बांके बिहारी मंदिर चबूतरे से अतिक्रमण हटाने की तैयारी, सेवायत गद्दी पर विवाद
वृंदावन स्थित ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर के चबूतरे से दुकानों के अतिक्रमण को हटाने की दिशा में मंदिर उच्चाधिकार प्रबंधन समिति ने कदम बढ़ा दिए हैं। समिति ने सबसे पहले अपना ही जूताघर हटाकर दुकानदारों को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब चबूतरे से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा सकती है।
15 दिसंबर की बैठक में होगा अंतिम निर्णय
समिति द्वारा दुकानों को हटाने का अंतिम निर्णय आगामी 15 दिसंबर को होने वाली बैठक में लिया जाएगा। हालांकि औपचारिक निर्णय अभी बाकी है, लेकिन जूताघर हटने के बाद से चबूतरे पर बनी अन्य दुकानों के मालिकों में दहशत और बेचैनी का माहौल है। इसके बावजूद कई दुकानदारों को भरोसा है कि समिति उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर पाएगी।
सेवायत सदस्य की गद्दी पर सबसे अधिक अतिक्रमण
मंदिर के प्रवेशद्वार संख्या दो की चौखंडी पर बनी एक गद्दी पूरे विवाद का केंद्र बनी हुई है। यह गद्दी मंदिर उच्चाधिकार प्रबंधन समिति के सेवायत सदस्य श्रीवर्धन गोस्वामी की है, जिसका अतिक्रमण अन्य दुकानों की तुलना में सबसे अधिक बताया जा रहा है। समिति के सेवायत सदस्य दिनेश गोस्वामी के अनुसार इस गद्दी का अतिक्रमण पास की दुकान से लगभग दोगुना हो चुका है।
दिनेश गोस्वामी ने जानकारी दी कि 1960 के दशक में प्रबंध कमेटी के सदस्य कृष्णचंद्र गोस्वामी ने यह चौखंडी जयगोपाल गोस्वामी को इत्र की दुकान के लिए आवंटित की थी। बाद में यह दुकान वसीयत के माध्यम से उनके तीन पुत्रों सुमन गोस्वामी, बालकृष्ण गोस्वामी और बबलू गोस्वामी को मिली।
इत्र की दुकान से गद्दी तक का विवादित सफर
90 के दशक में, जब प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष पद पर आनंद गोस्वामी आए, तो उन्होंने इत्र की इस दुकान को कब्जामुक्त कराकर उसे अपने लिए गद्दी के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया। इसके बाद आनंद बिहारी गोस्वामी और जुगलकिशोर गोस्वामी ने भी इसे अपनी गद्दी के रूप में इस्तेमाल किया। वर्तमान में इस गद्दी का उपयोग समिति के सेवायत सदस्य श्रीवर्धन गोस्वामी कर रहे हैं और इसे ही चबूतरे पर सबसे बड़ा अतिक्रमण माना जा रहा है।
दूसरी दुकानों का इतिहास और कम किराया
प्रवेशद्वार की दूसरी चौखंडी पर स्थित दुकान रूपकिशोर गोस्वामी के नाम मात्र तीन रुपये किराए पर आवंटित की गई थी। यह भी चबूतरे पर लंबे समय से चल रही है। इसके बराबर वाली दुकान छबीलेवल्लभ गोस्वामी को किराए पर दी गई, जिसका उपयोग कभी यात्री विश्रामालय के रूप में किया गया, लेकिन बाद में वहां दुकान संचालित होने लगी।
इसी के समीप गेट संख्या तीन की ओर जाने वाले रास्ते पर खोखे के रूप में एक और दुकान बनी, जिसे 80 के दशक में मंदिर प्रबंधन ने स्थापित कराया था। पहले यह दुकान गोपीवल्लभ गोस्वामी उर्फ गुपिया गोस्वामी और बाद में किशन बिहारी गोस्वामी द्वारा चलाई गई। वर्तमान में इस खोखे का संचालन उनके बेटे पंकज कर रहे हैं।
सभी अतिक्रमण सेवायतों के, समिति के लिए बड़ी चुनौती
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि चबूतरे पर लगभग पूरा अतिक्रमण मंदिर के सेवायतों की दुकानों और गद्दियों का है, जो दशकों से बहुत कम किराए पर चल रही हैं। ऐसे में इन्हें हटाना मंदिर उच्चाधिकार प्रबंधन समिति के लिए एक बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक चुनौती बन गया है।
स्थिति को और जटिल इस बात ने बनाया है कि समिति अब तक गोस्वामी समाज से न तो दर्शन के समय में वृद्धि करा पाई है और न ही मंदिर में सेवायतों तथा सेवादारों की संख्या तय करवा पाई है। ऐसे में सेवायतों से जुड़े अतिक्रमण को हटाने का कदम समिति के लिए कठिन और संवेदनशील साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: निर्णय पर टिकी निगाहें
15 दिसंबर को होने वाली बैठक में यह तय होगा कि बांके बिहारी मंदिर के चबूतरे से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया किस प्रकार आगे बढ़ेगी और क्या सेवायतों की गद्दियों और दुकानों पर भी समान रूप से कार्रवाई हो पाएगी। स्थानीय स्तर पर श्रद्धालुओं और दुकानदारों की निगाहें अब समिति के आगामी निर्णय पर टिकी हुई हैं।
Amit Pateria