भोजशाला इतिहास पर संघ प्रदर्शनी में 24 अध्यायों की कहानी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के दौरान डेली कॉलेज परिसर में 'भोजशाला के प्रत्यक्ष प्रमाण' शीर्षक से विशेष प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें भोजशाला के इतिहास को 24 अध्यायों में राजा भोज के शासनकाल और 1034 में स्थापना से लेकर मध्यकालीन आक्रमणों, वाग्देवी प्रतिमा के लंदन पहुंचने, अंग्रेजों के पुरातात्विक अध्ययन और आजादी के बाद हुए आंदोलनों तक क्रमवार प्रस्तुत किया गया है।
प्रदर्शनी में भोजशाला के स्थापत्य और पुरातात्विक अवशेषों को प्रमुखता से रखा गया है। प्रवेश द्वार के अंदर दाईं ओर प्रकृत भाषा में लिखे परिजात मंजरी और विजयश्री नाटिका से संबंधित शिलालेखों के फोटो, सिद्धि यंत्र, सनातन प्रतीकों से सुसज्जित स्तंभ, खंडित शिलालेख अवशेष, देवस्थान जहां राजा भोज द्वारा विष्णु-शिव आराधना का दावा, फर्श खुदाई में मिली वामन प्रतिमा, यज्ञकुंड से प्राप्त मगरमुख आकृति, स्तंभों पर कीर्ति चिह्न, गर्भगृह शिखर के अंदर अष्टदल कमल और फर्श पर देवनागरी शिलालेखों के फोटो प्रदर्शित हैं।
इतिहास क्रम में पहला अध्याय 'धारा नगरी के राजा' में मालवा की प्राचीन राजधानी धार और परमार वंश के राजा भोज का परिचय है। दूसरा अध्याय 'मां सरस्वती के वरद पुत्र' में 1034 में भोजशाला (सरस्वती कंठाभरण विश्वविद्यालय) की स्थापना का उल्लेख है। आगे के अध्यायों में स्थापत्य, संस्कृत शिलालेखों, देवी वाग्देवी की प्रतिमा और प्राण प्रतिष्ठा यज्ञ का विवरण है। प्रदर्शनी के अनुसार देश के विभिन्न भागों से आए शिल्पकारों ने मूर्तियों और स्तंभों का निर्माण किया। भोजशाला को धार्मिक स्थल के साथ मालवा के बड़े शिक्षा केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया जहां 5000 से अधिक विद्यार्थी संस्कृत, संगीत, खगोल विज्ञान, योग, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र पढ़ते थे। शास्त्रार्थ, वेद मंत्रोच्चारण, साहित्य रचना और शिल्पकला गतिविधियों का हिस्सा थे। राजा भोज के ग्रंथों सरस्वती कंठाभरण, श्रृंगार प्रकाश, समरांगण सूत्रधार, युक्ति कल्पतरु, राजमार्तंड, तत्व प्रकाश, शालिहोत्र, प्रश्न चूड़ामणि आदि की सूची भी प्रदर्शित है।
आठवें अध्याय 'धारा का विकट काल' से विध्वंस और मध्यकालीन आक्रमणों का विवरण शुरू होता है। 'इस्लामिक षड्यंत्र' अध्याय में कमाल मौलाना नामक फकीर के 1269 में भोजशाला आने, 36 वर्षों तक संपर्क बनाकर अलाउद्दीन खिलजी तक जानकारी पहुंचाने का दावा है। 1305 में खिलजी के मालवा आक्रमण, परमार शासकों महलक देव और गोगादेव के प्रतिरोध और बलिदान का वर्णन है। 'शास्त्र और शस्त्र' भाग में भोजशाला के आचार्यों और विद्यार्थियों द्वारा प्रतिकार, लगभग 1400 विद्वानों को बंदी बनाकर इस्लाम स्वीकार करवाने और इनकार पर हत्या का आरोप लगाया गया है। 1401 में दिलावर खान द्वारा स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर राजा भोज के प्रासाद सूर्य मार्तंड और विजय मंदिर के शिखर ध्वस्त कर मंदिर स्तंभों से लाट मस्जिद बनाने, 1514 में महमूद शाह खिलजी द्वितीय के आक्रमण और भोजशाला अवशेषों से कमाल मौलाना की मजार बनाने का उल्लेख है।
18वें अध्याय में 1857 में अंग्रेजी पुरातत्व विभाग की खुदाई में स्फटिक पत्थर की वाग्देवी प्रतिमा मिलने, 1880 में भोपाल के पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड द्वारा प्रतिमा लंदन ले जाकर रॉयल म्यूजियम में रखवाने, 1909 में धार रियासत द्वारा भोजशाला को राजा भोज का निर्मित हिंदू स्थापत्य मानकर संरक्षित स्मारक घोषित करने, 1961 में पुरातत्ववेत्ता विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा लंदन जाकर प्रतिमा का अध्ययन और पहचान करने की बात शामिल है।
आधुनिक विवाद और आंदोलनों की समयरेखा
प्रदर्शनी के अंतिम हिस्से में आधुनिक विवादों का क्रमवार विवरण है। 1936 में महाराजा के स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना अनुमति के बाद परिसर में नमाज को लेकर विवाद शुरू होने, 21-23 दिसंबर 1943 में कमालुद्दीन चिश्ती का पहला उर्स आयोजित होने, विरोध और तनाव, मुख्य द्वार के बाहर कब्रिस्तान बनाए जाने के आरोपों का उल्लेख है। 1952 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा द्वारा श्री महाराजा भोज स्मृति वसंतोत्सव समिति के गठन, इसी वर्ष मामला केंद्र सरकार द्वारा पुरातत्व विभाग को सौंपे जाने का जिक्र है। 4 फरवरी 1991 से भोज उत्सव समिति द्वारा पूजा अधिकार की मांग को लेकर प्रत्येक मंगलवार सत्याग्रह शुरू करने, 1996 के विवाद और अस्थायी समझौते के तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति देने की व्यवस्था का विवरण दिया गया है।
Satyam Tripathi