उत्तर प्रदेश का बंटवारा.. संभावनाएं ..सियासत और सवाल..! संसद सत्र में क्या मिलेंगे कुछ संकेत (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री ) (प्रखर ज्ञान)

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उत्तर प्रदेश का बंटवारा.. संभावनाएं ..सियासत और सवाल..! संसद सत्र में क्या मिलेंगे कुछ संकेत (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री ) (प्रखर ज्ञान)

क्या उत्तर प्रदेश का बंटवारा बनेगा भाजपा का अगला बड़ा राजनीतिक और चुनावी दांव? (वन नेशन-वन इलेक्शन, महिला आरक्षण, राम मंदिर ट्रस्ट में बदलाव और बदलते राजनीतिक संकेत सियासत और सवाल).. ...मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय राजनीति कई बड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रही है.. राम मंदिर निर्माण से जुड़े कथित चंदा विवाद की सियासी गूंज अभी थमी नहीं है, वहीं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की हालिया बैठक के बाद भूमिकाओं और जिम्मेदारियों में हुए बदलाव ने नए राजनीतिक संकेतों पर चर्चा तेज कर दी है.. ...इसी बीच वन नेशन-वन इलेक्शन, महिला आरक्षण के क्रियान्वयन, परिसीमन, जनगणना और चुनावी सुधार जैसे विषय भी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं.. ऐसे में यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या भाजपा आगामी चुनावों को देखते हुए किसी नए और बड़े राजनीतिक एजेंडे की तैयारी में है? ...उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक चुनावी राज्य है। 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा के सामने कई रणनीतिक विकल्प हैं.. क्या इनमें उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन या छोटे राज्यों के गठन का विकल्प भी कभी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है? ...प्रशासनिक सुगमता, क्षेत्रीय संतुलन, विकास और बेहतर शासन की दलीलें लंबे समय से छोटे राज्यों के पक्ष में दी जाती रही हैं, वहीं, इसके विरोध में सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक जटिलताओं का तर्क भी उतना ही मजबूत माना जाता है.. ...यह भी महत्वपूर्ण है कि अभी तक केंद्र सरकार या उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से राज्य के बंटवारे का कोई आधिकारिक प्रस्ताव या संकेत नहीं दिया गया है। इसलिए इस विषय को स्थापित तथ्य नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों और संभावित चुनावी रणनीतियों के संदर्भ में एक विश्लेषणात्मक बहस के रूप में देखा जाना चाहिए.. ...बदलते राजनीतिक परिदृश्य, राम मंदिर ट्रस्ट में हालिया बदलाव, राष्ट्रीय स्तर पर चल रही चुनावी बहसों और आगामी चुनावी चुनौतियों के बीच यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि क्या उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन भविष्य की राजनीति का हिस्सा बन सकता है, या फिर यह चर्चा केवल राजनीतिक अटकलों तक ही सीमित रहेगी? इसी संभावना, उसके संवैधानिक पहलुओं और चुनावी निहितार्थों की पड़ताल इस विश्लेषण में की गई है.. ✅✅ क्या बदलेगा उत्तर प्रदेश राजनीतिक भूगोल (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री) सियासी संकेत... ✅✅ राम मंदिर के बाद क्या भाजपा का अगला बड़ा दांव होगा उत्तर प्रदेश का नया राजनीतिक भूगोल...? ✅ 20 जुलाई का मानसून सत्र... अयोध्या से दिल्ली तक उठते सवाल... और 2027 की सियासी पटकथा... ... भारतीय राजनीति में चुनाव केवल सरकार नहीं बदलते... वे राजनीतिक एजेंडे भी बदलते हैं... कभी मंडल राजनीति का केंद्र बनता है... कभी कमंडल... कभी भ्रष्टाचार... कभी राष्ट्रवाद... तो कभी विकास... हर दौर अपने साथ एक नया राजनीतिक विमर्श लेकर आता है... ... वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद देश की राजनीति भी एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है... भाजपा लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में है... लेकिन पहले जैसी पूर्ण बहुमत वाली स्थिति नहीं है... विपक्ष पहले की तुलना में अधिक मुखर है... संसद में बहस का स्वर भी बदला है... और उत्तर प्रदेश का राजनीतिक संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है... ... 