राहुल गांधी की वर्कर्स यूनियंस से मुलाकात, नए लेबर कोड पर सवाल

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राहुल गांधी की वर्कर्स यूनियंस से मुलाकात, नए लेबर कोड पर सवाल

राहुल गांधी की वर्कर्स यूनियनों से मुलाकात और नए लेबर कोड पर बहस

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने देशभर की कई वर्कर्स यूनियनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर केंद्र सरकार के नए लेबर कोड पर विस्तार से चर्चा की। इस मुलाकात के बहाने नया श्रम कानून और उसके फायदे–नुकसान एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं।

राहुल गांधी की बैठक और उठी चिंताएं

राहुल गांधी ने शुक्रवार को अलग-अलग श्रमिक संगठनों के नेताओं से मुलाकात की। बैठक के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि प्रतिनिधि चार नए लेबर कोड को लेकर बेहद चिंतित हैं। उनके अनुसार ये कानून मजदूरों और उनके संगठनों के अधिकारों को कमजोर करते हैं और उनकी आवाज को दबाने की कोशिश करते हैं।

राहुल गांधी ने यूनियनों को भरोसा दिलाया कि वे संसद और अन्य मंचों पर उनकी चिंताओं को उठाएंगे और इन कोड्स पर विस्तृत चर्चा आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने संकेत दिया कि विपक्ष इन कानूनों के सामाजिक और आर्थिक असर को मुद्दा बनाएगा।

पुराने 29 कानूनों की जगह चार नए लेबर कोड

केंद्र सरकार ने देश के श्रम कानूनों को सरल बनाने के उद्देश्य से 29 अलग-अलग लेबर लॉ को समेटकर चार नए कोड बनाए हैं। इनमें कोड ऑन वेजेज 2019, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड 2020, कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020 और ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस (OSHWC) कोड 2020 शामिल हैं।

सरकार के अनुसार पहले के कानून जटिल और बिखरे हुए थे, जिससे मजदूरों और नियोक्ताओं दोनों को दिक्कत होती थी। अब इन्हें एक ढांचे में लाकर नियमों को आसान और एकरूप बनाने का लक्ष्य रखा गया है। वेज कोड 21 नवंबर 2025 से लागू हो चुका है और अगले चरण में विस्तृत नियम कंपनियों के लिए अधिसूचित किए जाएंगे।

वेतन संरचना में बड़ा बदलाव

नए वेज कोड का सबसे बड़ा असर वेतन की परिभाषा पर है। अब किसी कर्मचारी के कुल वेतन पैकेज यानी CTC में से कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा बेसिक सैलरी, डियरनेस अलाउंस और रिटेनिंग अलाउंस के रूप में रखना अनिवार्य होगा। इससे वेजेज की परिभाषा पूरे देश में लगभग एक जैसी हो जाएगी।

पहले कई कंपनियां बेसिक सैलरी को कम रखकर अलग-अलग भत्ते बढ़ा देती थीं, जिससे प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी जैसे योगदान अपेक्षाकृत कम रह जाते थे। नए नियम इस प्रवृत्ति पर रोक लगाते हैं ताकि रिटायरमेंट से जुड़ी सुविधाओं की राशि ज्यादा और स्थिर हो सके।

टेक-होम सैलरी पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि नई परिभाषा से कर्मचारियों की मासिक हाथ में मिलने वाली सैलरी कम हो सकती है, हालांकि दीर्घकाल में रिटायरमेंट लाभ बढ़ेंगे। उदाहरण के तौर पर यदि किसी कर्मचारी की CTC 50 हजार रुपये है, तो पहले बेसिक सैलरी 30 से 40 प्रतिशत रखकर प्रोविडेंट फंड की कटौती कम रहती थी। अब बेसिक को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने से PF और ग्रेच्युटी पर योगदान बढ़ेगा, लेकिन उसी अनुपात में टेक-होम सैलरी घट जाएगी।

ग्रेच्युटी की गणना भी अब केवल बेसिक पर नहीं, बल्कि वेजेज पर होगी, जिसमें बेसिक के साथ कुछ अन्य भत्ते भी शामिल होंगे। इससे ग्रेच्युटी की राशि बढ़ेगी, पर वह भी कुल CTC के भीतर से ही समायोजित होगी, यानी कंपनियां अन्य मदों में कटौती कर संतुलन बना सकती हैं।

