✅✅✅✅✅✅ (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री) मेन हेड ( ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के मापदंड पर भाजपा के नीति निर्धारक... ताकत या कमजोरी...) 2 लाइन में हेडिंग ले सकते (नेक्स्ट जनरेशन ट्रांजिशन की पॉलिटिक्स और सवाल) इंट्रो भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से देश की सबसे सफल “सोशल इंजीनियरिंग” करने वाली राजनीतिक पार्टी मानी जाती रही है... मंडल... कमंडल... हिंदुत्व... राष्ट्रवाद और जातीय संतुलन के बीच भाजपा ने जिस तरह अलग-अलग सामाजिक वर्गों को अपने साथ जोड़कर चुनावी जीत का स्थायी मॉडल तैयार किया... वही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी बना... उत्तरप्रदेश से लेकर बिहार... गुजरात से लेकर मध्यप्रदेश तक भाजपा ने समय-समय पर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह केवल किसी एक वर्ग या जाति की पार्टी नहीं... बल्कि व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राजनीतिक शक्ति है... मोदी मोहन का मंत्रिमंडल हो या फिर भाजपा संगठन की केंद्र से लेकर राज्य की टीम जातीय संतुलन का विशेष ध्यान रखा जाता रहा है..लेकिन अब मध्यप्रदेश भाजपा के भीतर वही सोशल इंजीनियरिंग नए सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है... खासतौर पर तब... जब सत्ता और संगठन की कमान संभाल रहे शीर्ष चेहरों की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो चुकी है...मध्यप्रदेश में फिलहाल पांच चेहरे जिन्हें पंच निष्ठ भाजपा का पंच परमेश्वर भी माना जा रहा, सत्ता और संगठन की असली धुरी माने जा रहे मुख्यमंत्री डॉ... मोहन यादव... प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल... राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश... क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह... व्यक्तिगत तौर पर इन सभी नेताओं के खाते में संगठन विस्तार... चुनावी सफलता... रणनीतिक प्रबंधन और सत्ता संचालन जैसी कई उपलब्धियां दर्ज हैं... लेकिन इन दिनों भाजपा के भीतर और बाहर सोशल इंजीनियरिंग के मापदंड पर इन्हीं चेहरों को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं... दिलचस्प यह है कि भाजपा ने मध्यप्रदेश में ओबीसी चेहरे के रूप में डॉ... मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर पहले ही बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी... वहीं प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वैश्य समाज से आने वाले लो प्रोफाइल हेमंत खंडेलवाल मोहन सरकार में मंत्री बनते बनते हुए रह गए.. बाद में प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंप खंडेलवाल को जिम्मेदारी देकर पारंपरिक व्यापारी वर्ग और संगठनात्मक संतुलन को साधने का प्रयास किया गया... लेकिन इसके बाद सत्ता और संगठन के बाकी प्रभावशाली केंद्रों पर नजर डाली जाए... तो राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश... क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जमवाल... प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर जैसे प्रभावशाली पदों पर क्षत्रिय समुदाय की मजबूत मौजूदगी दिखाई देती है... शिवराज के उत्तराधिकारी के तौर पर ओबीसी ही मुख्यमंत्री मोहन के साथ ब्राह्मण राजेंद्र शुक्ला और अनुसूचित जाति के जगदीश देवड़ा दो उप मुख्यमंत्री पहले ही बना दिए गए थे.. उस वक्त भाजपा संगठन की कमान दो ब्राह्मण चेहरों विष्णु दत्त शर्मा अध्यक्ष और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा के पास थी.., मोहन के मंत्रिमंडल और हेमंत की संगठन टीम में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाया गया.. लेकिन पार्टी के नीति निर्धारक पंच परमेश्वर में कोई भी आदिवासी और दलित वर्ग का नहीं है.. जिनकी पसंद ना पसंद और संरक्षण पद प्रतिष्ठा पावर की कुर्सी के लिए विशेष मापदंड बन जाता.. इस वर्ग पर कांग्रेस की नजर है, इधर महिला आरक्षण को लेकर मजे हो हल्ला और गौर किया जाए तो पंच परमेश्वर दो डिप्टी सीएम में एक भी महिला नहीं है..