✅ओरछा कार्यसमिति से किसका कद बढ़ेगा? नई पीढ़ी को मौका,पुरानी की वापसी या दोनों का संतुलन?✅✅ ईंटों...✅✅ (ओरछा में युवा नीति निर्धारक बदलेंगे भाजपा कार्य समिति का सियासी माहौल तो ओल्ड जनरेशन-ओल्ड लीडर के ‘अच्छे दिन’ कब आयेंगे?) ✅✅✅ ओरछा की रामराजा सरकार की नगरी में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का माहौल केवल संगठन की बैठक का नहीं, बल्कि पीढ़ी परिवर्तन की राजनीतिक पटकथा का भी बनता दिखाई दे रहा है.. चुनाव जीतने की रणनीति के लिए जरूरी बूथ मैनेजमेंट प्रॉपर्टी का फोकस बनना तय है.. लेकिन लीडरशिप और क्षत्रप की धमक की दरकार के बीच पुरानी और नई पीढ़ी के बीच एक स्वीकार फार्मूले की भी अपेक्षा बढ़ती जा रही है..एक तरफ भाजपा की ओल्ड जनरेशन यानी पुरानी पीढ़ी के ओल्ड लीडर अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि संगठन और सत्ता की बदलती तस्वीर में उनके लिए नई भूमिका, नया दायित्व और शायद पुराने प्रभाव की वापसी का रास्ता निकलेगा.. दूसरी तरफ हेमंत खंडेलवाल की नई भाजपा में युवा, ऊर्जावान और चुनावी राजनीति के लिए तैयार चेहरे तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं, संकेत साफ है संगठन की अगली पारी का पहिया धीरे-धीरे जेन-जी यानी नई पीढ़ी की तरफ घूम रहा है.. माहौल बदल रहा है, मैदान बदल रहा है और नेतृत्व की भाषा भी बदल रही है.. बुंदेलखंड की सियासत में यह बदलाव इसलिए ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि जिस जमीन ने भाजपा को कई बड़े नेता दिए, उसी जमीन पर अब नई पीढ़ी के चेहरे संगठन और सत्ता की सीढ़ियां तेजी से चढ़ते दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह नहीं कि ओल्ड लीडर की उपयोगिता खत्म हो गई, सवाल यह है कि बदलती भाजपा में उनकी उपयोगिता का नया प्रारूप क्या होगा? हेमंत खंडेलवाल की टीम में नए चेहरों की एंट्री यदि जेन-जी को भविष्य की भाजपा का चेहरा बनाने की रणनीति का हिस्सा है, तो बुंदेलखंड में राजनीति का करंट बदलना तय है..लेकिन सवाल यहीं से और धारदार होता है,करंट नई पीढ़ी में दौड़ेगा तो पुराने तारों का क्या होगा? यही ओरछा का सबसे बड़ा सियासी सवाल है.. रामराजा की नगरी से जेन-जी के अच्छे दिन शुरू होते हैं, तो ओल्ड जनरेशन और ओल्ड लीडर के अच्छे दिन आखिर कब आएंगे? और शायद इससे भी बड़ा सवाल क्या ओरछा की कार्यसमिति पीढ़ी परिवर्तन की घोषणा करेगी, या अनुभव और ऊर्जा को साथ लेकर भाजपा 2028 की नई राजनीतिक पटकथा लिखेगी? ✅✅रामराजा सरकार की नगरी ओरछा में 30-31 अगस्त को होने वाली मध्य प्रदेश भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक सिर्फ संगठन की औपचारिक कवायद नहीं है.. यह बैठक बुंदेलखंड की बदलती भाजपा, बदलते नेतृत्व और 2028 की चुनावी तैयारी का राजनीतिक एक्स-रे भी बन सकती है.. ओरछा उसे बुंदेलखंड का चर्चित स्थान है जिस क्षेत्र से पुरानी पीढ़ी के कई नेताओं का लगभग एग्जिट प्लान तैयार किया जा चुका है.. और अब बदलते दौर में हेमंत की भाजपा में शामिल जेन जी के आसपास और समकक्ष लीडर दतिया उपचुनाव के बाद संगठन के अघोषित नीति निर्धारक बन चुके हैं.. ऐसे में ओरछा में भाजपा के सबसे बड़े मंच की यह बैठक जो 7 जुलाई 2024 के बाद हो रही है इसका महत्व और बढ़ जाता है..