20 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र इसी बदले हुए राजनीतिक वातावरण में हो रहा है... आधिकारिक एजेंडा भले विधायी हो... लेकिन राजनीतिक गलियारों में नजरें उन संकेतों पर भी रहेंगी... जो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की दिशा तय कर सकते हैं... ... इसी बीच समय-समय पर एक पुराना सवाल फिर राजनीतिक चर्चाओं में लौट आता है... क्या देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की बहस कभी फिर राष्ट्रीय एजेंडे पर आ सकती है...? ... इस सवाल का पहला और सबसे स्पष्ट उत्तर यही है कि फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक प्रस्ताव... कैबिनेट निर्णय या संसद में विधेयक मौजूद नहीं है... इसलिए यह कहना कि सरकार उत्तर प्रदेश का विभाजन करने जा रही है... तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा... ... लेकिन राजनीति में कई बार बहसें फैसलों से पहले जन्म लेती हैं... और कई बड़े निर्णय लंबे समय तक केवल संभावनाओं के रूप में चर्चा में रहते हैं... इसलिए इस प्रश्न का राजनीतिक विश्लेषण प्रासंगिक अवश्य है... ... भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए उसके बड़े राजनीतिक पड़ावों को याद करना होगा... राम जन्मभूमि आंदोलन ने भाजपा को वैचारिक आधार दिया... अयोध्या आंदोलन ने उसे जनाधार दिया... अनुच्छेद-370 हटाने के निर्णय ने निर्णायक नेतृत्व की छवि को मजबूत किया... और राम मंदिर निर्माण ने उस लंबे आंदोलन को एक ऐतिहासिक मुकाम तक पहुंचाया... ... लेकिन राजनीति का स्वभाव स्थिर नहीं होता... जो मुद्दा कल आंदोलन था... वह आज उपलब्धि है... और जो आज उपलब्धि है... वह कल सामान्य राजनीतिक स्थिति बन जाती है... ... अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धियों में गिना जाएगा... लेकिन हाल के महीनों में मंदिर ट्रस्ट... निर्माण कार्य और व्यवस्थाओं को लेकर उठे सार्वजनिक विवादों ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर दिया है... यह कहना सही नहीं होगा कि इससे राम मंदिर का महत्व कम हुआ है... लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि राजनीतिक विमर्श का केंद्र बदलने लगा है... ... ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों के बीच एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है... क्या भाजपा को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले किसी नए व्यापक राजनीतिक नैरेटिव की आवश्यकता महसूस हो सकती है...? ... उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं है... यह दिल्ली की सत्ता का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार है... 80 लोकसभा सीटें... लगभग 25 करोड़ की आबादी... और देश की सबसे बड़ी विधानसभा... यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का हर बड़ा राजनीतिक निर्णय राष्ट्रीय प्रभाव छोड़ता है... ... भाजपा के राजनीतिक इतिहास में छोटे राज्यों का अध्याय भी महत्वपूर्ण रहा है... वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उत्तराखंड... झारखंड और छत्तीसगढ़ का गठन किया... उस समय पार्टी ने इसे प्रशासनिक सुधार और क्षेत्रीय विकास की दिशा में बड़ा कदम बताया था... दूसरी ओर वर्ष 2014 में कांग्रेस सरकार ने तेलंगाना का गठन किया... यानी राज्यों के पुनर्गठन का विचार भारतीय लोकतंत्र के लिए नया नहीं है... ... उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भी यह विचार पहली बार नहीं उठा... वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने विधानसभा से चार नए राज्यों के गठन का प्रस्ताव पारित कराया था... पूर्वांचल... बुंदेलखंड... अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश... लेकिन केंद्र स्तर पर उस