अंगद का पैर बनी भाजपा....... ( शाह ने लखनऊ से फूका चुनावी शंखनाद ) खबरों की खबर.... राजीव त्रिपाठी

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अंगद का पैर बनी भाजपा....... ( शाह ने लखनऊ से फूका चुनावी शंखनाद )
खबरों की खबर.... राजीव त्रिपाठी

(लखनऊ से दिल्ली तक भाजपा का संदेश, योगी पर भरोसा, 2027 की तैयारी) राजनीतिक संकेत और निहितार्थ .. अंगद का पैर बताकर भाजपा ने अपने राजनीतिक आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया। - योगी के नेतृत्व को आगे रखकर शाह ने संगठन को दिया एकजुटता का संदेश। - 2017 की जीत का संदर्भ देकर पुराने चुनावी इतिहास को बनाया भविष्य की रणनीति का आधार। - बूथ, जातीय समीकरण और संगठन के सहारे तीसरी पारी की बिसात। - UCC के वादे से भाजपा ने चुनावी विमर्श में जोड़ा नया वैचारिक मुद्दा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव कभी केवल चुनाव नहीं होते। यहां सत्ता का संघर्ष सामाजिक समीकरणों, संगठन की ताकत, नेतृत्व की स्वीकार्यता और दिल्ली की राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच आकार लेता है। विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर दिखाई दे सकते हैं, लेकिन लखनऊ में 30 अक्टूबर को अमित शाह की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश की अगली लड़ाई की तैयारी अब भविष्य की योजना नहीं, वर्तमान की राजनीतिक प्राथमिकता बन चुकी है। 'अंगद का पैर' महज एक राजनीतिक उपमा नहीं है। इसके भीतर भाजपा का आत्मविश्वास भी छिपा है और अपने कार्यकर्ताओं को दिया गया मनोवैज्ञानिक संदेश भी। शाह के इस कथन का सीधा अर्थ यही है कि पार्टी अपने संगठन, सरकार और चुनावी आधार को इतना मजबूत मान रही है कि विपक्ष के लिए उसे चुनौती देना आसान नहीं होगा। लेकिन राजनीति में मजबूत होने का दावा और मजबूती को मतदाता के भरोसे में बदलना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। शायद यही वह अंतर है जिसे भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अभी से पाटना चाहता है। लखनऊ की बैठक को इसी संदर्भ में देखना होगा। लगभग 2,850 प्रतिनिधियों की मौजूदगी में बूथ प्रबंधन, सामाजिक समीकरण और संगठन की सक्रियता पर जोर देना बताता है कि भाजपा नेतृत्व केवल बड़े नारों के भरोसे चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी नहीं कर रहा। उसकी नजर उस अंतिम मतदाता तक पहुंचने पर है, जहां चुनावी जीत और राजनीतिक दावे के बीच का अंतर तय होता है। अर्जुन की तरह लक्ष्य पर नजर रखने का संदेश दरअसल कार्यकर्ताओं को भटकाव से बचाकर एक चुनावी अनुशासन में बांधने की कोशिश है। इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरता है। शाह ने जिस तरह योगी सरकार के कामकाज और माफिया के खिलाफ कार्रवाई को अपनी राजनीतिक दलील का हिस्सा बनाया, उससे संकेत मिलता है कि भाजपा 2027 में शासन और नेतृत्व को अपनी चुनावी पूंजी के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। यहां एक दिलचस्प सवाल भी है कि क्या भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व योगी के चेहरे को केवल सरकार की उपलब्धियों के प्रतिनिधि के रूप में देख रहा है या उन्हें अगले चुनाव की पूरी राजनीतिक रणनीति का प्रमुख आधार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है? 2017 की 312 सीटों वाली जीत का स्मरण भी यूं ही नहीं कराया गया। राजनीति में पुराने चुनावी परिणाम केवल इतिहास नहीं होते, वे कार्यकर्ताओं के मनोबल और भविष्य की संभावनाओं का आधार भी बनते हैं। शाह ने उस दौर का संदर्भ देकर भाजपा को उसकी सबसे बड़ी चुनावी सफलता याद दिलाई। संदेश साफ है कि जिस उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कभी असंभव दिखाई देने वाली जीत हासिल की थी, वहां दोबारा वैसा ही राजनीतिक वातावरण तैयार करने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन 2017 का उत्तर प्रदेश और 2027 का उत्तर प्रदेश एक जैसे नहीं होंगे। मतदाताओं की अपेक्षाएं, विपक्ष की रणनीति और सामाजिक परिस्थितियां बदल चुकी होंगी। शाह की राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू वैचारिक मुद्दों का चयन है। अयोध्या में 30 अक्टूबर 1990 की घटना का उल्लेख, समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर निशाना तथा राहुल गांधी और कांग्रेस को घेरना केवल विपक्षी आलोचना नहीं है। इसके जरिए भाजपा पुराने राजनीतिक संघर्षों को नए चुनावी संदर्भ में जीवित रखना चाहती है। तीसरी बार सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा भी इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है। यानी भाजपा विकास और शासन के साथ अपने वैचारिक एजेंडे को भी चुनावी बहस के केंद्र में रखना चाहती है। अब इस तस्वीर को लखनऊ तक सीमित करके देखना राजनीतिक भूल होगी। अमित शाह का लखनऊ में संगठन के बीच पहुंचना दिल्ली के लिए भी एक संदेश है। उत्तर प्रदेश केवल 80 लोकसभा सीटों वाला राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक मंच है। यहां की सत्ता का समीकरण केंद्र की राजनीति के आत्मविश्वास और भविष्य की रणनीति दोनों को प्रभावित करता है। इसलिए 2027 की तैयारी में दिल्ली की दिलचस्पी स्वाभाविक है। दूसरी ओर विपक्ष को कमजोर मान लेना भी जल्दबाजी होगी। विधान परिषद चुनाव में भाजपा को छह और समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिलना बताता है कि राजनीतिक मुकाबले में विपक्ष की अपनी जगह बनी हुई है। अखिलेश यादव के सामने चुनौती केवल भाजपा के संगठन से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने और सत्ता विरोधी भावनाओं को एक राजनीतिक विकल्प में बदलने की भी होगी। खबरों की खबर यह है कि लखनऊ में अंगद का पैर बताकर भाजपा ने अपनी जमीन मजबूत होने का दावा किया है, लेकिन असली सवाल यह नहीं कि कौन किसे हिला सकता है। असली सवाल यह है कि 2027 तक कौन मतदाता के मन में अपनी जगह बचा पाता है और कौन नए सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में खड़ा कर पाता है। शाह ने चुनावी शंखनाद कर दिया है, योगी का नेतृत्व इस रणनीति के केंद्र में दिखाई दे रहा है और दिल्ली की निगाहें लखनऊ पर टिक चुकी हैं। अब यह मुकाबला केवल भाजपा बनाम विपक्ष का नहीं, बल्कि दावों, धारणाओं और राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बनने जा रहा है। अंगद का पैर कितना मजबूत है, इसका फैसला मंच से नहीं, मतदाता के मन से होगा।