इं✅ (राहुल गांधी को क्या रास आएगी दिग्विजय की पद यात्रा) सवाल दर सवाल ( राकेश अग्निहोत्री)(पदयात्रा की टाइमिंग, गांधी जयंती लेकिन बहुत पहले ऐलान और विजयादशमी का माहौल , संघ भाजपा या राहुल को देगी चुनौती)

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(राहुल गांधी को क्या रास आएगी दिग्विजय की पद यात्रा) सवाल दर सवाल ( राकेश अग्निहोत्री)(पदयात्रा की टाइमिंग, गांधी जयंती लेकिन बहुत पहले ऐलान और विजयादशमी का माहौल , संघ भाजपा या राहुल को देगी चुनौती)

✅ उज्जैन से अयोध्या तक पदयात्रा वह भी गैर राजनीतिक का दिग्विजय सिंह का यह ऐलान जितना धार्मिक और वैचारिक दिखाई देता है, उतना ही राजनीतिक सवाल भी खड़े करता है.. हाल के दिनों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रति उनके नरम रुख और सहानुभूतिपूर्ण टिप्पणियों की चर्चा पहले ही कांग्रेस के भीतर असहजता पैदा कर चुकी है.. अब दो राज्यों और दो प्रमुख धार्मिक स्थलों को जोड़ने वाली यह यात्रा ऐसे समय घोषित हुई है, जब उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति धीरे-धीरे गति पकड़ रही है.. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अल्पसंख्यक वर्ग के बीच प्रभाव रखने वाले दिग्विजय सिंह की यह यात्रा भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए राजनीतिक रूप से अनुकूल माहौल तो नहीं बनाएगी.. क्या राम मंदिर और अयोध्या का मुद्दा एक बार फिर भाजपा के पक्ष में केंद्र में आ जाएगा.. क्या राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक रणनीति, जो संविधान, सामाजिक न्याय और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रही है, उसके समानांतर यह यात्रा कांग्रेस के लिए नया वैचारिक और राजनीतिक असमंजस पैदा करेगी.. भाजपा ने भी इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाते हुए दिग्विजय सिंह पर सनातन के अपमान का आरोप लगाया है.. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिग्विजय सिंह की यह यात्रा कांग्रेस को राजनीतिक लाभ दिलाएगी या अनजाने में भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव को ही मजबूती देगी.. और यदि ऐसा होता है तो क्या राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व इस पूरी कवायद से पूरी तरह सहज रह पाएगा.. दिग्विजय सिंह की यात्रा की टाइमिंग बहुत पहले रणनीति का खुलासा क्या प्रेशर पॉलिटिक्स से या फिर डैमेज कंट्रोल और सेव फेसिंग की रणनीति तो यह कितनी कारगर सिद्ध होगी.. ✅ (उज्जैन से अयोध्या तक दिग्विजय की पदयात्रा: आस्था, आंदोलन या कांग्रेस के भीतर नई सियासी पटकथा?) ✅ (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री) मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 2 अक्टूबर 2026 से उज्जैन से अयोध्या तक पदयात्रा निकालने की घोषणा कर एक बार फिर खुद को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है.. आधिकारिक तौर पर इस यात्रा का घोषित उद्देश्य राम मंदिर चंदा और चढ़ावा चोरी के कथित मामलों के खिलाफ आवाज उठाना है, लेकिन इसकी राजनीतिक टाइमिंग, शुरुआती स्थल, समापन स्थल और उससे पहले के घटनाक्रम कई ऐसे सवाल खड़े करते हैं, जिनके जवाब केवल धार्मिक आंदोलन के दायरे में नहीं मिलते.. यह घोषणा ऐसे समय आई है, जब दिग्विजय सिंह कांग्रेस के भीतर भी लगातार चर्चा और विवाद के केंद्र में बने हुए हैं.. उज्जैन में उनकी हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस, राम मंदिर से जुड़े बयान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर उनके हमलों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमलावर होने का अवसर दिया था.. वहीं कांग्रेस के भीतर भी उनके बयानों को लेकर असहजता देखी गई.. ऐसे माहौल में उज्जैन से अयोध्या तक पदयात्रा का ऐलान केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है.. सबसे