यहीं से भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग पर सवाल खड़े होने लगे हैं... क्योंकि भाजपा जिस व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का दावा करती है... सवाल उसमें क्या सत्ता और संगठन के निर्णायक पदों पर जातीय संतुलन पूरी तरह साधा गया है... या फिर कुछ सामाजिक वर्गों का प्रभाव अपेक्षाकृत ज्यादा दिखाई देने लगा है...राजनीति खासतौर से बदलती बीजेपी में केवल मुख्यमंत्री का चेहरा ही संदेश तय नहीं करता... बल्कि निर्णय लेने वाली पूरी टीम का सामाजिक स्वरूप भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है... खासतौर पर तब... जब भाजपा जैसी पार्टी “सबका साथ... सबका विकास” के साथ सामाजिक विस्तार की राजनीति कर रही हो... ऐसे में यह बहस स्वाभाविक है कि क्या मध्यप्रदेश भाजपा में ब्राह्मण... आदिवासी... दलित... जाटव... कुर्मी... लोधी... या अन्य प्रभावशाली सामाजिक समूहों के साथ महिला नेतृत्व को नीति निर्धारण के शीर्ष स्तर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल रहा है... यही कारण है कि अब नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम और उसके बाद संभावित संगठनात्मक फेरबदल को केवल पद परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जा रहा... बल्कि इसे भाजपा के नए “सोशल बैलेंस मॉडल” की तरह भी समझा जा रहा है... क्योंकि भाजपा की राजनीति में कोई पद स्थायी नहीं होता... और न ही कोई भूमिका अंतिम मानी जाती है... ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मध्यप्रदेश भाजपा के इस “पंच परमेश्वर मॉडल” की समीक्षा आखिर कौन करेगा... और क्या आने वाले महीनों में संघ और राष्ट्रीय नेतृत्व सोशल इंजीनियरिंग के इसी सवाल को आधार बनाकर नए चेहरे... नए समीकरण और जरूरी सामाजिक संतुलन सामने लाने की तैयारी कर चुके हैं... इसका जवाब अब केवल राजनीतिक चर्चाओं में नहीं... बल्कि भाजपा के आने वाले फैसलों में दिखाई देगा... खासतौर से जब नितिन नवीन की टीम के साथ मोदी मंत्रिमंडल का पुनर्गठन ऐसे में संघ का हस्तक्षेप और परदे के पीछे सक्रिय नीति निर्धारकों की दिलचस्पी पर सवाल क्या राष्ट्रीय नेतृत्व सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखते हुए फैसला लेगा.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में मध्य प्रदेश भाजपा के पंच परमेश्वर में से दो की भूमिका बदलने से इनकार नहीं किया जा सकता.. जिसकी अपने कारण और उसके निहितार्थ निकाले जा सकते हैं.. ✅✅✅ प्वाइंटर *(पंच निष्ठा के प्रतीक पंच परमेश्वर की समीक्षा का समय और सवाल) *(मोहन मॉडल के दौर में मध्यप्रदेश भाजपा का नया शक्ति संतुलन...) *(सत्ता... संगठन... समन्वय... अब भाजपा में जवाबदेही की अग्निपरीक्षा...) ✅✅✅ पंचनिष्ठा के महारथी पंच परमेश्वर और मध्य प्रदेश भाजपा का सोशल बैलेंस मॉडल के नीति निर्धारको “समीक्षकों” की समीक्षा आखिर कौन कब करेगा... क्यों कि सियासत की मिड टर्म ऑडिट कहे या समीक्षा और संरक्षण के दौर में यह सवाल मायने रखता है.. भारतीय जनता पार्टी की राजनीति अब केवल चुनाव जीतने की रणनीति तक सीमित नहीं रही... वह अपने वैचारिक ढांचे को “पंचनिष्ठा” के सूत्र में बांधकर संगठन और सत्ता दोनों को अनुशासन... समन्वय और जवाबदेही के साथ चलाने का दावा करती रही है... यही कारण है कि भाजपा में समीक्षा केवल सरकार की योजनाओं या मंत्रियों के कामकाज तक सीमित नहीं रहती... बल्कि संगठनात्मक सक्रियता... जनसंपर्क... वैचारिक प्रतिबद्धता और नेतृत्व क्षमता तक फैली होती है...मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ... मोहन यादव द्वारा मंत्रियों की समीक्षा बैठक में जिस तरह राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश... क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जमवाल... प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की विशेष मौजूदगी रही... उसने एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा कर दिया है... जो समीक्षा कर रहे हैं... उनकी समीक्षा आखिर कौन करेगा... नेतृत्व के साथ पीढ़ी परिवर्तन के दौर में व्यक्तिगत दृश्य पार्टी को बाहर निकलना होगा.. बदलाव ऊपर से नीचे और संघ में भी जरूरी बदलाव के संकेत मिलने लगे.. सवाल क्या निकट भविष्य में इन पंच परमेश्वर में शामिल कुछ लोगों की भूमिका बदल सकती है..यह सवाल केवल व्यक्तियों का नहीं... बल्कि भाजपा के उस मॉडल का है जिसमें सत्ता और संगठन समानांतर नहीं बल्कि परस्पर नियंत्रक व्यवस्था की तरह काम करते हैं... अब मोदी, शाह के दौर में जब रणनीति को रिजल्ट में कन्वर्ट करने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप साफ नजर आता है.. चुनाव लड़ने और लड़ने के तौर तरीके बदल चुके हैं.. यही नहीं जब मध्यप्रदेश में मोहन की भाजपा संगठन के बाद सरकार की नई टीम की एक्सरसाइज पूरी कर चुनाव के ढाई साल पहले ही खुद को नई जमावट और नई तैयारी के साथ फ्रंट फुट पर खड़ा देखना चाहती तब भाजपा के पंच परमेश्वर की भूमिका गौर करने लायक हो जाती है.. मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री के चेहरे बदल जाने के बाद भाजपा के प्रदेश प्रभारी और संगठन महामंत्री द्वय पर नजर टिकना लाजमी है.. चुनाव फिर सट्टा का नेतृत्व परिवर्तन और संगठन में आमूल चूल बदलाव के बीच सामने आए फ़ैसलों में अब अनुभवी राष्ट्रीय संगठन महामंत्री की पसंद ना पसंद बहुत मायने साबित हो रही है.. (मध्यप्रदेश भाजपा का नया सत्ता-संगठन संतुलन...) डॉ... मोहन यादव जब मुख्यमंत्री बने... तब उन्हें पूरी तरह अपनी पसंद की टीम नहीं मिली थी... मंत्रिमंडल विरासत में मिला... संगठन की कमान विष्णुदत्त शर्मा और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा के पास थी... लेकिन डेढ़-दो साल के भीतर तस्वीर तेजी से बदली है...विष्णुदत्त शर्मा की जगह हेमंत खंडेलवाल प्रदेश अध्यक्ष बने... हितानंद शर्मा की भूमिका बदली और अब मध्यप्रदेश संगठन महामंत्री का पद व्यावहारिक रूप से रिक्त जैसा दिखाई देता है... जबकि क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जमवाल को मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में अधिक प्रत्यक्ष हस्तक्षेप और निर्णयकारी भूमिका मिली है...यानी संघ और भाजपा ने संकेत दिया कि मध्यप्रदेश में अब पारंपरिक “एक संगठन महामंत्री मॉडल” से आगे जाकर बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था लागू की जा रही है... इसमें केंद्र और राज्य के बीच की सबसे मजबूत और निर्णायक कड़ी शिव प्रकाश जैसे वरिष्ठ नेता मार्गदर्शक की भूमिका में हैं... अजय जमवाल अघोषित तौर पर हितानंद की भूमिका में सक्रिय हैं और महेंद्र सिंह केंद्र के संदेश वाहक कहे या राजनीतिक समन्वय के केंद्र में दिखाई देते हैं...लेकिन इसी के साथ यह बहस भी शुरू हुई कि क्या अब मुख्यमंत्री मोहन यादव को वास्तव में “फ्री हैंड” देने की तैयारी है...मुख्यमंत्री मोहन यादव... क्या अब पूरी तरह अपने राजनीतिक मोर्चे पर सधे हुए कदमों से कमांडिंग पोजीशन पर आ चुके हैं...डॉ यादव का राजनीतिक उत्थान भाजपा और संघ दोनों के लिए एक प्रयोग भी था और इसमें दूरदर्शी संदेश भी छुपा था... ओबीसी नेतृत्व... सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा का आक्रामक हिंदुत्व... प्रशासनिक नियंत्रण और संघ के समर्थन से संगठन से उनका संवाद... इन चारों बिंदुओं पर उन्हें आगे बढ़ाया गया...लेकिन अब सवाल यह है कि क्या 2028 विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा उन्हें पूरी तरह अपना राजनीतिक स्पेस तैयार करने देगी...