ष,1 कार्यालय मंत्री,1 मीडिया प्रभारी,7 मोर्चा अध्यक्ष..यानि कुल टोटल 33 पदाधिकारी. इसका एक बॉक्स बना देना इन मंत्रियों का विवादों से भी रहा नाता करण सिंह वर्मा मध्यप्रदेश के राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने लाडली बहनों का नाम काटे जाने का विवादास्पद बयान दिया था..और इसके बाद अफसरों को लेकर भी उनके बिगड़े बोल सामने आए थे..बयानों पर काफी किरकिरी हुई थी..बाद में राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने इस पर सफाई भी दी थी. राकेश शुक्ला भिंड में उनके एक सरकारी कार्यक्रम में शामिल न होने पर अधिकारियों द्वारा उनके बेटे आलोक शुक्ला को मुख्य अतिथि बनाया गया और प्रेस नोट में उन्हें "जनप्रतिनिधि" बता दिया गया, जिसे लेकर विपक्ष ने नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया..इसके अलावा उनके रिश्तेदार पर एक गंभीर मामला लगने के कारण भी वे विवादों में रहे. धर्मेंद्र लोधी शराब माफिया से संबंध होने के आरोप लगे..मई 2026 में जबलपुर में क्रूज़ हादसे के बाद नियमों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के आरोप लगे,जिस पर विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग की. गौतम टेटवाल मंत्री गौतम टेटवाल के फर्जी जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद गहराया..एक जनसभा के दौरान अजान की आवाज सुनकर अपना भाषण बीच में रोकने और मंच से 'ला इलाहा इल्लल्लाह' पढ़ने को लेकर भी सोशल मीडिया पर एक वर्ग ने उनका विरोध किया था. नरेंद्र शिवाजी पटेल मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल के बेटे अभिज्ञान पटेल द्वारा होटल संचालक दंपती और मीडियाकर्मी से मारपीट का मामले ने काफी तूल पकड़ा था..इस विवाद में मंत्री के हस्तक्षेप के बाद चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया था..बाद में मंत्री के बेटे ने पुलिस पर बेल्ट से पीटने का आरोप लगाते हुए वीडियो जारी किया था..ग्वालियर के एक होटल में मंत्री के एक्शन का काफी रिएक्शन हुआ था.. दिलीप जायसवाल जमीन सर्वे में फर्जीवाड़े और अधिकारियों की लापरवाही को लेकर सख्त चेतावनी देने के कारण विवादों में आए..अधिकारियों को 'टांगने' वाले उनके बयानों पर विपक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई थी.. नारायण सिंह पवार ब्यावरा क्षेत्र में किसानों के भूमि विवाद के दौरान मंत्री ने मंच से बड़ा बयान देते हुए कहा था कि अगर उद्योगपति या मुख्यमंत्री भी आ जाएं,तो भी वे किसानों के साथ खड़े रहेंगे और जरूरत पड़ी तो पद से इस्तीफा दे देंगे..इसके अलावा, राजगढ़ में एक लोकार्पण कार्यक्रम में उनका नाम और फोटो न होने के कारण भी उनकी नाराजगी पर कई सवाल विपक्ष ने उठाए थे. राधा सिंह सिंगरौली में एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से दुर्व्यवहार के कारण उनका नाम विवादों में रहा..इसके अलावा, मैहर में चैत्र नवरात्रि के दौरान VIP दर्शन पर प्रतिबंध होने के बावजूद मां शारदा मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर विशेष पूजा करने का उनका वीडियो वायरल हुआ था..जो सुर्खिंयां बना. प्रतिमा बागरी सतना के कोठी क्षेत्र में नवनिर्मित सड़क का निरीक्षण करते समय उनके पैरों के नीचे से सड़क उखड़ गई थी, जिसके बाद उन्होंने निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे..इससे पहले परिवार के लोगों के आपराधिक मामलों में भी मंत्री घिरी रहीं..और फर्जी जाति प्रमाण पत्र के मामले में भी विपक्ष के निशाने पर अभी भी हैं..कुछ मामलों में सीएम डॉ मोहन यादव,प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने उन्हें फटकार भी लगाई. मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर भू-माफियाओं को संरक्षण देने के आरोप ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर पर लगे..तो अपनी लचीली स्टाइल को लेकर भी कई बार वे विपक्ष के निशाने पर रहे..फिर चाहे बिजली के खंभे पर चढ़ने की बात हो या सीवर लाइन में उतरकर उसकी सफाई करने का मामला. नागर सिंह चौहान कैबिनेट मंत्री नागरसिंह चौहान के भाई ने एक महिला अधिकारी से अभद्रता करने के आरोप लगे थे..इसके अलावा वन विभाग जाने से नाराज नागर सिंह के बयानों ने भी सरकार की किरकिरी की थी.. दिलीप अहिरवार मंत्री दिलीप अहिरवार अपने बयानों के कारण सुर्खिंयों में रहे और विपख के निशाने पर रहे..फिर चाहे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर दिया गया उनका बयान हो या फिर नारे लगवाने का मामला..इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय मामलों को लेकर स्थानीय लोगों और नेताओं ने संगठन को शिकायत की. लखन पटेल एक युवक ने मंत्री के बंगले के सामने खुद पर पेट्रोल डालकर सुसाइड करने की कोशिश की थी तब मंत्री लखन पटेल सुर्खियों में आए थे..मदरसों में झंडा वंदन और राष्ट्रगान को लेकर दिए बयान पर विपक्ष हमलावर हुआ था.
'हेमंत' की नापसंद पर क्या मोहन लगाएंगे 'मोहन'.. 13 मंत्रियों से संगठन ने क्यों किया किनारा..सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री)