PF, ग्रेच्युटी और सामाजिक सुरक्षा में बदलाव

नए कोड के तहत प्रोविडेंट फंड कर्मचारी के वेजेज के 12 प्रतिशत पर आधारित होगा, जो पहले केवल बेसिक पर लागू होता था। ग्रेच्युटी के नियमों में भी सुधार किया गया है। फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को अब केवल एक वर्ष की सेवा के बाद ही ग्रेच्युटी मिल सकेगी, जबकि पहले कम से कम पांच वर्ष की निरंतर सेवा आवश्यक थी। इसके अलावा ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई है, जो करमुक्त रहेगी।

सरकार ने यूनिवर्सल मिनिमम वेज की अवधारणा भी पेश की है, जो जीवन स्तर के मानकों पर आधारित होगी और संगठित व असंगठित, दोनों क्षेत्रों के अधिकांश कर्मचारियों को कवर करने का लक्ष्य रखती है। गिग वर्कर्स, जैसे डिलीवरी पार्टनर आदि, के लिए भी कंपनियों पर उनके सामाजिक सुरक्षा फंड में योगदान की जिम्मेदारी डाली गई है। कंपनियों को अपने कारोबार का एक निश्चित प्रतिशत इसमें देना होगा।

सरकार का तर्क: आधुनिक और डिजिटल श्रम ढांचा

सरकार का कहना है कि ये परिवर्तन कार्यबल को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप ढालने के लिए किए गए हैं। पुराने कानूनों के तहत अनुमानित रूप से केवल करीब 30 प्रतिशत कामगार ही कवर हो पाते थे, जबकि नए कोड से कवरेज बढ़ाने की योजना है। वेज की एक समान परिभाषा से भेदभाव कम होगा, और वेतन तथा नियुक्ति में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा।

इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के तहत कुछ उद्योगों में छंटनी और बंद करने के लिए कर्मचारियों की संख्या की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कर दी गई है। वहीं छोटे प्रतिष्ठानों के लिए कर्मचारियों की न्यूनतम संख्या में कुछ छूट दी गई है। ओवरटाइम के लिए डबल रेट पर भुगतान का प्रावधान किया गया है।

सरकार का फोकस श्रम कानून अनुपालन को डिजिटल बनाने पर भी है। इसके लिए एक लाइसेंस, एक रजिस्ट्रेशन और एक रिटर्न जैसे प्रावधान, रैंडमाइज्ड इंस्पेक्शन और जुर्माने की कंपाउंडिंग का सिस्टम तैयार किया जा रहा है।

राहुल गांधी और यूनियनें क्या कह रही हैं?

विपक्ष और कई श्रमिक संगठन आशंका जता रहे हैं कि नए कोड से कंपनियों को ज्यादा अधिकार मिलेंगे और यूनियनों की ताकत घटेगी। उनका कहना है कि लेऑफ की सीमा बढ़ने से कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षा कम हो सकती है और संगठित क्षेत्र में स्थायी नियुक्ति की जगह अनुबंध आधारित रोजगार बढ़ सकता है।

राहुल गांधी ने यूनियनों के हवाले से कहा कि इन कानूनों का वास्तविक असर मजदूरों की आवाज और संगठनों की ताकत को कम करने का हो सकता है। वे इस पूरे मुद्दे को श्रमिक अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी के नजरिए से देख रहे हैं।

निष्कर्ष: लंबी बहस की शुरुआत

नए लेबर कोड्स पर सरकार और विपक्ष के बीच स्पष्ट मतभेद दिखाई दे रहे हैं। सरकार इसे श्रम सुधार, सामाजिक सुरक्षा सुदृढ़ीकरण और आर्थिक आधुनिकता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि यूनियनें और विपक्ष इसे मजदूर हितों पर चोट मान रहे हैं।

एक ओर कर्मचारियों के रिटायरमेंट लाभ, ग्रेच्युटी, PF और सोशल सिक्योरिटी को मजबूत करने की बात है, तो दूसरी ओर टेक-होम सैलरी घटने, यूनियनों की शक्ति कम होने और नौकरी की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं। राहुल गांधी की ताजा मुलाकात दिखाती है कि आने वाले समय में संसद से लेकर सड़कों तक इन कोड्स पर गहन राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी रहने वाली है।

Arvind Vishwakarma