बूथ मैनेजमेंट हो या चुनाव जीतने की रणनीति क्या ओरछा से हेमंत मोहन की भाजपा ओल्ड जनरेशन के अनुभवी वरिष्ठ नेताओं को इशारों इशारों में अपने फैसले केसाथ कोई घोषित या अघोषित तौर पर कोई बड़ा संदेश देगी.. यह सवाल इसलिए और मायने रखता है क्योंकि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव कुछ दिन पहले ही एक इंटरव्यू में जल्द मंत्रिमंडल पुनर्गठन के संकेत दे चुके हैं.. प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में होने वाली पहली प्रदेश कार्यसमिति के एजेंडे में संगठन, सरकार और चुनावी रणनीति भले ही प्रमुख हों, लेकिन बुंदेलखंड की सियासत में इसके इतर एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है,नई पीढ़ी यानी जेन-जी के राजनीतिक करंट के बीच भाजपा के ओल्ड लीडर के अच्छे दिन आखिर कब आएंगे? ओरछा की जमीन इस सवाल को और अर्थ देती है.. रामराजा सरकार की नगरी सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बुंदेलखंड की राजनीति का महत्वपूर्ण पड़ाव भी है.. उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा यह क्षेत्र लंबे समय से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की राजनीति के बीच संवाद और प्रभाव का भूगोल रहा है.. परिसीमन से पहले खजुराहो संसदीय क्षेत्र का हिस्सा रहे ओरछा और आसपास का इलाका भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के कई अध्यायों का साक्षी रहा है, इसी खजुराहो से उमा भारती संसद पहुंचीं और आगे चलकर मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, आज राजनीति की मुख्य धारा से दूर उनका मौन और चुप्पी चर्चा में है.. परिसीमन के बाद आज खजुराहो से भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा सांसद हैं, तो टीकमगढ़ सीट से वीरेंद्र कुमार खटीक मोदी सरकार में लगातार मंत्री है, तो इसी क्षेत्र से महेश केवट को राज्यसभा में भेजा जा चुका है,ऐसे में ओरछा की बैठक का मंच केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि बुंदेलखंड में भाजपा के अगले राजनीतिक अध्याय का संकेतक भी बन सकता है... ✅ (एक तरफ अनुभव, दूसरी तरफ नई ऊर्जा) बुंदेलखंड भाजपा में इस समय दो पीढ़ियां आमने-सामने नहीं, बल्कि समानांतर दिखाई दे रही हैं,एक तरफ जयंत मलैया,गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह, नरोत्तम मिश्रा, कुसुम महदेले, बृजेंद्र प्रताप सिंह, उमा भारती और हरिशंकर खटीक,और केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक,पूर्व मंत्री ललिता यादव,मंत्री लखन पटेल जैसे ओल्ड लीडर हैं, जिन्होंने संगठन, सत्ता और चुनावी राजनीति में लंबी पारी खेली है..दूसरी तरफ आशुतोष तिवारी, संजय नागायच, शैलेंद्र बरुआ, दिलीप अहिरवार, रजनीश अग्रवाल, महेश केवट,मंत्री धर्मेंद्र लोधी,सांसद राहुल सिंह सहित कई नए और ऊर्जावान चेहरे हैं, जो संगठन और सत्ता में अलग-अलग जिम्मेदारियों के साथ अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रहे हैं.. मोहन हेमंत की बदलती भाजपा ने इन्हें नए चेहरे के तौर पर स्थापित किया है.. यही बदलती तस्वीर भाजपा की भविष्य की रणनीति का सबसे बड़ा संकेत है,सवाल यह नहीं कि पुरानी पीढ़ी खत्म हो गई और नई पीढ़ी आ गई.. सवाल यह है कि भाजपा इन दोनों पीढ़ियों को 2028 के चुनावी मुकाबले में किस तरह एक साथ फिट करती है.. क्या पुरानी और नई पीढ़ी के बीच संतुलन बनाकर कंप्रोमाइज पॉलिटिक्स बुंदेलखंड में आगे बढ़ती हुई नजर आएगी.. या फिर कुछ नए संकेत और फैसलों के साथ ओरछा भाजपा कार्य समिति की बैठक बुंदेलखंड के लिए भी प्रदेश के साथ एक नया संदेश छोड़ जाएगी.. 