राज्यसभा से विदाई पर दिग्विजय सिंह बोले: 'न टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं, और काम करेंगे'

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राज्यसभा से विदाई पर दिग्विजय सिंह बोले: 'न टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं, और काम करेंगे'

राज्यसभा से विदाई पर दिग्विजय सिंह का भावुक भाषण: "न टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं"

आगामी तीन महीनों (अप्रैल से जुलाई) के दौरान राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को आज सदन में विदाई दी गई। इस अवसर पर मध्य प्रदेश से कांग्रेस के वरिष्ठ राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने भी अपना विदाई भाषण दिया, जिसमें उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन के अनुभवों और भविष्य की योजनाओं को साझा किया।

अटल जी की पंक्तियों से भविष्य का संकल्प

अपने भाषण के दौरान, दिग्विजय सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रसिद्ध पंक्तियों को दोहराया। उन्होंने कहा, "आज इस अवसर पर अटल जी की वो बात याद आती है कि मैं न टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं। आगे चलकर हम और काम करेंगे।" उन्होंने कांग्रेस पार्टी के प्रति आभार व्यक्त किया, जिसने उन्हें हर सदन में प्रतिनिधित्व का अवसर दिया। अपने भाषण के अंत में, उन्होंने कबीरदास जी की पंक्तियों का उल्लेख किया: "कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर", यह दर्शाते हुए कि वह अपने राजनीतिक जीवन में इसी सिद्धांत पर चले हैं।

राजनीतिक यात्रा और विचारधारा

दिग्विजय सिंह ने बताया कि छात्र जीवन में उनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन परिस्थितियों के चलते वे 22 साल की उम्र में सर्वसम्मति से नगर पालिका अध्यक्ष बन गए। इसके बाद वे 30 साल की उम्र में विधायक, 33 साल में मंत्री और सांसद तथा 46 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस पूरी यात्रा के दौरान वे हमेशा अपनी विचारधारा के मार्ग पर चले और कभी समझौता नहीं किया।

उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी किसी से कटुता न रखने की बात कही। मतभेद भले ही विचारधारा में रहे हों, लेकिन उन्होंने कभी मनभेद नहीं होने दिया। उन्होंने उन सभी सदस्यों के प्रति क्षमा याचना की, जिन्हें उनके भाषणों से कभी ठेस पहुंची हो। सिंह ने यह भी कहा कि उनके संबंध उन लोगों के साथ भी अच्छे रहे हैं जिनकी विचारधारा से वे कभी सहमत नहीं थे, न हैं और न रहेंगे। उन्होंने अपने राजनीतिक गुरुओं इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर का भी जिक्र किया, जिनसे प्रेरित होकर उन्होंने अपना राजनीतिक सफर तय किया।

सदन में होने वाले व्यवधानों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करते हुए, उन्होंने कहा कि वे कभी भी इसके पक्ष में नहीं रहे। लोकतंत्र की बुनियाद चर्चा है और यह सत्तापक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह विपक्ष के साथ चर्चा करके रास्ता निकाले। उन्होंने देश में बढ़ती सांप्रदायिक कटुता और मनमुटाव पर भी चिंता व्यक्त की, इसे देश की संस्कृति, लोकतंत्र और संविधान के लिए अनुचित बताया।

Bhavanesh Soni