सामाजिक सद्भाव बैठक में RSS, शिव तुलना और हिंदुत्व पर जोर
कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सामाजिक सद्भाव बैठक आयोजित की गई। कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा और मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय मंच पर उपस्थित रहे। मध्यभारत प्रांत के 16 जिलों से समाज के विभिन्न वर्गों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस बैठक में भाग लिया। बैठक दो सत्रों में हुई और प्रथम सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन तथा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण से हुई।
प्रदीप मिश्रा ने RSS की तुलना भगवान शिव से की
पहले सत्र में अपने आशीर्वचन के दौरान पंडित प्रदीप मिश्रा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना भगवान शिव से करते हुए कहा कि शिव भी विष पीते हैं और राष्ट्र की रक्षा करते हैं, उसी तरह संघ भी आरोपों का विष पीकर राष्ट्र रक्षा के काम में लगा है। उन्होंने कहा कि संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता है, जैसे शिव ने समस्त सृष्टि के लिए विष पिया, वैसे ही संघ प्रतिदिन आरोपों का विष सहते हुए संयम और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देता है।
उन्होंने समाज से राष्ट्र तक के भाव को रेखांकित करते हुए पूछा कि अलग-अलग समाज अपने स्तर पर कार्य तो कर रहे हैं, पर राष्ट्र के लिए क्या किया और क्या दिया, यह भी सोचना आवश्यक है। प्रदीप मिश्रा ने कहा कि जन्म चाहे किसी भी जाति में हो, अंतिम पहचान हिंदू, सनातनी और भारतीय की ही रहती है।
धर्मांतरण और ग्रीन महाशिवरात्रि पर विचार
पंडित मिश्रा ने धर्मांतरण को केवल वर्तमान पीढ़ी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला गंभीर षड्यंत्र बताया और समाज से इसके प्रति सजग रहने की अपील की। उन्होंने ‘ग्रीन महाशिवरात्रि’ जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि घर-घर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा सामाजिक समरसता का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने बताया कि सामाजिक सद्भाव बैठक का मूल उद्देश्य यही है कि व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ अपने पड़ोसी और पूरे समाज को साथ लेकर आगे बढ़े। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे लंगर में किसी की जाति नहीं पूछी जाती, उसी प्रकार राष्ट्र निर्माण के लिए सभी को मिलकर और एकजुट होकर कार्य करना चाहिए।
मोहन भागवत का सामाजिक सद्भाव और हिंदू समाज पर वक्तव्य
बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि हमारे समाज का स्वभाव रहा है। उन्होंने कहा कि समाज शब्द का अर्थ ही समान गंतव्य की ओर बढ़ने वाला समूह है और भारतीय समाज की कल्पना हमेशा ऐसी रही है जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों स्तरों पर सुखी हो।
भागवत ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने समझा कि अस्तित्व एक ही है, केवल देखने की दृष्टि अलग-अलग है। उनकी तपस्या और साधना से ही राष्ट्र का निर्माण हुआ और वही हमारी सांस्कृतिक नींव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून समाज को नियंत्रित तो कर सकता है, लेकिन समाज को चलाने और जोड़कर रखने का काम सद्भावना ही करती है।
हिंदू स्वभाव, एकता और डीएनए पर जोर
मोहन भागवत ने कहा कि विविधता के बावजूद एकता ही हमारी पहचान है। बाहरी रूप से हम अलग दिख सकते हैं, लेकिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के स्तर पर हम सभी एक हैं। इसी विविधता में एकता को स्वीकार करने वाला समाज ही हिंदू समाज है।
उन्होंने कहा कि हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक स्वभाव है, जो मत, पूजा पद्धति या जीवनशैली के आधार पर झगड़ा नहीं करता। उनके अनुसार समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को यह कहकर अलग करने की कोशिश की गई कि वे भिन्न हैं, जबकि हजारों वर्षों से अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक बताया गया।
भागवत ने यह भी कहा कि संकट के समय ही नहीं, हर समय सद्भावना बनाए रखना आवश्यक है। मिलना, संवाद करना और एक-दूसरे के कार्यों को जानना ही सद्भावना की पहली शर्त है और समर्थ को हमेशा दुर्बल की सहायता करनी चाहिए।
एक समाज, एक राष्ट्र की दिशा में संकल्प
सामाजिक सद्भाव बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि समाज अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं आगे आएगा और सरकार की प्रतीक्षा किए बिना सामूहिक प्रयास करेगा। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह बैठक किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज की है। उद्देश्य यह रखा गया कि पूरा समाज मिलकर समाज को बलशाली बनाए और एक समाज, एक राष्ट्र के रूप में दृढ़ता से खड़ा रहे।
Sharad Shrivastava