नरोत्तम के साथ खेला.. सड़क पर दंगल.. इस्तीफो की झड़ी चक्का जाम...( प्रेशर पॉलिटिक्स और डैमेज कंट्रोल में भाजपा आमने-सामने) सवाल दर सवाल ( राकेश अग्निहोत्री)

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नरोत्तम के साथ खेला.. सड़क पर दंगल.. इस्तीफो की झड़ी चक्का जाम...( प्रेशर पॉलिटिक्स और डैमेज कंट्रोल में भाजपा  आमने-सामने) सवाल दर सवाल ( राकेश अग्निहोत्री)

(राकेश अग्निहोत्री.. त्वरित टिप्पणी) (नरोत्तम के साथ खेला..जीत का रेला निकालेंगे आशुतोष..!) ✅✅ दतिया उपचुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश टिकट की घोषणा के साथ ही सामने आ गया..पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की दावेदारी को अंतिम समय में खारिज कर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारना केवल उम्मीदवार बदलने का फैसला नहीं..बल्कि मध्य प्रदेश भाजपा की बदलती राजनीतिक पटकथा का नया अध्याय माना जा सकता है..यह फैसला जितना दतिया के मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है..उससे कहीं अधिक भाजपा के भीतर बैठे उन नेताओं के लिए भी है जो आने वाले समय में अपनी नई भूमिका और राजनीतिक भविष्य का इंतजार कर रहे हैं.. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल पीढ़ी परिवर्तन की पुरानी लाइन को आगे बढ़ाने का फैसला है..या फिर इसके पीछे भविष्य की राजनीति का लंबा खाका पहले से तैयार था..यदि केवल चुनाव जीतना ही उद्देश्य होता तो नरोत्तम मिश्रा जैसा अनुभवी और स्थापित चेहरा सबसे स्वाभाविक विकल्प माना जाता..लेकिन भाजपा ने संगठन पृष्ठभूमि वाले आशुतोष तिवारी पर भरोसा जताकर संकेत दिया कि अब पार्टी केवल वर्तमान चुनाव नहीं..भविष्य का नेतृत्व भी तैयार कर रही है..यही कारण है कि इस फैसले को सामान्य टिकट वितरण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.. नरोत्तम के साथ खेला होगा तो सवाल क्या उनके समक्ष उनकी उम्र उनकी पीढ़ी के दूसरे नेताओं के लिए भी अब दूसरों को नई पीढ़ी के लिए रास्ता छोड़ने का समय आगया है.. क्योंकि एक नई बहस भाजपा के अंदर शुरू हो चुकी है, क्या इस निर्णय का संदेश केवल नरोत्तम मिश्रा तक सीमित नहीं है..मध्य प्रदेश भाजपा के उन तमाम वरिष्ठ नेताओं तक भी पहुंचा है जो लंबे समय से सत्ता और संगठन दोनों में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं..कैलाश विजयवर्गीय..प्रह्लाद पटेल और अन्य वरिष्ठ नेताओं के संदर्भ में भी राजनीतिक विश्लेषकों की नजर स्वाभाविक रूप से जाएगी..यह कहना उचित नहीं होगा कि निर्णय किसी एक नेता को लक्ष्य बनाकर लिया गया..लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि पार्टी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वरिष्ठता अपने आप टिकट या पद की गारंटी नहीं होगी..अंतिम निर्णय संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं के अनुरूप ही होगा.. इसी वजह से नरोत्तम मिश्रा के साथ हुआ यह घटनाक्रम कई लोगों को सोची-समझी पटकथा का हिस्सा दिखाई देता है..हालांकि इसके समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं..लेकिन राजनीति में समय और परिस्थितियां भी संदेश देती हैं..नामांकन की तैयारी..क्षेत्र में लगातार सक्रियता..और अंतिम समय में टिकट बदलना..यह सब बताता है कि अंतिम निर्णय सबसे ऊंचे स्तर पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद लिया गया होगा.. इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा राजनीतिक पहलू भी है..मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार अपना कार्यकाल आगे बढ़ा रही है..वहीं संगठन अगले पांच से दस वर्षों की राजनीतिक संरचना तैयार करने में जुटा दिखाई देता है..आज दतिया में टिकट बदला है..कल मंत्रिमंडल विस्तार होगा..परसों संगठन में नई जिम्मेदारियां तय होंगी..ऐसे में यह मानने के पर्याप्त राजनीतिक आधार हैं कि दतिया की यह पटकथा भविष्य की बड़ी राजनीतिक संरचना की पहली कड़ी भी साबित हो सकती है.. आशुतोष तिवारी को केवल विकल्प या उत्तराधिकारी मानना भी उनके राजनीतिक सफर के साथ न्याय नहीं होगा..वे लंबे समय तक संगठन के भरोसेमंद कार्यकर्ता और पदाधिकारी रहे हैं..कमलनाथ सरकार के दौरान चर्चित ऑपरेशन लोटस में उनकी सक्रिय भूमिका रही..हाउसिंग बोर्ड से लेकर संगठन तक उन्होंने विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं..हेमंत खंडेलवाल की नई टीम बनते समय भी उन्हें बड़े पद का दावेदार माना गया..ऐसे नेता को चुनावी मैदान में उतारकर भाजपा ने यह संदेश भी दिया है कि संगठन में धैर्य..अनुशासन और निष्ठा का प्रतिफल देर से सही..लेकिन मिलता जरूर है.. भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती चुनाव नहीं..संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना होगी..दतिया में नरोत्तम मिश्रा का व्यक्तिगत प्रभाव..कार्यकर्ताओं पर पकड़ और वर्षों की राजनीतिक पूंजी किसी से छिपी नहीं है..यदि कार्यकर्ता पूरी ताकत से आशुतोष के साथ नहीं खड़े हुए तो चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है..इसलिए अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा टिकट घोषित करने के बाद शुरू हुई है..पार्टी को नरोत्तम का सम्मान भी बचाना है..और आशुतोष की जीत भी सुनिश्चित करनी है.. दूसरी ओर नरोत्तम मिश्रा के सामने भी राजनीतिक चुनौती कम नहीं है..उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी राजनीति केवल टिकट की राजनीति नहीं है..यदि वे पूरी सक्रियता से आशुतोष तिवारी के लिए प्रचार करते हैं..कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलते हैं..और भाजपा को जीत दिलाते हैं..तो उनका राजनीतिक कद कम होने के बजाय और मजबूत होगा..लेकिन यदि कार्यकर्ताओं में असंतोष खुलकर सामने आता है तो राजनीतिक चर्चा का केंद्र भी वही बनेंगे.. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा की जीत से अधिक उसकी हार के राजनीतिक अर्थ निकाले जाएंगे..यदि आशुतोष तिवारी चुनाव जीतते हैं तो केंद्रीय नेतृत्व का निर्णय दूरदर्शी माना जाएगा..लेकिन यदि भाजपा हारती है तो टिकट बदलने का फैसला स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आएगा..तब बहस केवल प्रदेश नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगी..बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व और अंतिम निर्णय लेने वाली रणनीतिक टीम तक पहुंचेगी.. यही कारण है कि दतिया उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है..यह भाजपा की नई नेतृत्व नीति..पीढ़ी परिवर्तन..संगठन सर्वोपरि की कार्यशैली..और भविष्य की राजनीतिक दिशा की परीक्षा बन चुका है..नरोत्तम मिश्रा के साथ हुआ यह राजनीतिक घटनाक्रम आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बना रहेगा..अब निगाह केवल इस बात पर नहीं होगी कि आशुतोष तिवारी चुनाव जीतते हैं या नहीं..बल्कि इस बात पर भी होगी कि क्या वे जीत का ऐसा रेला निकालते हैं जो भाजपा के फैसले को पूरी तरह सही साबित कर दे..