संकेत इस दिशा में जाते दिखाई देते हैं... निगम-मंडल नियुक्तियों में उनकी पसंद स्पष्ट दिखी... प्रशासनिक फेरबदल में उनकी पकड़ बढ़ी... सरकार के एजेंडे में धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों को भी उन्होंने अपनी शैली में आगे बढ़ाया... कृष्ण पाथेय, रामपथ वन गमन , दूसरे धार्मिक लोक के साथ भोजशाला से लेकर महाकाल और विक्रमोत्सव तक... उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की... जे.पी नड्डा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से हटाने के बावजूद मोदी शाह का वरद हस्त मोहन को प्राप्त है.. सवाल क्या ऐसे में अब उनका अगला बड़ा चरण मंत्रिमंडल पुनर्गठन का हो सकता है... क्योंकि 2028 के चुनाव में यदि भाजपा मोहन यादव के चेहरे पर ही जाना चाहती है... कई मोर्चे पर जमावट मजबूत करते हुए उन्हें अपनी घोषित घोषित व्यक्तिगत किचिन कैबिनेट “कोर टीम” बनाने की आवश्यकता होगी... संगठन द्वारा घोषित कोर टीम में अभी भी उनसे ज्यादा अनुभवी मौजूद है.. इसका अर्थ केवल नए मंत्रियों को शामिल करना नहीं... बल्कि कई वरिष्ठ चेहरों की भूमिका सीमित करना भी हो सकता है... क्या यहीं से संगठन और सत्ता के बीच नए समीकरण की शुरुआत होगी... (शिव प्रकाश... मार्गदर्शक... समन्वयक या अब बदलाव के मोड़ पर...) राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश लंबे समय से मध्यप्रदेश भाजपा की रणनीतिक राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे हैं... चुनाव प्रबंधन... संगठनात्मक नियुक्तियां... समन्वय और संकट प्रबंधन... हर स्तर पर उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती रही है... फिलहाल वे केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं हैं... दिल्ली और मुंबई तक उनकी सक्रियता और राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष की टीम में उनकी स्थिति उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में भी मजबूत बनाती है...लेकिन अब उनके संदर्भ में संगठन के भीतर दो तरह की चर्चाएं समानांतर चल रही हैं... पहली... उनका अनुभव और नेटवर्क अभी भी भाजपा के लिए जरूरी है...दूसरी... पर्दे के पीछे संघ पृष्ठभूमि के दो में से एक इसी वर्ग के जिनका उन्हें संरक्षण प्राप्त ऐसे में कुछ व्यक्तियों को संरक्षण देने के आरोपों में भले ही कोई दम नहीं फिर भी उनकी भूमिका पर अंदरखाने सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं... नई भाजपा में एडजस्ट नहीं हो पा रहे और खुद को असहाय महसूस कर रहे चाहे वह केंद्र की राजनीति में शिफ्ट कर दिए गए या फिर सूबे की सियासत में हाशिया पर पहुंचा दिए गए हो उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है.. यही वह बिंदु है जहां भाजपा की “समीक्षा संस्कृति” खुद परीक्षा में आती है... यदि मंत्रियों से कई एंगल से जोड़कर यदि उनके व्यक्तिगत अचीवमेंट और प्रदर्शन पूछा जा सकता है... तो नीति निर्धारकों के साथ खासतौर से संगठन के रणनीतिकारों से भी परिणाम... समन्वय और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है...नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम में यदि बड़े बदलाव होते हैं... तो शिव प्रकाश का दायरा क्या और बड़ा हो सकता है... दूसरी संभावना यह भी है कि उन्हें अंदर खाने पनप रहे विवादों के चलते संगठन से आगे बढ़ाकर भाजपा की सक्रिय राजनीतिक भूमिका में लाया जाए... ऐसे में दोनों ही स्थितियां मध्यप्रदेश की राजनीति को प्रभावित करेंगी... (अजय जमवाल... मध्यप्रदेश में संघ का नया प्रयोग...) पावर डिस्ट्रीब्यूशन की बीजेपी पॉलिटिक्स में बड़ी जिम्मेदारी के नाम पर प्रमोशन के साथ डिमोशन जो भी मानो बदलती भूमिका में अजय जमवाल संगठन के लिए वो मजबूरी नहीं अब जरूरी हो गए..