अहं ब्रह्मास्मि बयान पर सियासत, दिग्विजय के राम मंदिर न जाने पर विवाद
अयोध्या यात्रा के सवाल पर अद्वैत वेदांत का हवाला
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से राम मंदिर दर्शन पर सवाल पूछे जाने के बाद नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने अयोध्या जाने की आवश्यकता से इनकार करते हुए अद्वैत वेदांत दर्शन और अहं ब्रह्मास्मि का संदर्भ दिया, जिस पर भाजपा नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
दिग्विजय सिंह ने क्या कहा
एक प्रश्न के जवाब में कि वे राम मंदिर के लिए दान दे चुके हैं, अब दर्शन के लिए कब जाएंगे, दिग्विजय सिंह ने कहा कि वे इस समय आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत का अध्ययन कर रहे हैं और जल्द ही उज्जैन संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति का प्रवचन भी कराएंगे।
उन्होंने समझाते हुए कहा कि अद्वैत वेदांत के अनुसार अहं ब्रह्मास्मि, यानी स्वयं में ही ब्रह्म का वास होता है। उनके अनुसार जब हृदय में ही नारायण विराजमान हैं, तब किसी विशेष स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने अयोध्या जाने को अनिवार्य मानने से इनकार किया।
भाजपा सांसद आलोक शर्मा का पलटवार
दिग्विजय सिंह के इस बयान पर भोपाल के भाजपा सांसद आलोक शर्मा ने कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और पूरे समाज की आस्था के केंद्र हैं। शर्मा ने तंज भरे सवाल किए कि अगर दिग्विजय सिंह राम मंदिर नहीं जाएंगे तो क्या वे दिल्ली की जामा मस्जिद या मक्का-मदीना जाने पर विचार करेंगे।
आलोक शर्मा की टिप्पणी के जरिए यह संकेत देने की कोशिश की गई कि दिग्विजय सिंह हिंदू आस्थाओं से दूरी बना रहे हैं और मुस्लिम समुदाय के धार्मिक स्थलों की ओर अधिक झुकाव रखते हैं। इस बयान ने विवाद को और तीखा बना दिया।
राम मंदिर के लिए दिया दान और पारदर्शिता की मांग
जनवरी 2021 में दिग्विजय सिंह ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माध्यम से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को 1,11,111 रुपये का चेक भेजा था। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री को एक विस्तृत पत्र भी लिखा था।
इस पत्र में उन्होंने अपील की थी कि राम मंदिर के नाम पर चंदा संग्रह पूरी तरह सौहार्दपूर्ण और पारदर्शी वातावरण में होना चाहिए, ताकि समाज में किसी तरह का तनाव या विभाजन न पैदा हो। उन्होंने कहा था कि यह आस्था का विषय है, इसलिए सभी वर्गों की भावनाओं का सम्मान किया जाना जरूरी है।
इसी पत्र में दिग्विजय सिंह ने विश्व हिंदू परिषद द्वारा पहले से एकत्र किए गए चंदे का लेखा-जोखा सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई थी। उनके अनुसार, चंदे की पारदर्शिता से लोगों का विश्वास और मजबूत होगा। उस समय राम मंदिर निर्माण के लिए चल रहे व्यापक चंदा अभियान के बीच उनके इस रुख ने काफी चर्चा बटोरी थी।
रामेश्वर शर्मा का आरोप: सनातन से नाता तोड़ने की बात
भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने भी दिग्विजय सिंह पर तीखा हमला किया। उनका आरोप है कि दिग्विजय सिंह अब सनातन धर्म से नाता तोड़ चुके हैं और मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथ की कठपुतली बन गए हैं। उन्होंने कहा कि दिग्विजय चर्च जा सकते हैं, मज़ार पर चादर चढ़ा सकते हैं, लेकिन मंदिर जाने से बचते हैं।
रामेश्वर शर्मा ने यह भी कहा कि जब बांग्लादेश में एक दलित हिंदू को जिंदा जलाए जाने की घटना हुई, तब दिग्विजय सिंह ने उसके प्रति संवेदना नहीं जताई, बल्कि उन्होंने यह कथन दिया कि भारत में मुसलमानों को सताया जा रहा है। शर्मा के अनुसार, यह रुख सनातन के विरोध और कट्टरपंथियों के समर्थन जैसा है।
पिछले बयानों के कारण चर्चाओं में रहते हैं दिग्विजय
दिग्विजय सिंह अक्सर अपने बयानों के कारण राजनीतिक विवादों के केंद्र में रहे हैं। हाल ही में उन्होंने मंदिरों की माफी भूमि और सरकारी जमीनों पर कथित कब्जों को लेकर भी भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि जो लोग उन्हें मुसलमान कहकर निशाना बनाते हैं, वही लोग मंदिरों और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा किए बैठे हैं।
उनका आरोप था कि जो लोग धर्म की ठेकेदारी लेने का दावा करते हैं, वही सबसे ज्यादा धर्म विरोधी काम करते हैं। इस तरह के बयान भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक टकराव को और गहरा करते रहे हैं।
निष्कर्ष: दर्शन बनाम दर्शनशास्त्र की बहस
दिग्विजय सिंह के अहं ब्रह्मास्मि और अद्वैत वेदांत के हवाले से राम मंदिर न जाने की बात ने राजनीतिक और वैचारिक बहस दोनों को हवा दी है। उनके समर्थक इसे व्यक्तिगत आस्था और दार्शनिक दृष्टि का मामला बताते हैं, जबकि भाजपा नेता इसे सनातन पर हमला और हिंदू आस्थाओं से दूरी के रूप में पेश कर रहे हैं।
राम मंदिर के लिए दान देने और चंदे में पारदर्शिता की मांग के बावजूद, उनके वर्तमान बयान से यह सवाल उठ रहा है कि धार्मिक स्थलों की यात्रा को लेकर नेताओं के व्यक्तिगत विचार किस हद तक सार्वजनिक राजनीतिक मुद्दा बन जाते हैं। फिलहाल, यह विवाद आस्था, राजनीति और दर्शनशास्त्र के त्रिकोण में नई चर्चा को जन्म दे रहा है।
Gulzar Ahmad