दिल्ली में दांव लखनऊ में तनाव.....अखिलेश की दिल्ली रैली और भाजपा के मिशन 2027 नें बढ़ाई सियासी हलचल ( खबरों की खबर राजीव त्रिपाठी)

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दिल्ली में दांव लखनऊ में तनाव.....अखिलेश की दिल्ली रैली और भाजपा के मिशन 2027 नें बढ़ाई सियासी हलचल ( खबरों की खबर राजीव त्रिपाठी)

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय दो शहर सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। दिल्ली और लखनऊ। दिल्ली में आज विपक्ष की महारैली होने जा रही है, जबकि लखनऊ में भाजपा मिशन 2027 की तैयारियों में जुटी है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों तरफ की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र उत्तर प्रदेश बनता जा रहा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव दिल्ली के मंच पर राहुल गांधी के साथ दिखाई देंगे, लेकिन उनकी असली राजनीतिक परीक्षा लखनऊ की सत्ता को लेकर है। सवाल यही है कि दिल्ली में विपक्ष की एकजुटता क्या उत्तर प्रदेश में भी कायम रह पाएगी ? शनिवार को अखिलेश यादव ने लखनऊ में साफ किया कि इंडिया गठबंधन के सभी घटक दल दिल्ली की महारैली में भाग लेंगे। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए विपक्ष की प्रतीकात्मक संसद को सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम बताया। उधर उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा 'मोना' ने रैली में प्रदेश से बड़ी भागीदारी का दावा किया। इन बयानों ने दिल्ली के प्रदर्शन को उत्तर प्रदेश की राजनीति से भी जोड़ दिया है। इधर भाजपा की तैयारी केवल बड़े नेताओं के भाषणों तक सीमित नहीं है। लखनऊ में लगातार बैठकों के जरिए संगठन की कमजोरियां, बूथों की स्थिति और कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर ध्यान दिया जा रहा है। पार्टी 2017 की चुनावी रणनीति के उपयोगी पहलुओं को फिर अपनाने की संभावनाएं देख रही है। यह तैयारी बताती है कि भाजपा विपक्ष की गतिविधियों के बीच अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने पर जोर दे रही है। इस बीच विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने समाजवादी पार्टी को नया मुद्दा दिया है। अखिलेश ने पांच सीटों पर पार्टी की सफलता को बदलाव का संकेत बताया है। हालांकि इन चुनावों के आधार पर विधानसभा चुनाव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। सपा पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के साथ शिक्षा, आरक्षण और मतदाता सूची के मुद्दे उठा रही है। राजनीतिक हलकों में एक आकलन यह भी है कि अखिलेश दिल्ली के मंच से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं, जबकि भाजपा विपक्ष की एकजुटता के पीछे छिपे नेतृत्व और सीट बंटवारे के मतभेदों पर नजर रख रही है। असली लड़ाई केवल वोटों की नहीं, बल्कि विपक्षी मतों के बिखराव को रोकने और अपने सामाजिक आधार को बचाए रखने की भी है। लेकिन असली पेच कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के रिश्तों में है। दिल्ली में दोनों दल एक मंच पर आ सकते हैं, मगर उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे और राजनीतिक नेतृत्व को लेकर पहले से मतभेद सामने आते रहे हैं। यही सवाल 2027 की तैयारी में महत्वपूर्ण होगा। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है, जबकि समाजवादी पार्टी प्रदेश में विपक्ष के नेतृत्व पर अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहेगी। खबरों की खबर यह है कि; दिल्ली में विपक्ष अपनी एकजुटता दिखाना चाहता है और लखनऊ में भाजपा अपने संगठन को चुनाव के लिए तैयार कर रही है। एक तरफ मताधिकार और संविधान की बहस है, दूसरी तरफ सरकार के कामकाज और संगठन की ताकत का सवाल। दोनों की रणनीति अलग है, लेकिन मंजिल एक ही है—उत्तर प्रदेश का 2027 का विधानसभा चुनाव। अब देखने वाली बात होगी कि रविवार की महारैली के बाद विपक्ष की एकजुटता केवल दिल्ली के मंच तक रहती है या उत्तर प्रदेश में भी उसका कोई ठोस राजनीतिक रूप सामने आता है। क्योंकि दिल्ली में साथ खड़े होना आसान है, लखनऊ में साथ चुनाव लड़ना कहीं बड़ी चुनौती।