हितानंद शर्मा की बदली भूमिका के बाद अजय जमवाल का प्रभाव उनकी सक्रियता और मौजूदगी से बढ़ा है... वे केवल क्षेत्रीय संगठन महामंत्री नहीं... बल्कि अब मध्यप्रदेश भाजपा के परिचालन ढांचे के महत्वपूर्ण केंद्र बनते दिखाई दे रहे हैं...उनकी शैली अपेक्षाकृत शांत लेकिन फिलहाल निष्पक्ष और हस्तक्षेपकारी मानी जाती है... संघ ने उन्हें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों की जिम्मेदारी देकर संकेत दिया कि वह “केंद्रीकृत निगरानी” के मॉडल पर काम कर रहा है...लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या यह व्यवस्था स्थायी है... या बदलाव के लिए नितिन नवीन की टीम से लेकर संघ की दशहरा बैठक का इंतजार करना होगा.. यदि मुख्यमंत्री मोहन यादव को वास्तव में अधिक स्वतंत्रता देनी है... जो बढ़ती जवाबदेई के कारण जरूरी मानी जा रही.. तो संगठन के वरिष्ठ स्तर पर भी बदलाव की आवश्यकता पड़ेगी... क्योंकि मजबूत मुख्यमंत्री मॉडल और बहुस्तरीय संगठनात्मक निगरानी लंबे समय तक साथ-साथ नहीं चलती... केंद्र में सरकार रहते संगठन को राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्यों में भी कभी दूसरा पावर सेंटर नहीं बनने दिया गया.. मध्य प्रदेश में भी इस लाइन पर आगे बढ़ाने के लिए कई बड़े फैसले लिए जा सकते हैं.. उधर संघ धीरे-धीरे फैसले लेने के लिए जाना जाता है... इसलिए संभव है कि अति मास खत्म होने या फिर दशहरा बैठक तक मध्यप्रदेश भाजपा का नया रोडमैप स्पष्ट हो जाए... (महेंद्र सिंह... प्रभारी से आगे की भूमिका और चुनाव लड़ना...) प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह ने मध्यप्रदेश में लंबी पारी खेली है... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मध्य प्रदेश दौरे के दौरान तालियां कब कैसे क्यों बजाने के उनके टिप्स को छोड़ दिया जाए तो उन्होंने सह प्रभारी के बावजूद मध्य प्रदेश में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है.. सत्ता और संगठन के बीच संवाद बनाए रखने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है... उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी के नजदीकी लेकिन मोदी और शाह की पसंद बनकर मध्य प्रदेश में टिके रहना उनकी उपलब्धियां को सामने रखता है..इस बीच उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही महेंद्र की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं... योगी मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यदि उन्हें मंत्री पद नहीं मिला... तो क्या वे फिर सक्रिय चुनावी राजनीति की ओर लौटेंगे...नितिन नवीन की नई टीम में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है... यदि ऐसा होता है... तो मध्यप्रदेश को नितिन की टीम सामने आने के साथ नया प्रभारी भी मिल सकता है.. भाजपा में प्रभारी बदलना केवल व्यक्ति परिवर्तन नहीं होता... वह राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी होता है... महेंद्र ने न सिर्फ अपनी उपयोगिता मध्य प्रदेश में सिद्ध की बाल की बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान भी भरोसे के संकट के बीच अपनी ओर खींचा है.. जो भी हो निकट भविष्य में मध्य प्रदेश से मुक्त होने के बावजूद भी उनकी भूमिका अहम और पहले से ज्यादा प्रभावित होने वालीहै.. (हेमंत खंडेलवाल... संगठन बना सरकार की ताकत) प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल फिलहाल मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ तालमेल की राजनीति करते दिखाई देते हैं... भाजपा लंबे समय बाद मध्यप्रदेश में ऐसा प्रदेश अध्यक्ष देख रही है जो टकराव नहीं बल्कि समन्वय का चेहरा बनकर उभरा है... संघ के दो बड़े शीर्ष नेताओं सोनी ,सौदान की पसंद के तौर पर उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने का आशीर्वाद निर्वाचित और मनोनीत की बहस के बीच करीब एक साल पहले ही मिल गया था.. खंडेलवाल जिन्हें राजनीति विरासत में मिली और जो महामंत्री से प्रदेश अध्यक्ष बने मध्य प्रदेश के पहले भाजपा के ऐसे अध्यक्ष होंगे जिनका नाम और दावा लंबे समय तक चर्चा में रहा और उस पर अंतिम मोहर भी लगाई गई.. ईमानदार और फिजूल खर्ची की चुनौती पर पहले ही खड़ा उतार कर दिखा चुके हेमंत खंडेलवाल के सामने भी बड़ा राजनीतिक विकल्प रहा और अभी वह खत्म नहीं हुआ है... सवाल क्या वे 2028 तक प्रदेश अध्यक्ष बने रहना चाहेंगे...