या फिर दतिया का परिणाम मध्य प्रदेश भाजपा की आंतरिक राजनीति में एक नई बहस और नए शक्ति-संतुलन की शुरुआत लिखेगा.. ✅🙏 बॉक्स✅ सेंटर हेडिंग 🙏 (दतिया का दांव..नरोत्तम की विदाई..आशुतोष की एंट्री..भाजपा का बड़ा सियासी संदेश और सवाल..) ✅ दतिया उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाकर केवल एक प्रत्याशी नहीं बदला..बल्कि मध्य प्रदेश भाजपा की राजनीति में एक नई रेखा खींच दी है..यह फैसला सामान्य चुनावी गणित से कहीं बड़ा दिखाई देता है..क्योंकि जिस नेता ने वर्षों तक प्रदेश की राजनीति में आक्रामक चेहरा बनकर भाजपा की वैचारिक लड़ाई लड़ी..जो संगठन और सत्ता दोनों के केंद्र में रहा..जिसने विधानसभा हारने के बाद भी लगातार क्षेत्र में सक्रियता बनाए रखी..जो टिकट का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था..नामांकन पत्र तक ले चुका था..उसके स्थान पर संगठन पृष्ठभूमि वाले अपेक्षाकृत जूनियर चेहरे आशुतोष तिवारी को आगे करना कई परतों वाला राजनीतिक संदेश है.. यह निर्णय उस समय आया है जब नरोत्तम मिश्रा जनता की अदालत के साथ न्यायालय की लड़ाई भी लड़ रहे थे..ऐसे समय टिकट की उम्मीद लगभग तय मानी जा रही थी..लेकिन अंतिम क्षण में केंद्रीय नेतृत्व ने पूरी पटकथा बदल दी..यहीं से यह फैसला केवल दतिया तक सीमित नहीं रह जाता..यह भाजपा की बदलती संगठनात्मक संस्कृति..नेतृत्व की प्राथमिकताओं और भविष्य की राजनीति का संकेत बन जाता है.. आशुतोष तिवारी कोई अचानक सामने आया चेहरा नहीं हैं..राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि..पूर्व संगठन मंत्री..हाउसिंग बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष..संगठन और सरकार दोनों का अनुभव..कमलनाथ सरकार के समय चर्चित ऑपरेशन लोटस के सक्रिय किरदारों में गिने जाने वाले नेता..अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे..परिवार तक राजनीतिक दबाव झेलता रहा..फिर भी संगठन से दूरी नहीं बनाई..हेमंत खंडेलवाल की प्रदेश टीम बनते समय भी उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष या महामंत्री का मजबूत दावेदार माना गया..लेकिन अंततः उन्हें प्रकोष्ठ प्रभारी की जिम्मेदारी देकर संतुलन साधा गया..ऐसे नेता को सीधे विधानसभा उपचुनाव में उतारना बताता है कि संगठन ने उनका राजनीतिक धैर्य और निष्ठा दोनों दर्ज किए.. दिलचस्प तथ्य यह भी है कि नरोत्तम मिश्रा और आशुतोष तिवारी के व्यक्तिगत संबंध हमेशा सम्मानजनक रहे हैं..आशुतोष सार्वजनिक रूप से नरोत्तम की वरिष्ठता स्वीकार करते रहे..वहीं संगठन मंत्री रहते आशुतोष की कार्यशैली को नरोत्तम भी पसंद करते थे..इसलिए यह लड़ाई दो नेताओं के बीच नहीं..बल्कि नेतृत्व की नई प्राथमिकताओं की कहानी अधिक दिखाई देती है.. भाजपा की कार्यप्रणाली में पिछले कुछ वर्षों से एक स्पष्ट प्रवृत्ति उभरी है..व्यक्ति से बड़ा संगठन..वरिष्ठता से बड़ा संगठनात्मक निर्णय..और क्षेत्रीय समीकरण से बड़ा केंद्रीय नेतृत्व का आकलन..मोदी..अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के दौर में टिकट केवल स्थानीय लोकप्रियता से तय नहीं होते..उसमें भविष्य की राजनीति..संगठन की जरूरत..सामाजिक समीकरण..अनुशासन और दीर्घकालीन रणनीति सब शामिल होते हैं..दतिया का फैसला उसी सोच का विस्तार माना जा सकता है.. इस निर्णय में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की भूमिका पर भी राजनीतिक चर्चा स्वाभाविक है..