मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग का डर, दिग्विजय की सीट खतरे में
राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रहीं
मध्य प्रदेश में 19 जून को राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनमें से दो सीटें भाजपा के डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन की हैं, जबकि एक सीट कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है, जिससे कांग्रेस के कब्जे वाली इस सीट को लेकर पार्टी में चिंता का माहौल है।
कांग्रेस को क्यों है क्रॉस वोटिंग का रिस्क?
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पार्टी को यह सीट हारने का डर है। यदि 5 से 6 विधायक क्रॉस वोट करते हैं या दल-बदल करते हैं तो यह सीट कांग्रेस के हाथ से निकल सकती है। ऐसी आशंका है कि भाजपा विधायकों को अगले चुनाव में टिकट या अन्य प्रलोभन दे रही है।
विधानसभा में मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, कांग्रेस के पास 65 विधायक हैं। हालांकि, बीना विधायक निर्मला सप्रे अब भाजपा के साथ हैं, जिससे कांग्रेस के विधायकों की संख्या 64 हो जाती है। विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा का निर्वाचन हाईकोर्ट ने शून्य कर दिया है, और यदि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलती है, तो कांग्रेस के पास 63 विधायक बचेंगे। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 वोटों की आवश्यकता है।
नेता प्रतिपक्ष और भाजपा का बयान
इस मामले पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि भाजपा हमेशा तोड़फोड़ का प्रयास करती है, लेकिन कांग्रेस मजबूत है और राज्यसभा सीट उन्हीं की रहेगी। वहीं, जबलपुर से भाजपा विधायक अभिलाष पांडे ने कहा कि भाजपा अपने काम पर विश्वास रखती है और उसके पास पर्याप्त विधायक हैं। उन्होंने कांग्रेस को अपनी चिंता करने और आत्ममंथन करने की सलाह दी।
पिछली क्रॉस वोटिंग का इतिहास
2022 के राष्ट्रपति चुनाव में मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग देखने को मिली थी, जब कांग्रेस के लगभग 19 से 20 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया था, जिससे कांग्रेस हैरान रह गई थी। 2020 के राज्यसभा चुनाव में भी ऐसी ही स्थिति थी जब 206 विधायकों के गणित पर चुनाव हुआ था।
संभावित दावेदार और राज्यसभा चुनाव प्रक्रिया
दिग्विजय सिंह के इनकार के बाद कांग्रेस के कई नेता इस सीट पर दावेदारी कर रहे हैं। इनमें दलित नेताओं में सज्जन सिंह वर्मा और प्रदीप अहिरवार प्रमुख हैं, जिन्होंने दलित वर्ग के नेता को राज्यसभा भेजने की मांग की है। राज्यसभा सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है, जिसमें जनता के बजाय विधायक मतदान करते हैं। यह चुनाव हर दो साल में होते हैं क्योंकि राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। जीत के लिए आवश्यक वोटों की संख्या कुल विधायकों और सीटों की संख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है।
Lokendra Mishra