पहले यात्रा के प्रारंभ और समापन स्थल पर ध्यान देना होगा.. उज्जैन केवल महाकाल की नगरी नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह जिला भी है.. दूसरी ओर अयोध्या भाजपा की वैचारिक राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है.. ऐसे में यात्रा का मार्ग प्रतीकों से भरा हुआ दिखाई देता है.. दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया है कि उनका निशाना कथित चंदा चोरी, जमीन घोटाले और चढ़ावे में अनियमितता है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह संघ परिवार और भाजपा की वैचारिक भूमि को चुनौती देने का प्रयास भी माना जाएगा.. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यात्रा की टाइमिंग है.. यात्रा 2 अक्टूबर से शुरू होगी.. यह गांधी जयंती का दिन है, जो अहिंसक जनआंदोलन और पदयात्राओं की ऐतिहासिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है.. इसके बाद अक्टूबर का महीना संघ के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहता है, क्योंकि विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना स्थापना दिवस मनाता है.. इस वर्ष संघ अपने 100 वर्ष पूरे होने के महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर बढ़ रहा है.. ऐसे समय में संघ को सीधे निशाने पर रखकर यात्रा निकालने का निर्णय निश्चित रूप से राजनीतिक महत्व रखता है.. यहीं से सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस की आंतरिक राजनीति का खड़ा होता है.. क्या यह पूरी तरह दिग्विजय सिंह की व्यक्तिगत पहल है या फिर कांग्रेस नेतृत्व की जानकारी और सहमति से घोषित कार्यक्रम.. यदि यह व्यक्तिगत निर्णय है, तो क्या यह पार्टी की आधिकारिक राजनीतिक रणनीति से अलग संदेश देगा.. और यदि शीर्ष नेतृत्व की सहमति से है, तो क्या कांग्रेस भाजपा के सबसे संवेदनशील वैचारिक मुद्दे पर एक बार फिर प्रत्यक्ष टकराव का रास्ता चुन रही है.. हाल के महीनों में कांग्रेस की रणनीति अपेक्षाकृत बदली हुई दिखाई दी है.. राहुल गांधी सामाजिक न्याय, संविधान, आर्थिक असमानता और रोजगार जैसे मुद्दों को प्रमुखता देते रहे हैं.. भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान भी धार्मिक टकराव से बचने की कोशिश दिखाई दी.. ऐसे में दिग्विजय सिंह की प्रस्तावित यात्रा कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक नैरेटिव से अलग दिशा में जाती हुई प्रतीत हो सकती है.. दिग्विजय सिंह पहले भी नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं.. उस यात्रा ने उन्हें एक अलग व्यक्तिगत पहचान दी थी.. उस समय भी उन्होंने धार्मिक आस्था और जनसंपर्क को साथ जोड़ने का प्रयास किया था.. अब उज्जैन से अयोध्या तक की यात्रा कहीं उसी राजनीतिक शैली का नया संस्करण तो नहीं है.. क्या यह राज्यसभा कार्यकाल के बाद राष्ट्रीय राजनीति में अपनी सक्रिय भूमिका बनाए रखने का प्रयास है.. यह प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से उठ रहा है.. राजनीतिक दृष्टि से यह यात्रा भाजपा के लिए भी अवसर लेकर आ सकती है.. भाजपा लंबे समय से दिग्विजय सिंह को अपने वैचारिक विरोध के सबसे प्रमुख चेहरों में प्रस्तुत करती रही है.. यदि यात्रा के दौरान राम मंदिर, संघ या धार्मिक संस्थाओं को लेकर कोई नया विवाद पैदा होता है, तो भाजपा इसे कांग्रेस की आधिकारिक सोच के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर सकती है.. इसका सीधा असर मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तरप्रदेश की राजनीति पर भी पड़ सकता है.. उत्तरप्रदेश का पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है.. जिस समय यह यात्रा आगे बढ़ेगी, उस समय उत्तरप्रदेश की चुनावी गतिविधियां तेज होने की संभावना रहेगी.. ऐसे माहौल में अयोध्या केवल धार्मिक नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक केंद्र भी होगी.. ऐसे में यात्रा के हर बयान और हर पड़ाव पर राजनीतिक प्रतिक्रिया स्वाभाविक होगी.. कांग्रेस के भीतर भी यह यात्रा कई प्रश्न छोड़ती है.. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी संगठन को नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं.. दूसरी ओर दिग्विजय सिंह लगातार अपने स्वतंत्र राजनीतिक हस्तक्षेप से अलग पहचान बनाए हुए हैं.. हाल के घटनाक्रमों में दोनों नेताओं की राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर अलग-अलग संदेश सामने आए हैं.. ऐसे में क्या प्रदेश संगठन पूरी सक्रियता से इस यात्रा के साथ खड़ा होगा.. क्या पार्टी के युवा नेता इसमें शामिल होंगे.. या फिर यह यात्रा मुख्य रूप से दिग्विजय सिंह के व्यक्तिगत अभियान के रूप में ही आगे बढ़ेगी.. एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दिग्विजय सिंह ने घोषणा की है कि यात्रा गैर-राजनीतिक होगी और इसमें किसी दल का झंडा नहीं रहेगा.. लेकिन भारतीय राजनीति में जब कोई वरिष्ठ नेता हजारों किलोमीटर की यात्रा करता है, तो उसका राजनीतिक अर्थ स्वतः निकलने लगता है.. इसलिए यात्रा को पूरी तरह गैर-राजनीतिक मान लेना भी आसान नहीं होगा.. यात्रा के घोषित उद्देश्य पर भी सवाल उठ रहे हैं.. यदि उनका मुख्य मुद्दा कथित चंदा चोरी है, तो अक्टूबर तक जांच एजेंसियों की कार्रवाई, न्यायिक प्रक्रिया या प्रशासनिक रिपोर्ट सामने आ सकती है.. तब क्या यात्रा का मूल मुद्दा वही रहेगा.. या रास्ते में उसका स्वरूप व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल जाएगा.. यह देखने वाली बात होगी.. दिग्विजय सिंह का यह कहना कि वे अदालत में अपने चंदे की राशि वापस मांगेंगे और फिर उसे दूसरे ट्रस्ट को देंगे, एक अलग राजनीतिक संदेश भी देता है.. इससे वे स्वयं को केवल आलोचक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से प्रभावित दानदाता के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं.. यह रणनीति समर्थकों के बीच सहानुभूति पैदा कर सकती है, लेकिन विरोधी इसे राजनीतिक नाटकीयता भी बता सकते हैं.. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह इस यात्रा को किस रूप में देखती है.. यदि पार्टी खुलकर साथ आती है, तो भाजपा इसे कांग्रेस की आधिकारिक लाइन बताएगी.. यदि दूरी बनाती है, तो दिग्विजय सिंह का राजनीतिक संदेश अलग और पार्टी का संदेश अलग दिखाई देगा.. दोनों स्थितियां कांग्रेस के लिए आसान नहीं हैं.. भाजपा की दृष्टि से भी यह यात्रा राजनीतिक रूप से उपयोगी साबित हो सकती है.. पार्टी इसे अपने समर्थकों के ध्रुवीकरण और वैचारिक लामबंदी के अवसर के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास कर सकती है.. विशेषकर तब, जब यात्रा के दौरान कोई विवादित बयान सामने आए.. कुल मिलाकर यह पदयात्रा केवल उज्जैन से अयोध्या तक की भौगोलिक यात्रा नहीं है.. यह कांग्रेस की आंतरिक राजनीति, भाजपा के वैचारिक विमर्श, संघ के शताब्दी वर्ष, उत्तरप्रदेश की चुनावी पृष्ठभूमि और दिग्विजय सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक भूमिका.. इन सभी के बीच चलने वाली समानांतर यात्रा भी होगी.. फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह आस्था के नाम पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जनअभियान बनेगी.. या फिर कांग्रेस के भीतर और बाहर नई राजनीतिक बहस तथा टकराव का कारण.. आने वाले महीनों में इस यात्रा की तैयारी, कांग्रेस नेतृत्व की भूमिका और भाजपा की प्रतिक्रिया ही तय करेगी कि दिग्विजय सिंह का यह कदम राजनीतिक रूप से लाभ का सौदा साबित होगा या कांग्रेस के लिए एक नई असहज चुनौती.. बॉक्सबॉक्स : (दिग्विजय की पदयात्रा, उसके मायने और 15 बड़े सवाल) दिग्विजय सिंह ने 2 अक्टूबर से उज्जैन से अयोध्या तक पदयात्रा का ऐलान ऐसे समय किया है, जब उसकी शुरुआत में अभी कई महीने शेष हैं, राजनीति में यह लंबा समय माना जाता है.. ऐसे में उनकी घोषणा केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी मानी जा सकती है.. बदलते राजनीतिक घटनाक्रम, कांग्रेस की आंतरिक स्थिति, राहुल गांधी की रणनीति, विपक्षी गठबंधन की दिशा और उत्तर प्रदेश की चुनावी तैयारियों के बीच यह यात्रा कई सवाल छोड़ती है.. ✅ ...