मध्य प्रदेश के 70वें स्थापना दिवस पर अजूबे: चने का झाड़, 5 किलो आम, अजगरों का बसेरा

· 1 min read
मध्य प्रदेश के 70वें स्थापना दिवस पर अजूबे: चने का झाड़, 5 किलो आम, अजगरों का बसेरा

मध्य प्रदेश के 70वें स्थापना दिवस पर अनोखी विरासत और प्राकृतिक अजूबे

मध्य प्रदेश अपना 70वां स्थापना दिवस मना रहा है। इन सात दशकों में प्रदेश ने बहुत कुछ देखा और बदला, लेकिन यहां के अजूबे आज भी बरकरार हैं। उज्जैन से करीब 70 किलोमीटर दूर भाटपचलाना गांव में चने का एक विशाल पेड़ मौजूद है, जिसे 'चने का झाड़' कहा जाता है। बताया जाता है कि यह पेड़ करीब 600 साल पुराना है और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। इसी वजह से भाटपचलाना को 'चने के झाड़ वाला गांव' भी कहा जाता है।

अलीराजपुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर कट्ठीवाड़ा में फलों के राजा आम की खास किस्म 'नूरजहां' पैदा होती है। कट्ठीवाड़ा को यहां का चेरापूंजी भी कहा जाता है क्योंकि जिले में सबसे ज्यादा बारिश यहीं होती है। यही खास जलवायु नूरजहां आम को खास बनाती है। इसका एक आम 5 किलो तक का होता है, यानी एक ही आम पूरे परिवार के लिए काफी है। मंडला जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर अजगर दादर गांव में इंसानों से ज्यादा अजगरों का बसेरा है। गहरी दरारों वाला यह पथरीला इलाका नीचे से खोखला है और यहां चूहों की भरमार है, जिससे यह जगह अजगरों के लिए मुफीद ठिकाना बन गई है। सर्दियों में अजगरों के झुंड चट्टानों से निकलकर धूप सेंकते नजर आते हैं। राजगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर झिरी गांव की आबादी लगभग 1500 है। यहां बच्चों, युवाओं, महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई देवभाषा संस्कृत में बातचीत करता है। गांव के स्कूल में भी संस्कृत को प्राथमिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है। बताया जाता है कि संस्कृति और संस्कृत को बचाने के उद्देश्य से करीब 23 साल पहले इसकी शुरुआत की गई थी।

नदियां, संगीत और ऐतिहासिक धरोहर

मध्य प्रदेश को नदियों का मायका भी कहा जाता है क्योंकि नर्मदा, चंबल, शिप्रा और ताप्ती समेत कई नदियों का उद्गम यहीं हुआ है। जहां देश की ज्यादातर प्रमुख नदियां पूर्व दिशा में बहते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, वहीं नर्मदा पश्चिम दिशा में बहते हुए अरब सागर में समा जाती है। देवास की कावड़िया हिल्स पर पत्थरों से संगीत निकलता है। उदयनगर फॉरेस्ट रेंज में आने वाले इस इलाके में करीब 7 पहाड़ियां हैं, जो लगभग 5 किलोमीटर के दायरे में फैली हैं। इन पर लाखों खंभेनुमा पत्थर बिखरे हुए हैं जो षटकोण, पंचकोण, चतुष्कोण और त्रिभुज जैसी अलग-अलग आकृतियों में हैं। इन काले पत्थरों को किसी छोटे पत्थर या धातु से बजाने पर वाद्य यंत्रों जैसी मधुर आवाज निकलती है। बुरहानपुर में उतावली नदी के किनारे शाह नवाज खां का मकबरा है, जिसे 'काला ताजमहल' कहा जाता है। इसके बाहरी हिस्से में काले पत्थर का इस्तेमाल किया गया है और इसका निर्माण आगरा के ताजमहल से भी पहले हुआ था। मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर गोल आकार के विशाल गलियारे, 64 छोटे-छोटे कमरों और बीच में भव्य मंडप वाली अनूठी स्थापत्य कला के लिए मशहूर है। इसकी वास्तुकला को लेकर दावा किया जाता है कि देश का पुराना संसद भवन इसी मंदिर की डिजाइन से प्रेरित होकर बनाया गया था।

Navjeet Kaur