जातिगत जनगणना पर चंद्रशेखर आजाद का हमला, एसआईआर, ओबीसी सम्मान और अल्पसंख्यक अधिकार मुद्दा

· 1 min read
जातिगत जनगणना पर चंद्रशेखर आजाद का हमला, एसआईआर, ओबीसी सम्मान और अल्पसंख्यक अधिकार मुद्दा

भोपाल में चंद्रशेखर आजाद का सरकार पर हमला, जातिगत जनगणना से लेकर अल्पसंख्यक अधिकार तक सवाल

नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने भोपाल के सिंधु भवन में आयोजित आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं की बैठक में सरकारों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सत्ता, संविधान और अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लंबा भाषण दिया और समाज के संगठित न होने को कई समस्याओं की जड़ बताया।

जातिगत जनगणना और एसआईआर पर सवाल

चंद्रशेखर आजाद ने जातिगत जनगणना के मुद्दे पर सरकार को खुली चुनौती दी। उन्होंने कहा कि यदि जातिगत जनगणना कराई जाए तो एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक की आबादी लगभग 90 प्रतिशत निकल सकती है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब चुनाव आयोग एक महीने में सौ करोड़ लोगों की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) कर सकता है तो 11–12 साल में जातिगत जनगणना क्यों नहीं हो पा रही। उनके अनुसार कभी बजट और कभी समय की कमी जैसे तर्क केवल इसे टालने के तरीके हैं।

इतिहास, मंडल आयोग और पिछड़े वर्गों की स्थिति

आजाद ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि 1931 की जातिगत जनगणना में मध्यप्रदेश में पिछड़ा वर्ग 52 प्रतिशत दर्ज था। उन्होंने आरोप लगाया कि काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने दरकिनार कर दिया और डस्टबिन में डाल दिया। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के समय, उनके मुताबिक, भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। उन्होंने कहा कि आज भी मंडल आयोग की 38 सिफारिशें लंबित हैं, जिन्हें लागू करने पर पिछड़े वर्गों को बड़ा लाभ मिल सकता है।

पिछड़े मुख्यमंत्री और सम्मान का सवाल

चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि सरकारें पिछड़ा विरोधी हैं। उनके अनुसार संख्या के दबाव में तो पिछड़ा वर्ग से मुख्यमंत्री बना दिया जाता है लेकिन उन्हें सम्मान नहीं दिया जाता। उन्होंने उदाहरण के रूप में कहा कि शिवराज सिंह चौहान के समय एक संगठन विशेष द्वारा उन्हें गालियां दी गईं। वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनसे वैचारिक मतभेद अलग बात है, लेकिन 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की बात करते ही उन्हें हटाने की कोशिशों और जातिगत गालियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि पिछड़े वर्ग का असली सम्मान किस पार्टी में है, यह स्पष्ट हो जाता है।

कांशीराम आंदोलन और कमजोर वर्गों की एकजुटता

अपने संबोधन में आजाद ने कांशीराम के नेतृत्व में चले पिछड़ा आंदोलन की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि उस समय मध्यप्रदेश से तीन निर्दलीय सांसद चुने गए थे, जिनमें सुखलाल कुशवाह, बुद्धसेन पटेल और भीमसेन पटेल शामिल थे। उनके अनुसार जब कमजोर वर्ग एकजुट होता है, तभी वास्तविक राजनीतिक बदलाव संभव होता है।

एसआईआर के जरिए वोट कटने का आरोप

चंद्रशेखर आजाद ने आरोप लगाया कि एसआईआर के नाम पर 2.98 करोड़ वोट काट दिए गए। तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संख्या ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी, जो लगभग 2 करोड़ 80 लाख से कम है, से अधिक है। उनके अनुसार इतने वोट केवल उत्तर प्रदेश में काटे गए, जबकि एक से डेढ़ साल पहले इन्हीं मतदाता सूची पर चुनाव कराए गए थे। उन्होंने इसे कमजोर वर्गों के वोट योजनाबद्ध तरीके से छीने जाने की कोशिश बताया।

आरक्षण, ईडब्ल्यूएस और संविधान

आजाद के अनुसार बाबा साहब अंबेडकर द्वारा दिए गए आरक्षण का विरोध वही लोग कर रहे हैं, जो पिछले 5–6 साल से ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने इसे संविधान और सामाजिक न्याय के साथ पाखंड बताया। उनके मुताबिक यह रवैया व्यवस्था की न्यायप्रियता पर सवाल खड़ा करता है।