प्रस्ताव पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई... ... यही इतिहास आज के राजनीतिक सवाल को और दिलचस्प बनाता है... ... क्या भविष्य में यदि कभी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की बहस फिर शुरू होती है... तो उसका आधार प्रशासनिक होगा... या राजनीतिक...? ... क्या इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य के प्रभावी प्रशासन... क्षेत्रीय असंतुलन... पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के विकास... तथा सुशासन के तर्क इस बहस को नई ऊर्जा दे सकते हैं...? ... या फिर विपक्ष इसे चुनावी रणनीति और राजनीतिक ध्रुवीकरण के नजरिए से देखेगा...? ... इन सवालों के उत्तर आज किसी के पास नहीं हैं... लेकिन इतना तय है कि यदि यह बहस कभी संसद तक पहुंची... तो उसका असर केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा... बल्कि भारतीय राजनीति के पूरे शक्ति-संतुलन पर पड़ेगा... ... क्योंकि उत्तर प्रदेश का भूगोल बदलने की चर्चा... केवल नक्शा बदलने की चर्चा नहीं होगी... वह देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला के भविष्य पर बहस होगी... ... और शायद यही कारण है कि 20 जुलाई का मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही का मंच नहीं... बल्कि राजनीतिक संकेतों को पढ़ने का भी एक अवसर माना जा रहा है... ✅(यदि एजेंडा बदला,बहस छिड़ी... तो क्या बदलेगा? 2027, 2029 और उत्तर प्रदेश की नई सियासी पटकथा) ✅✅ ... राजनीति संभावनाओं का विज्ञान नहीं... लेकिन संकेतों की भाषा अवश्य समझती है... इसलिए उत्तर प्रदेश के संभावित पुनर्गठन पर चर्चा का अर्थ किसी निर्णय की घोषणा नहीं... बल्कि उस राजनीतिक सोच को समझना है, जो भविष्य में कभी बहस का विषय बन सकती है... ... पहला सवाल... ... यदि भाजपा कभी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की बहस छेड़ती है... तो उसका सबसे बड़ा राजनीतिक तर्क और समय क्या होगा...? ... संभवतः पार्टी इसे चुनावी नहीं... बल्कि प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत करेगी... जब भी बात आगे बढ़ेगी..तब विशाल आबादी... क्षेत्रीय असंतुलन... तेज निर्णय प्रक्रिया... बेहतर कानून-व्यवस्था... स्थानीय विकास और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे तर्क उसके केंद्र में हो सकते हैं... छोटे राज्यों के पक्ष में यही दलीलें पहले भी दी जाती रही हैं... ... दूसरा सवाल... ... क्या भाजपा के लिए यह नया चुनावी नैरेटिव बन सकता है...? ... भाजपा की राजनीति का इतिहास बताता है कि पार्टी केवल चुनाव नहीं लड़ती... बल्कि चुनाव से पहले विमर्श भी गढ़ने की कोशिश करती है... राम मंदिर... अनुच्छेद-370... तीन तलाक... समान नागरिक संहिता... ये केवल कानून नहीं... बल्कि राजनीतिक संदेश भी थे... ऐसे में यदि भविष्य में कभी राज्य पुनर्गठन का प्रश्न उठता है... तो उसे भी "विकास और सुशासन" के फ्रेम में रखा जा सकता है... हालांकि वर्तमान में ऐसा कोई आधिकारिक संकेत उपलब्ध नहीं है... फिलहाल वन नेशन वन इलेक्शन यह बहस का मुद्दा बन चुका है.. ... तीसरा सवाल... ... योगी आदित्यनाथ की भूमिका क्या होगी...? ... उत्तर प्रदेश में भाजपा का सबसे बड़ा जनाधार वाला चेहरा योगी आदित्यनाथ हैं... उनके नेतृत्व में भाजपा ने कानून-व्यवस्था... धार्मिक पर्यटन... निवेश और बुनियादी ढांचे को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया है... यदि कभी पुनर्गठन जैसी बहस शुरू होती है... तो योगी स्वाभाविक रूप से उसके केंद्र में होंगे... लेकिन यह कहना कि वे इसके पक्ष में होंगे या विरोध में... तथ्यात्मक रूप से संभव नहीं है... क्योंकि ऐसा कोई सार्वजनिक रुख सामने नहीं आया है... ... चौथा सवाल... ... विपक्ष क्या करेगा...? ... समाजवादी पार्टी इसे सामाजिक समीकरण... क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और चुनावी समय से जोड़कर सरकार पर सवाल उठा सकती है... कांग्रेस संवैधानिक प्रक्रिया... प्रशासनिक तैयारी और राष्ट्रीय सहमति