लेकिन भाजपा की निर्णय प्रक्रिया को देखें तो ऐसे संवेदनशील मामलों में अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व की सहमति से ही होता है..इसलिए इसे केवल प्रदेश नेतृत्व की पसंद या नापसंद कहना राजनीतिक सरलीकरण होगा..अधिक संभावना यही मानी जाएगी कि प्रदेश संगठन ने फीडबैक दिया..लेकिन अंतिम राजनीतिक संदेश दिल्ली से तय हुआ.. इस फैसले का एक बड़ा असर मध्य प्रदेश भाजपा की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ेगा..यह संदेश केवल नरोत्तम मिश्रा तक सीमित नहीं है..यह उन सभी वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचेगा जो भविष्य में संगठन या सरकार में बड़ी भूमिका की प्रतीक्षा कर रहे हैं..संदेश साफ है कि भाजपा अब किसी भी सीट पर केवल पुराने राजनीतिक कद के आधार पर निर्णय नहीं करेगी..नई पीढ़ी..संगठननिष्ठ चेहरों और भविष्य के नेतृत्व को अवसर देने की नीति आगे भी जारी रह सकती है.. इसके साथ ही यह निर्णय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक स्थिति को भी मजबूत करता दिखाई देता है..नरोत्तम मिश्रा जैसे प्रभावशाली नेता का चुनाव मैदान से बाहर रहना सत्ता और संगठन दोनों में नई शक्ति-संतुलन की स्थिति बनाता है..हालांकि इसका अर्थ किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ना उचित नहीं होगा..लेकिन इतना स्पष्ट है कि मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा अब अपना अगला नेतृत्व ढांचा भी समानांतर रूप से तैयार कर रही है.. नरोत्तम मिश्रा के भविष्य को लेकर भी चर्चा तेज होगी..राजनीति में उनके अनुभव..संगठन पर पकड़..राष्ट्रीय मुद्दों पर आक्रामक प्रस्तुति और संसदीय अनुभव को देखते हुए यह मानना कठिन है कि उनकी भूमिका समाप्त हो गई है..संभावना अधिक यही दिखती है कि भविष्य में उन्हें राष्ट्रीय संगठन..संसदीय राजनीति..या किसी महत्वपूर्ण रणनीतिक जिम्मेदारी में देखा जाए..भाजपा अक्सर ऐसे नेताओं को चुनावी पराजय या टिकट कटने के बाद भी नई भूमिका देती रही है.. दतिया का चुनाव अब भाजपा के लिए पहले जैसा सरल नहीं रहेगा..संगठन चाहे जितना मजबूत हो..दतिया में नरोत्तम मिश्रा का व्यक्तिगत जनाधार और कार्यकर्ताओं पर प्रभाव किसी से छिपा नहीं है..यदि नरोत्तम पूरी सक्रियता और मन से आशुतोष तिवारी के लिए चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा की राह आसान होगी..लेकिन यदि कार्यकर्ताओं में भावनात्मक असंतोष बना रहता है तो विपक्ष इसे मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा..इसलिए अब चुनाव केवल आशुतोष का नहीं..पूरे संगठन की एकजुटता की परीक्षा भी होगा.. कांग्रेस भी इस फैसले को भाजपा के भीतर असंतोष के रूप में पेश करने का प्रयास करेगी..लेकिन भाजपा इसे संगठन सर्वोपरि और अनुशासन की मिसाल बताकर जवाब देगी..यही इस उपचुनाव की सबसे दिलचस्प राजनीतिक लड़ाई होगी.. आखिरकार दतिया का यह निर्णय केवल एक टिकट परिवर्तन नहीं..बल्कि भाजपा की नई राजनीतिक प्रयोगशाला का संकेत है..जहां वरिष्ठता का सम्मान रहेगा..लेकिन निर्णय भविष्य की रणनीति के आधार पर होंगे..जहां व्यक्तिगत कद से ऊपर संगठन की प्राथमिकता होगी..जहां चुनाव जीतना लक्ष्य होगा..लेकिन उससे भी बड़ा लक्ष्य अगली पीढ़ी का नेतृत्व तैयार करना होगा..और शायद यही कारण है कि दतिया का उपचुनाव परिणाम चाहे जो हो..इस फैसले की राजनीतिक गूंज मध्य प्रदेश भाजपा की आने वाली राजनीति में लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी..

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