आदिवासी आईएएस और व्यवस्था पर सवाल

उन्होंने एक आदिवासी आईएएस अधिकारी का नाम लिए बिना कहा कि जब उसकी आवाज और सच्चाई को अनसुना किया जा रहा है, तो आम गरीब नागरिक की बात कौन सुनेगा। उन्होंने इसे देश की मौजूदा स्थिति और व्यवस्था की दिशा को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत बताया।

भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी को विकल्प बताना

चंद्रशेखर आजाद ने दावा किया कि मौजूदा हालात में देश का वंचित समाज, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक शामिल हैं, अब भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी की ओर उम्मीद से देख रहा है। उनके अनुसार जब सभी दरवाजे बंद हो जाते हैं, तब लोग एक मजबूत विकल्प की तलाश करते हैं और उनकी पार्टी खुद को ऐसे विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

ईसाई समाज पर हमले और धार्मिक स्वतंत्रता

अपने भाषण में आजाद ने ईसाई समाज के साथ होने वाली घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि क्रिसमस जैसे त्योहार के दौरान कहीं ईसाइयों को डंडों से पीटा जा रहा है, कहीं धार्मिक टोपी पहनने पर भगाया जा रहा है और कहीं चर्चों में घुसकर मारपीट की जा रही है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए कहा कि ईसाई समाज आज अपनी पीड़ा किससे कहे, यह सवाल उठा रहा है, और यह समाज भी उनकी पार्टी की ओर सुरक्षा की उम्मीद से देख रहा है।

मुस्लिम समाज के खिलाफ नफरत और डर का माहौल

चंद्रशेखर आजाद ने आरोप लगाया कि मुस्लिम समाज के खिलाफ खुलेआम नफरत फैलाई जा रही है। उनके अनुसार तलवारें बांटी जा रही हैं, लोगों को उकसाया जा रहा है और “काट दो” जैसे नारे लगवाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा डर का माहौल बना दिया गया है कि कोई बोलना नहीं चाहता, जबकि कई नेता और सत्ता में बैठे अच्छे लोग भी आंख-कान बंद किए बैठे हैं।

कानून की समानता पर सवाल और अन्याय के उदाहरण

आजाद ने सवाल उठाया कि यदि कोई आम व्यक्ति तलवार बांटे तो उसी दिन उस पर मुकदमा दर्ज हो जाएगा और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे प्रावधान लगाए जा सकते हैं, जबकि जो लोग खुलेआम तलवारें बांट रहे हैं, वे टीवी चैनलों पर इंटरव्यू दे रहे हैं। उन्होंने पूछा कि यह अन्याय किसकी शह पर हो रहा है और इसकी ताकत कौन बढ़ा रहा है, इस पर देश को विचार करना चाहिए।

संविधान का मजाक और बाबा को गार्ड ऑफ ऑनर

उन्होंने कहा कि संविधान का खुलेआम मजाक उड़ाया जा रहा है। एक बाबा को गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने इस पर सवाल उठाया, तब जाकर जांच शुरू हुई। उनके अनुसार यदि अन्याय पर आवाज न उठाई जाए तो उसे ही सामान्य बना दिया जाता है और समाज धीरे-धीरे उसे स्वीकार कर लेता है।

समाज की ताकत और गुलाम मानसिकता पर टिप्पणी

अपने संबोधन के अंत में चंद्रशेखर आजाद ने समाज की मानसिकता पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुर्सी की अहमियत वही समझता है, जो अपनी ताकत को पहचानता है। उनके अनुसार गुलाम मानसिकता वाला समाज सिर्फ खड़े रहने में ही गौरव महसूस करता है, जबकि स्वाभिमानी समाज सत्ता की कुर्सी पर बैठने का हक समझता है। उन्होंने कहा कि संविधान ने एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए व्यवस्था की है, लेकिन जो चीज मुफ्त में मिल जाती है, उसकी कद्र अक्सर नहीं की जाती।

इस तरह भोपाल की इस बैठक में चंद्रशेखर आजाद ने जातिगत जनगणना, आरक्षण, अल्पसंख्यक अधिकार, कानून के समान अनुप्रयोग और संविधानिक मूल्यों पर व्यापक सवाल उठाते हुए समाज से अपनी ताकत पहचानने और संगठित होने की अपील की।

L. N. Bhargava