क्या यह यात्रा पूरी तरह दिग्विजय सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक पहल है, या कांग्रेस हाईकमान की सहमति और रणनीति का हिस्सा है? ...क्या उज्जैन से यात्रा शुरू करना केवल धार्मिक प्रतीक है, या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को चुनौती देने की सोची-समझी रणनीति? ...क्या अयोध्या को अंतिम पड़ाव बनाकर दिग्विजय सिंह भाजपा के सबसे मजबूत वैचारिक मुद्दे पर सीधी राजनीतिक बहस छेड़ना चाहते हैं? ...क्या यह यात्रा कांग्रेस की आधिकारिक राजनीतिक लाइन को मजबूत करेगी, या पार्टी के लिए नई असहज परिस्थितियां पैदा करेगी? ...क्या राहुल गांधी की सामाजिक, आर्थिक और संविधान केंद्रित राजनीति के समानांतर दिग्विजय सिंह अलग वैचारिक नैरेटिव गढ़ रहे हैं? ...क्या भारत जोड़ो यात्रा के बाद यह कांग्रेस के भीतर एक और बड़े चेहरे की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने का प्रयास माना जाएगा? ...क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या तक पहुंचने की टाइमिंग केवल संयोग है, या उसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक संदेश छिपा है? ...क्या संघ के शताब्दी वर्ष और विजयादशमी के आसपास इस यात्रा का प्रभाव वैचारिक टकराव को और तेज करेगा? ...क्या कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व, विशेषकर जीतू पटवारी, इस यात्रा के साथ पूरी सक्रियता से कदमताल करेगा? ...क्या विपक्षी गठबंधन के सहयोगी दल भी इस अभियान का समर्थन करेंगे, या इससे दूरी बनाए रखेंगे ताकि साझा रणनीति प्रभावित न हो? ...क्या चंदा चोरी का वर्तमान विवाद अक्टूबर तक राजनीतिक रूप से उतना ही प्रभावी रहेगा, या तब तक मुद्दे का स्वरूप बदल जाएगा? ...क्या यात्रा के दौरान किसी नए विवाद या बयान से भाजपा को कांग्रेस पर हमले का नया अवसर मिल सकता है? ...क्या राज्यसभा के बाद दिग्विजय सिंह अपनी सक्रिय राष्ट्रीय भूमिका बनाए रखने के लिए जनआंदोलन की नई जमीन तैयार कर रहे हैं? ...क्या यह यात्रा दिग्विजय सिंह की राजनीतिक दूरदर्शिता का उदाहरण बनेगी, या कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर नए मतभेद सामने लाएगी? ...और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह पदयात्रा आस्था के नाम पर पारदर्शिता की लड़ाई बनेगी, या 2026-27 की राजनीति में कांग्रेस बनाम भाजपा के वैचारिक संघर्ष का नया अध्याय लिखेगी? ✅ बॉक्स (अनुशासन की कार्रवाई से क्या कांग्रेस में जीतू पटवारी का नियंत्रण मजबूत होगा?) बॉक्स✅ मध्यप्रदेश कांग्रेस ने एक ओर राकेश यादव को पार्टी से निष्कासित किया है, वहीं प्रदेश महामंत्री निधि चतुर्वेदी और महिला उत्पीड़न प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष प्रियंका किरार को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्ट संकेत दिया है कि संगठन अब सार्वजनिक बयानबाजी और सोशल मीडिया पर अनुशासनहीनता को लेकर सख्त रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है.. लेकिन इस कार्रवाई ने जितने जवाब दिए हैं, उससे कहीं अधिक नए राजनीतिक सवाल भी खड़े कर दिए हैं.. सबसे बड़ी चर्चा प्रदेश महामंत्री निधि चतुर्वेदी को लेकर है.. उन्होंने हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की टिप्पणियों पर सार्वजनिक आपत्ति जताते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी.. अब उन्हीं के खिलाफ अनुशासनात्मक नोटिस जारी होना इस संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है कि संगठन सार्वजनिक असहमति को स्वीकार करने के मूड में नहीं है, चाहे वह किसी भी नेता के खिलाफ क्यों न हो.. दूसरी ओर दिग्विजय सिंह ने उज्जैन से अयोध्या तक पदयात्रा की घोषणा भी कर दी है.. ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि क्या यह यात्रा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की जानकारी और सहमति से घोषित हुई है, या फिर यह दिग्विजय सिंह का स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय है.. यदि प्रदेश नेतृत्व की सहमति है, तो पार्टी को इसकी आधिकारिक जिम्मेदारी भी लेनी होगी.. और यदि यह व्यक्तिगत कार्यक्रम है, तो भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में कांग्रेस के सामने असहज स्थिति बन सकती है.. यही कारण है कि अनुशासन की इस कार्रवाई को केवल संगठनात्मक निर्णय मानकर नहीं देखा जा रहा.. इसे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, अधिकार और संदेश की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है.. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सामने चुनौती यह भी होगी कि अनुशासन के नियम सभी पर समान रूप से लागू होते दिखाई दें.. यदि छोटे नेताओं पर कार्रवाई हो और बड़े नेताओं के मामलों में अलग मानदंड दिखाई दें, तो संगठन के भीतर नए सवाल उठ सकते हैं.. कारण बताओ नोटिस का अर्थ यह नहीं होता कि संबंधित नेताओं पर अंतिम कार्रवाई तय हो गई है.. संतोषजनक जवाब मिलने पर चेतावनी देकर मामला समाप्त भी किया जा सकता है.. लेकिन यदि जवाब असंतोषजनक माना गया, तो निलंबन या निष्कासन जैसे विकल्प भी संगठन के पास खुले रहेंगे.. कुल मिलाकर कांग्रेस की यह कार्रवाई केवल अनुशासन लागू करने की कवायद नहीं, बल्कि प्रदेश नेतृत्व की संगठन पर पकड़ की भी परीक्षा है.. आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह सख्ती सभी नेताओं पर समान रूप से लागू होती है या फिर पार्टी को दिग्विजय सिंह की सक्रिय राजनीति और उनकी प्रस्तावित पदयात्रा के साथ संतुलन बनाते हुए अलग रणनीति अपनानी पड़ेगी. ✅ बॉक्स :( गैर-राजनीतिक पदयात्रा या राजनीति का नया स्वरूप?) दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया है कि उज्जैन से अयोध्या तक उनकी पदयात्रा पूरी तरह गैर-राजनीतिक होगी.. इसमें किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं होगा.. वे सोशल मीडिया का उपयोग भी नहीं करेंगे.. इतना ही नहीं, उन्होंने "जय सियाराम" का उद्घोष करते हुए रामभक्तों से इस यात्रा में शामिल होने का आह्वान भी किया है.. लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है.. क्या चार दशक से सक्रिय राजनीति कर रहे दिग्विजय सिंह की कोई भी सार्वजनिक यात्रा वास्तव में गैर-राजनीतिक मानी जा सकती है.. खासकर तब, जब यात्रा का केंद्र राम मंदिर, चंदा, संघ और अयोध्या जैसे ऐसे मुद्दे हों, जिन पर पहले से तीखी राजनीतिक बहस चल रही हो.. नर्मदा परिक्रमा और इस प्रस्तावित पदयात्रा की परिस्थितियां भी अलग हैं.. नर्मदा परिक्रमा मुख्यतः आध्यात्मिक यात्रा थी, जबकि वर्तमान यात्रा की घोषणा ऐसे समय हुई है, जब उसके मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं.. ऐसे में केवल पार्टी का झंडा नहीं रखने या सोशल मीडिया से दूरी बनाने भर से यात्रा का राजनीतिक प्रभाव समाप्त नहीं हो जाता.. सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या कांग्रेस के कार्यकर्ता, नेता और नीति-निर्धारक वास्तव में इससे दूरी बनाए रख पाएंगे.. यदि वे शामिल होते हैं, तो यात्रा का राजनीतिक संदेश और मजबूत होगा.. और यदि दूरी बनाते हैं, तो दिग्विजय सिंह की यह पहल व्यक्तिगत राजनीतिक अभियान के रूप में देखी जाएगी.. इसलिए इस यात्रा को गैर-राजनीतिक साबित करना शायद उसके संचालन से अधिक कठिन चुनौती होगी..

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