का मुद्दा उठा सकती है... वहीं बहुजन समाज पार्टी की स्थिति सबसे दिलचस्प होगी... क्योंकि वर्ष 2011 में चार राज्यों का प्रस्ताव उसी की सरकार ने विधानसभा से पारित कराया था... यदि यह बहस लौटती है... तो बसपा अपने पुराने रुख का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर सकती है... ... पांचवां सवाल... ... क्या संवैधानिक रास्ता आसान है...? ... उत्तर स्पष्ट है... नहीं... ... संविधान का अनुच्छेद-3 संसद को राज्य पुनर्गठन का अधिकार देता है... लेकिन यह केवल राजनीतिक घोषणा से पूरा होने वाला विषय नहीं है... राष्ट्रपति की अनुशंसा... संसद में विधेयक... राज्य विधानसभा से राय... परिसंपत्तियों का बंटवारा... कर्मचारियों का पुनर्विन्यास... नई राजधानियां... उच्च न्यायालय... वित्तीय ढांचा... जल... ऊर्जा... पुलिस... प्रशासन... हर स्तर पर व्यापक तैयारी की आवश्यकता होगी... ... यानी यह केवल राजनीतिक इच्छा नहीं... बल्कि विशाल प्रशासनिक परियोजना भी होगी... ... छठा सवाल... ... क्या 2027 से पहले ऐसा कदम राजनीतिक रूप से लाभकारी होगा...? ... यह पूरी तरह राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा... यदि कभी ऐसी पहल होती है... तो भाजपा इसे "भविष्य का उत्तर प्रदेश" बनाम "पुरानी व्यवस्था" की बहस में बदलने की कोशिश कर सकती है... वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति के रूप में प्रस्तुत कर सकता है... दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक तर्क गढ़ेंगे... ... सातवां सवाल... ... यदि 2027 से पहले नहीं... तो क्या 2029 की तैयारी के रूप में...? ... यह भी केवल एक संभावित परिदृश्य है... कई बार बड़े संरचनात्मक निर्णय चुनाव के तुरंत पहले नहीं... बल्कि चुनावी जनादेश के बाद सामने आते हैं... इसलिए समय भी राजनीति का महत्वपूर्ण तत्व होता है... ... आठवां सवाल... ... क्या संघ परिवार की भूमिका निर्णायक होगी...? ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सार्वजनिक रूप से उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन पर कोई घोषित नीति नहीं रखी है... इसलिए यह कहना कि संघ किसी विशेष योजना पर काम कर रहा है... तथ्यात्मक नहीं होगा... लेकिन इतना अवश्य है कि भाजपा के बड़े वैचारिक प्रश्नों पर संघ परिवार का सार्वजनिक विमर्श हमेशा महत्वपूर्ण माना जाता है... यदि भविष्य में ऐसी बहस उठती है... तो उसकी सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगी... ... नौवां सवाल... ... क्या उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन केवल उत्तर प्रदेश का विषय रहेगा...? ... शायद नहीं... ... यदि भारत के सबसे बड़े राज्य के पुनर्गठन की बहस शुरू होती है... तो देश के अन्य बड़े राज्यों में भी क्षेत्रीय आकांक्षाओं और छोटे राज्यों की मांग को नई ऊर्जा मिल सकती है... इसलिए केंद्र सरकार को केवल उत्तर प्रदेश नहीं... पूरे संघीय ढांचे के प्रभाव का आकलन करना होगा... ... दसवां और सबसे महत्वपूर्ण सवाल... ... क्या यह भारतीय राजनीति का अगला बड़ा विमर्श बन सकता है...? ... इसका उत्तर आज किसी के पास नहीं है... ... लेकिन इतिहास बताता है... भारतीय राजनीति में कई बड़े परिवर्तन पहले बहस बने... फिर प्रस्ताव बने... और अंततः कानून बने... ... फिलहाल उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन पर कोई आधिकारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है... यही सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है... ... लेकिन राजनीति केवल वर्तमान से नहीं चलती... वह अतीत के अनुभव... वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं से अपना रास्ता बनाती है... ... 20 जुलाई का मानसून सत्र इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा कि सरकार किन मुद्दों को प्राथमिकता देती है... और किन मुद्दों पर मौन बनाए रखती है... ... क्योंकि कई बार राजनीति में घोषणा से अधिक... मौन की भी अपनी भाषा होती है... ... उत्तर प्रदेश आज भी भारतीय राजनीति की धुरी है... ... इसलिए उसके भविष्य से जुड़ा हर प्रश्न... चाहे वह प्रशासनिक हो... संवैधानिक हो... या राजनीतिक... अंततः दिल्ली की सत्ता... 