या फिर अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले मोहन मंत्रिमंडल में शामिल होकर सरकार का हिस्सा बनेंगे... यदि भाजपा 2028 के लिए नए सामाजिक समीकरण बनाना चाहती है... तो संभव है कि संगठन और सरकार दोनों में नए प्रयोग हों... (असली प्रश्न... “पंच परमेश्वर” की समीक्षा कब...) भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसकी संगठनात्मक समीक्षा प्रणाली मानी जाती है... लेकिन यही प्रणाली तब चुनौती में आ जाती है जब समीक्षा करने वाले चेहरे लंबे समय तक बिना मूल्यांकन के बने रहें...मध्यप्रदेश में फिलहाल पांच चेहरे सत्ता-संगठन की धुरी हैं... मुख्यमंत्री डॉ... मोहन यादव... प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल... राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश...क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जमवाल...प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह...ये पांचों मिलकर भाजपा का “पंच परमेश्वर मॉडल” बनाते दिखाई देते हैं... लेकिन भाजपा की राजनीतिक संस्कृति यह भी कहती है कि कोई पद स्थायी नहीं और कोई भूमिका अंतिम नहीं...इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इन पांचों की समीक्षा आखिर कौन करेगा... उत्तर स्पष्ट है... संघ... राष्ट्रीय नेतृत्व और अंततः चुनावी परिणाम...प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी... केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम ही आने वाले महीनों में यह तय करेगी कि मध्यप्रदेश में कौन आगे बढ़ेगा... कौन नई भूमिका में जाएगा और किसे सीमित किया जाएगा... (2028 की तैयारी और नई पीढ़ी का सवाल...) भाजपा अब 2028 को केवल विधानसभा चुनाव नहीं... बल्कि “नेक्स्ट जनरेशन ट्रांजिशन” की तरह देख रही है...पार्टी जानती है कि शिवराज सिंह चौहान युग के बाद अब स्थायी नेतृत्व संरचना तैयार करना जरूरी है... मोहन यादव उसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं... लेकिन यदि उन्हें पूरी तरह स्थापित करना है... तो उनके ऊपर मौजूद कई “सुपर स्ट्रक्चर” को भी धीरे-धीरे बदलना होगा...यानी आने वाले समय में केवल मंत्रिमंडल फेरबदल नहीं होगा... बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश के एडजस्टमेंट फार्मूला के साथ संगठनात्मक फेरबदल भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा...संभव है कि जून में नितिन नवीन की नई टीम और उसके बाद संघ की दशहरा बैठक के बीच भाजपा मध्यप्रदेश का नया रोडमैप तय कर दे... अभी तो समीक्षा बैठक के दौरान प्रदेश अध्यक्ष ने ही मोहन मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाओं परनाम लगा दिया है.. ऐसे में उस रोडमैप में मंत्रिमंडल विस्तार... संगठनात्मक पुनर्गठन... राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व और नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति... सब शामिल होंगे... और तब यह साफ हो जाएगा कि भाजपा मध्यप्रदेश में “समीक्षा की राजनीति” को केवल मंत्रियों तक सीमित रखती है... या फिर “समीक्षकों” की समीक्षा का साहस भी दिखाती है... मोहन की और ज्यादा मजबूती के लिए बिसात बिछाई जाने के संकेत मिलने लगे..
सोशल इंजीनियरिंग’ के मापदंड पर भाजपा के नीति निर्धारक...ताकत या कमजोरी.. (सवाल दर सवाल राकेश अग्निहोत्री)