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के साथ सत्ता-संगठन की संरचना में बदलाव दिखाई दिया, बुंदेलखंड के कई बड़े और अनुभवी चेहरे नई सरकार में मंत्री नहीं बन पाए.. गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह, ही नहीं हरिशंकर खटीक, बृजेंद्र प्रताप सिंह जैसे लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेता सत्ता की तत्कालीन व्यवस्था से बाहर रहे, दतिया के नरोत्तम मिश्रा भी फिलहाल सत्ता और संगठन की मुख्यधारा में पहले जैसी भूमिका में दिखाई नहीं देते,पन्ना की राजनीति के पुराने प्रभावशाली चेहरों में कुसुम महदेले और बृजेंद्र प्रताप सिंह भी पहले जैसी केंद्रीय भूमिका में नहीं हैं.. पूर्व मंत्री हरिशंकर खटीक की कहानी भी इसी राजनीतिक इंतजार से जुड़ती है, संगठन में लंबी सेवा और सरकार में जिम्मेदारियां निभाने वाले खटीक के लिए सवाल यह है कि क्या भाजपा अब उनके अनुभव को किसी नई जिम्मेदारी में इस्तेमाल करेगी? क्या ओरछा की बैठक उनके लिए रामराजा सरकार के साथ मोहन-हेमंत की राजनीतिक कृपा का संकेत लेकर आएगी? निश्चित जवाब बैठक के बाद ही मिलेगा, लेकिन चर्चा का केंद्र यही है कि पार्टी पुराने अनुभव को किस रूप में वापस उपयोग में लाती है। (जेन-जी की दस्तक और 2028 की तैयारी) नई पीढ़ी के चेहरों में दतिया के आशुतोष तिवारी का उदाहरण दिलचस्प है, लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहने और संगठन मंत्री की भूमिका निभाने के बाद वे चुनावी राजनीति में उतरे.. दतिया उपचुनाव का परिणाम उनके पक्ष में नहीं आया, लेकिन एक चुनावी हार ने उनकी संगठनात्मक उपयोगिता को खत्म नहीं किया.. राजनीति में कई बार चुनावी हार अगली भूमिका का अंत नहीं, बल्कि नई भूमिका की शुरुआत होती है.. शैलेंद्र बरुआ जो मालवा के साथ ग्वालियर चंबल से भी जुड़े रहे पर बुंदेलखंड में भी वह अगले विधानसभा सीट की तलाश कर सकते हैं.. क्योंकि संगठन मंत्री के पृष्ठभूमि से निकले आशुतोष ने अपनी बिरादरी के लिए चुनाव का नया रास्ता खोल दिया है.. विष्णु दत्त के संसदीय क्षेत्र से मोहन कल में कदम बढ़ाते हुए सामने आए तेज तर्राट संजय नागायच को जिम्मेदारी मिलना भी नई पीढ़ी के राजनीतिक विस्तार का उदाहरण है.. संजय की नजर भी पवई सीट पर है.. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की टीम से जुड़कर वे सरकार और संगठन के बीच अपनी भूमिका मजबूत कर रहे हैं,2028 की राजनीति में ऐसे चेहरों की उपयोगिता कितनी बढ़ेगी, यह आने वाला समय बताएगा.. शैलेंद्र बरुआ का मामला थोड़ा अलग है, लंबे संगठनात्मक अनुभव के बावजूद वे नई प्रदेश टीम में महत्वपूर्ण भूमिका में हैं.. शैलेंद्र भी ग्वालियर की उसी सीट से भी अपनी दावेदारी को लेकर गंभीरता से आगे बढ़ रहे जिस सीट पर हाल ही में प्रदेश भाजपा मीडिया प्रभारी से राष्ट्रीय से मीडिया संयोजक बने आशीष अग्रवाल की नजर है.. इसका अर्थ यह भी है कि भाजपा का मॉडल पूरी तरह ‘ओल्ड लीडर बनाम जेन-जी’ का नहीं है.. पार्टी अनुभव को नई ऊर्जा के साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है.. राज्यसभा में बुंदेलखंड से जुड़े रजनीश अग्रवाल और महेश केवट की मौजूदगी भी इस बदलाव को रेखांकित करती है.. संगठनात्मक पृष्ठभूमि से आने वाले रजनीश अग्रवाल का बुंदेलखंड से नाता और विद्यार्थी परिषद से भाजपा संगठन और फिर राज्यसभा तक पहुंचना बताता है कि नई पीढ़ी के लिए संगठन अभी भी राजनीतिक सीढ़ी का महत्वपूर्ण रास्ता है, महेश केवट का संबंध ओरछा-निवाड़ी क्षेत्र से होना इस पूरी तस्वीर को स्थानीय राजनीतिक अर्थ भी देता है.. यह कहना गलत नहीं होगा कि