2027 की विधानसभा... और 2029 की लोकसभा—तीनों की दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है... ... अभी यह केवल संभावना है... ... लेकिन यदि कभी यह संभावना नीति में बदली... तो भारतीय राजनीति का नक्शा ही नहीं... उसका विमर्श भी बदल सकता है... ✅ बॉक्स यदि केवल राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से संभावित परिदृश्य देखें, तो उत्तर प्रदेश के विभाजन के कई मॉडल वर्षों से चर्चा में रहे हैं.. वह बात और है कि इनमें से किसी मॉडल पर केंद्र सरकार ने अभी तक आधिकारिक निर्णय या विधेयक प्रस्तुत नहीं किया है.. (सबसे अधिक चर्चा तीन संभावित स्वरूपों की होती है) दो राज्यों का मॉडल पश्चिम उत्तर प्रदेश (हरित प्रदेश): मेरठ, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़, मुरादाबाद जैसे मंडल। शेष उत्तर प्रदेश: अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड को मिलाकर। (तीन राज्यों का मॉडल) पश्चिम प्रदेश (हरित प्रदेश) – पश्चिमी यूपी। अवध–बुंदेलखंड – लखनऊ और आसपास का क्षेत्र, साथ में बुंदेलखंड। पूर्वांचल – वाराणसी, गोरखपुर, आज़मगढ़, प्रयागराज आदि पूर्वी जिले। (चार राज्यों का मॉडल) (सबसे चर्चित और 2011 के प्रस्ताव जैसा) हरित प्रदेश (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) अवध प्रदेश पूर्वांचल बुंदेलखंड वर्तमान राजनीतिक समीकरण यदि भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव आता है, तो सरकार के सामने कुछ प्रमुख आधार हो सकते हैं.. विशाल जनसंख्या (उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है) प्रशासनिक सुगमता क्षेत्रीय असंतुलन और विकास कानून-व्यवस्था और सुशासन संसाधनों का बेहतर प्रबंधन वहीं विपक्ष और कुछ विशेषज्ञ ऐसे कदम पर प्रश्न भी उठा सकते हैं.. क्या यह प्रशासनिक सुधार होगा या राजनीतिक रणनीति? नई राजधानियां, उच्च न्यायालय और प्रशासनिक ढांचा कैसे बनेगा? परिसंपत्तियों, कर्मचारियों और वित्तीय संसाधनों का बंटवारा कैसे होगा? निष्कर्ष:वर्तमान में उत्तर प्रदेश के विभाजन की कोई आधिकारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है..यदि केंद्र सरकार ऐसा प्रस्ताव लाती है, तो उसका अंतिम स्वरूप संसद में पेश किए गए विधेयक से ही स्पष्ट होगा.. फिलहाल दो, तीन या चार राज्यों के मॉडल राजनीतिक और नीतिगत चर्चाओं का हिस्सा हैं, न कि स्वीकृत सरकारी योजना.. ✅बॉक्स✅(भाजपा. बसपा .सपा और कांग्रेस की राय अलग-अलग रही) उत्तर प्रदेश के विभाजन पर विभिन्न राजनीतिक दलों का रुख समय के साथ बदलता रहा है.. कई बार यह प्रशासनिक तर्कों से प्रेरित रहा, तो कई बार राजनीतिक परिस्थितियों से.. लेकिन समय-समय पर यह चर्चा बनी रही, बहुजन समाज पार्टी (BSP) सबसे स्पष्ट और औपचारिक समर्थन बसपा ने दिया.. वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश विधानसभा से चार नए राज्यों—पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश (हरित प्रदेश) के गठन का प्रस्ताव पारित कराया। बसपा का तर्क था कि छोटे राज्यों से प्रशासन और विकास बेहतर होगा। समाजवादी पार्टी (SP) समाजवादी पार्टी सामान्यतः उत्तर प्रदेश के विभाजन के पक्ष में नहीं रही है। मुलायम सिंह यादव और बाद में अखिलेश यादव ने समय-समय पर कहा कि राज्य का विकास विभाजन से नहीं, बल्कि बेहतर शासन और संसाधनों के संतुलित उपयोग से होना चाहिए। सपा ने 2011 में बसपा सरकार के प्रस्ताव का भी विरोध किया था। कांग्रेस कांग्रेस का रुख पूरी तरह स्थिर नहीं रहा। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड (2000) और तेलंगाना (2014) जैसे नए राज्यों के गठन का समर्थन किया और केंद्र में रहते हुए उन्हें बनाया। लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन पर कांग्रेस ने कोई लगातार या सर्वसम्मत आधिकारिक अभियान नहीं चलाया, अलग-अलग नेताओं की राय अलग रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) भाजपा ने छोटे राज्यों के गठन का सिद्धांत पहले भी स्वीकार किया है.. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बनाए गए.. लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन पर भाजपा ने अब तक कोई आधिकारिक नीति घोषित नहीं की है.. समय-समय पर कुछ भाजपा नेताओं ने छोटे राज्यों के पक्ष में व्यक्तिगत राय रखी, जबकि पार्टी नेतृत्व ने इसे आधिकारिक एजेंडा नहीं बनाया.. वर्तमान में भी उत्तर प्रदेश के विभाजन पर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रस्ताव या विधेयक सामने नहीं आया है.. राजनीतिक निष्कर्ष निकला जाए तो बसपा: स्पष्ट समर्थन। समाजवादी पार्टी: सामान्यतः विरोध, कांग्रेस: राष्ट्रीय स्तर पर छोटे राज्यों के पक्ष में, लेकिन यूपी विभाजन पर स्पष्ट और निरंतर आधिकारिक रुख नहीं। भाजपा: छोटे राज्यों के गठन का ऐतिहासिक अनुभव है, लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन पर फिलहाल कोई आधिकारिक निर्णय या घोषित नीति नहीं.. फिलहाल दूर की कौड़ी लेकिन यदि मानसून सत्र में इस विषय पर कोई पहल होती है, तो वह भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दों में से एक होगी.. ✅ बॉक्स✅(भाजपा. बसपा .सपा और कांग्रेस की राय अलग-अलग रही) उत्तर प्रदेश के विभाजन पर विभिन्न राजनीतिक दलों का रुख समय के साथ बदलता रहा है.. कई बार यह प्रशासनिक तर्कों से प्रेरित रहा, तो कई बार राजनीतिक परिस्थितियों से.. लेकिन समय-समय पर यह चर्चा बनी रही, बहुजन समाज पार्टी (BSP) सबसे स्पष्ट और औपचारिक समर्थन बसपा ने दिया.. वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश विधानसभा से चार नए राज्यों—पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश (हरित प्रदेश) के गठन का प्रस्ताव पारित कराया। बसपा का तर्क था कि छोटे राज्यों से प्रशासन और विकास बेहतर होगा। समाजवादी पार्टी (SP) समाजवादी पार्टी सामान्यतः उत्तर प्रदेश के विभाजन के पक्ष में नहीं रही है। मुलायम सिंह यादव और बाद में अखिलेश यादव ने समय-समय पर कहा कि राज्य का विकास विभाजन से नहीं, बल्कि बेहतर शासन और संसाधनों के संतुलित उपयोग से होना चाहिए। सपा ने 2011 में बसपा सरकार के प्रस्ताव का भी विरोध किया था। कांग्रेस कांग्रेस का रुख पूरी तरह स्थिर नहीं रहा। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड (2000) और तेलंगाना (2014) जैसे नए राज्यों के गठन का समर्थन किया और केंद्र में रहते हुए उन्हें बनाया। लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन पर कांग्रेस ने कोई लगातार या सर्वसम्मत आधिकारिक अभियान नहीं चलाया, अलग-अलग नेताओं की राय अलग रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) भाजपा ने छोटे राज्यों के गठन का सिद्धांत पहले भी स्वीकार किया है.. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बनाए गए.. लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन पर भाजपा ने अब तक कोई आधिकारिक नीति घोषित नहीं की है.. समय-समय पर कुछ भाजपा नेताओं ने छोटे राज्यों के पक्ष में व्यक्तिगत राय रखी, जबकि पार्टी नेतृत्व ने इसे आधिकारिक एजेंडा नहीं बनाया.. वर्तमान में भी उत्तर प्रदेश के विभाजन पर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रस्ताव या विधेयक सामने नहीं आया है.. राजनीतिक निष्कर्ष निकला जाए तो बसपा: स्पष्ट समर्थन। समाजवादी पार्टी: सामान्यतः विरोध, कांग्रेस: राष्ट्रीय स्तर पर छोटे राज्यों के पक्ष में, लेकिन यूपी विभाजन पर स्पष्ट और निरंतर आधिकारिक रुख नहीं। भाजपा: छोटे राज्यों के गठन का ऐतिहासिक अनुभव है, लेकिन उत्तर प्रदेश के विभाजन पर फिलहाल कोई आधिकारिक निर्णय या घोषित नीति नहीं.. फिलहाल दूर की कौड़ी लेकिन यदि मानसून सत्र में इस विषय पर कोई पहल होती है, तो वह भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दों में से एक होगी..

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