बुंदेलखंड में भाजपा की राजनीतिक पीढ़ी बदलाव के दौर में बदल रहीहै.. (विष्णु दत्त का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं) बुंदेलखंड की बदलती भाजपा में विष्णु दत्त शर्मा का अध्याय भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खजुराहो सांसद और मध्य प्रदेश भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शर्मा को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम में नई जिम्मेदारी मिली है,यह राष्ट्रीय संगठन में उनकी निरंतर उपयोगिता का संकेत है, लेकिन राजनीतिक चर्चा इस बात की भी है कि पार्टी में उनके लंबे संगठनात्मक योगदान और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भूमिका की तुलना में यह जिम्मेदारी उनके राजनीतिक कद के अनुरूप कितनी है.. क्या बीजेपी की इंटरनल पॉलिटिक्स के मतभेद और प्रतिस्पर्धा जिसके वह हकदार थे उसे राह में आने आ गई है..यही वजह है कि ओरछा की बैठक के बाद विष्णु दत्त शर्मा की भूमिका को लेकर भी संकेत तलाशे जाएंगे.. सवाल सिर्फ मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना तक सीमित नहीं है .. क्या भविष्य में उन्हें राष्ट्रीय संगठन में और बड़ा दायित्व मिलेगा? क्या प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका फिर बढ़ेगी? या भाजपा उन्हें राष्ट्रीय संगठन में ही किसी बड़ी रणनीतिक भूमिका के लिए तैयार कर रही है? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। (उमा भारती से लेकर आज तक बदली तस्वीर) बुंदेलखंड ने भाजपा को उमा भारती जैसा फायरब्रांड राष्ट्रीय चेहरा दिया.. अयोध्या आंदोलन से लेकर खजुराहो की संसद और फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक उनकी राजनीतिक यात्रा भाजपा के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, लेकिन आज उनकी सक्रिय संगठनात्मक भूमिका सीमित दिखाई देती है.. इन दिनों उमा भारती की सक्रिय राजनीति से दूरी और उससे ज्यादा मौन और चुप्पी चर्चा का विषय जरूर बनी हुई है.. खासतौर से जब युवा नितिन नवीन की टीम में वसुंधरा राजे के साथ राम माधव की वापसी हुई है तो उमा भारती को नजरअंदाज करके देखना शायद जल्दबाजी होगी.. कभी अयोध्या आंदोलन का चर्चित चेहरा रही पूर्व केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का ओरछा उसे खजुराहो क्षेत्र का हिस्सा है जहां से वह चुनाव लड़कर राजनीति के शिखर पर पहुंची थी..संयोग देखिए कि उसी राजनीतिक भूगोल में, रामराजा सरकार की नगरी ओरछा में भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति होने जा रही है.. इसलिए यह बैठक एक प्रतीक भी है जिस बुंदेलखंड ने भाजपा की पुरानी पीढ़ी को राष्ट्रीय ऊंचाई दी, क्या वही बुंदेलखंड अब नई पीढ़ी के लिए राजनीतिक लॉन्चिंग पैड बनेगा? (ओल्ड लीडर के अच्छे दिन का सवाल) राजनीति में अच्छे दिन किसी के स्थायी नहीं होते, आज सत्ता के केंद्र में जो चेहरा है, कल उसकी भूमिका बदल सकती है..भाजपा संगठन में भी यही नियम लागू होता है, इसलिए गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह, नरोत्तम मिश्रा, हरिशंकर खटीक या दूसरे वरिष्ठ नेताओं के लिए सवाल राजनीतिक अस्तित्व का नहीं, अगली भूमिका का है.. भाजपा यदि इन ओल्ड लीडर के अनुभव को पूरी तरह किनारे करती है तो संगठन अपनी राजनीतिक स्मृति और अनुभव का बड़ा हिस्सा खो सकता है.. दूसरी तरफ यदि पार्टी सिर्फ पुराने चेहरों पर निर्भर रहती है तो जेन-जी और युवा मतदाताओं के बीच नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की उसकी गति प्रभावित हो सकती है.. इसलिए रास्ता शायद दोनों को जोड़ने का है। वरिष्ठ नेताओं को मेंटॉर, रणनीतिकार और मार्गदर्शक की भूमिका दी जाए, जबकि मैदान में नई पीढ़ी को जिम्मेदारी मिले.. संगठन का अनुभव ओल्ड लीडर दें और डिजिटल दौर की गति जेन-जी संभाले.. क्षेत्रीय समीकरण वरिष्ठ नेता समझें और सोशल मीडिया का नैरेटिव युवा चेहरे बनाएं.. यही मॉडल भाजपा को पीढ़ी परिवर्तन को टकराव बनने से रोक सकता है.. हेमंत के सामने असली परीक्षा हेमंत खंडेलवाल की पहली प्रदेश कार्यसमिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके सामने केवल संगठन चलाने की चुनौती नहीं, बल्कि 2028 के लिए नेतृत्व की दूसरी पंक्ति तैयार करने की चुनौती भी है.. देखना दिलचस्प होगा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के दतिया उप चुनाव में मिली हार से सीख लेकर नए चेहरे की चमक से अलग पुरानी और नई पीढ़ी के बीच कोई कंप्रोमाइज फार्मूले की ओर आगे बढ़ेंगे.. बुंदेलखंड में भाजपा के सामने कांग्रेस के साथ-साथ उत्तर प्रदेश से जुड़े क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के संभावित प्रभाव की चुनौती भी है, ऐसे में केवल संगठन का पदाधिकारी होना पर्याप्त नहीं होगा.. पार्टी को ऐसे चेहरे चाहिए जो चुनावी मैदान में प्रभाव पैदा करें, स्थानीय सामाजिक समीकरण समझें, युवाओं से संवाद करें और सत्ता पक्ष के खिलाफ उठने वाले हर राजनीतिक सवाल का जवाब दे सकें.. यही कारण है कि ओरछा से निकलने वाला संकेत सिर्फ यह नहीं बताएगा कि किसे पद मिला और किसे नहीं मिला..असली संकेत यह होगा कि भाजपा 2028 के लिए नेतृत्व का मॉडल क्या चुन रही है.. क्या जेन-जी को आगे बढ़ाकर नई टीम तैयार होगी? क्या ओल्ड लीडर को नई जिम्मेदारियों के साथ फिर सक्रिय किया जाएगा? क्या हेमंत की टीम अनुभव और ऊर्जा का मिश्रण बनेगी? और क्या रामराजा की नगरी से बुंदेलखंड के पुराने दिग्गजों के लिए वापसी का रास्ता खुलेगा? सवाल चेहरों का नहीं, भविष्य का है ओरछा की प्रदेश कार्यसमिति को इसलिए बुंदेलखंड की राजनीति में एक सियासी संकेत-पट कथा की तरह देखा जा रहा है.. नई पीढ़ी का करंट दिखाई दे रहा है, लेकिन पुराने नेताओं की राजनीतिक बैटरी अभी खत्म नहीं हुई है, भाजपा के सामने चुनौती यह है कि इस ऊर्जा और अनुभव को टकराव नहीं, ताकत में कैसे बदला जाए.. यदि युवा चेहरों को जिम्मेदारी मिलती है तो यह 2028 की नई भाजपा का संकेत होगा.. यदि वरिष्ठ नेताओं को नई भूमिका मिलती है तो यह अनुभव की वापसी होगी..और यदि दोनों को साथ लेकर चलने का फार्मूला सामने आता है तो यह हेमंत खंडेलवाल की संगठनात्मक रणनीति की सबसे बड़ी सफलता मानी जाएगी.. क्योंकि बुंदेलखंड की सियासत में सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि कौन किस सीट से अगला चुनाव लड़ेगा? किसकी राजनीतिक पारी खत्म होगी और किस मौका दिया जाएगा, सवाल यह भी है कि कौन अगली पीढ़ी तैयार करेगा, कौन संगठन संभालेगा, कौन जनता से संवाद करेगा और कौन 2028 की भाजपा का चेहरा बनेगा.. रामराजा सरकार की नगरी में बैठक होगी, फैसले संगठन करेगा, लेकिन नजरें इस पर रहेंगी कि कृपा का संकेत किस ओर जाता है,जेन-जी के नए चेहरों की ओर या उन ओल्ड लीडर की ओर, जो अब भी अपने राजनीतिक ‘अच्छे दिन’ का इंतजार कर रहे हैं।
*'ओरछा बुंदेलखंड' से बीजेपी में जेन जी की नई उड़ान' या बनेगा ओल्ड लीडर का 'एग्जिट प्लान ' (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)