भोपाल.. मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की नई कार्यकारिणी में सबसे ज्यादा चर्चा पदाधिकारियों या कार्यसमिति सदस्यों की नहीं, बल्कि स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची को लेकर हो रही है..राजनीतिक गलियारों में एक नया सवाल तेजी से उभर रहा है.. क्या भाजपा ने स्थायी आमंत्रित सदस्यों के रूप में अपना एक प्रकार का अघोषित "मार्गदर्शक मंडल" तैयार कर दिया है.. और यदि ऐसा है तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि इस सूची में शामिल अधिकांश नेताओं की सक्रिय चुनावी राजनीति की भूमिका अब सीमित होने जा रही है.. ..यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस सूची में ऐसे अनेक नाम शामिल हैं जो कभी भाजपा की राजनीति के केंद्र में हुआ करते थे.. कुछ मंत्री रहे.. कुछ सांसद रहे.. कुछ प्रदेश अध्यक्ष रहे.. कोई विधानसभा अध्यक्ष रहे.. और कुछ ऐसे नेता रहे जिन्होंने संगठन को खड़ा करने में दशकों लगाए.. ..गोपाल भार्गव.. जयंत मलैया.. अजय विश्नोई.. अनूप मिश्रा.. बिसाहूलाल सिंह.. गिरीश गौतम.. सीताशरण शर्मा.. यशोधरा राजे सिंधिया.. नागेन्द्र सिंह.. ढाल सिंह बिसेन जैसे नाम केवल नेता नहीं, बल्कि भाजपा के अलग-अलग दौरों के राजनीतिक प्रतीक रहे हैं.. ..यही कारण है कि जब ऐसे नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य की श्रेणी में रखा जाता है तो राजनीतिक विश्लेषण केवल संगठनात्मक नहीं रह जाता, बल्कि भविष्य की चुनावी राजनीति से भी जुड़ जाता है.. ..दरअसल भाजपा में पिछले एक दशक से एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है.. पार्टी नेतृत्व परिवर्तन को अचानक नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से लागू करता है.. पहले संगठन में नई भूमिका दी जाती है.. फिर चुनावी जिम्मेदारियां सीमित होती हैं.. और अंततः नेतृत्व नई पीढ़ी को हस्तांतरित होता है.. ..राष्ट्रीय स्तर पर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बाद जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, उसकी झलक अब राज्यों में भी दिखाई देती है.. ..मध्य प्रदेश भाजपा में भी पिछले कुछ वर्षों में यही प्रवृत्ति देखी गई है.. अनेक वरिष्ठ नेताओं को टिकट नहीं मिला.. कुछ विधानसभा का चुनाव जीते लेकिन पूर्व मंत्री रहते हुए भी उन्हें इस बार मंत्री नहीं बनाया गया.. कुछ को चुनावी राजनीति से अलग भूमिका दी गई.. कुछ को संगठनात्मक मंचों पर सम्मानजनक स्थान दिया गया....ऐसे में स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची को केवल सम्मान सूची मान लेना शायद पर्याप्त नहीं होगा...सवाल यह है कि यदि गोपाल भार्गव, जयंत मलैया, अजय विश्नोई, अनूप मिश्रा, बिसाहूलाल सिंह या अन्य वरिष्ठ नेताओं को संगठन के भीतर एक विशेष श्रेणी में रखा जा रहा है तो क्या भाजपा उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कोई संकेत भी दे रही है.. जो फिर मंत्री बनने की आस लगाए हुए हैं क्या उन्हें संकेत दे दिया गया है कि अब आपकी पारी समाप्त चुनाव नहीं लड़ेंगे.... क्यों कि राजनीति में संकेत अक्सर शब्दों से नहीं, संरचनाओं से दिए जाते हैं....स्थायी आमंत्रित सदस्य की अवधारणा भी कुछ वैसा ही संकेत देती दिखाई देती है....विशेष रूप से तब, जब सूची में शामिल अनेक नेता ऐसे हैं जिनकी उम्र, अनुभव और राजनीतिक यात्रा उन्हें संगठन के मार्गदर्शक की भूमिका के अधिक निकट ले जाती है, बजाय प्रत्यक्ष चुनावी दावेदारी के....हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है...भाजपा ने कहीं भी यह नहीं कहा है कि स्थायी आमंत्रित सदस्य चुनाव नहीं लड़ेंगे.. लेकिन पुरानी सूची बहुत कुछ बताती थी .. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वर्तमान मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्री इन सभी को इस सूची में रखा जाता रहा अब मुख्यमंत्री समेत कई वरिष्ठ नेताओं को कार्यकारिणी में सदस्य बना दिया गया है.. भाजपा ने इस बार पार्टी संविधान के प्रावधान के तहत कार्यकारिणी के गठन का दावा किया है.. सवाल जो काम नरेंद्र सिंह तोमर नंदकुमार सिंह चौहान प्रभात झा राकेश सिंह विष्णु शर्मा नहीं कर पाए वह काम हेमंत खंडेलवाल ने पार्टी संविधान के तहत कर दिखाया है.. या फिर इसके पीछे मोहन और हेमंत की कोई रणनीति नजर आती है.. ..अंतिम निर्णय हमेशा केंद्रीय नेतृत्व और चुनाव समिति के स्तर पर ही होता है....लेकिन राजनीति में प्रतीकों का महत्व कम नहीं होता....यदि किसी नेता को संगठन में सलाहकार, संरक्षक या मार्गदर्शक जैसी भूमिका में देखा जाने लगे तो स्वाभाविक रूप से उसके चुनावी भविष्य को लेकर भी अटकलें शुरू हो जाती हैं.. ..यही कारण है कि इस सूची को लेकर भाजपा के भीतर भी अलग-अलग तरह की व्याख्याएं सामने आ रही हैं...एक वर्ग का मानना है कि यह वरिष्ठ नेताओं के सम्मान का मंच है.. भाजपा उन लोगों को विस्मृत नहीं करना चाहती जिन्होंने दशकों तक संगठन के लिए काम किया.. ..दूसरा वर्ग इसे पीढ़ी परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा मान रहा है.. ..उसके अनुसार पार्टी धीरे-धीरे चुनावी नेतृत्व और संगठनात्मक मार्गदर्शन को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर रही है.. ..यदि यह आकलन सही है तो आने वाले विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण के समय इसके राजनीतिक संकेत और स्पष्ट हो सकते हैं....सबसे रोचक उदाहरण गोपाल भार्गव का है...वे भाजपा के सबसे वरिष्ठ विधायकों में शामिल हैं.. संगठन और सरकार दोनों में उनकी मजबूत पहचान रही है...लेकिन यदि उन्हें स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में विशेष स्थान दिया जा रहा है तो क्या भाजपा उन्हें भविष्य के मार्गदर्शक नेतृत्व के रूप में स्थापित कर रही है....इसी तरह जयंत मलैया, अजय विश्नोई, अनूप मिश्रा और बिसाहूलाल सिंह जैसे नामों को लेकर भी राजनीतिक चर्चा स्वाभाविक है....कांग्रेस से भाजपा में आए बिसाहूलाल सिंह का मामला तो और दिलचस्प है.. वे सिंधिया समर्थक राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरों में रहे हैं.. यदि उन्हें भी इस श्रेणी में रखा गया है तो इसका अर्थ केवल सम्मान नहीं, बल्कि भूमिका परिवर्तन का संकेत भी माना जा सकता है.. ..हेमंत खंडेलवाल की राजनीतिक शैली को देखें तो अब तक उन्होंने टकराव की बजाय समन्वय का रास्ता चुना है....पदाधिकारी चयन हो.. मोर्चों का गठन हो.. प्रकोष्ठों की नियुक्ति हो या अबकार्यकारिणी का गठन.. हर जगह उन्होंने विभिन्न धाराओं को साथ रखने की कोशिश की है.. ..ऐसे में स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची को भी उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है....यानी वरिष्ठ नेताओं को सम्मान.. नई पीढ़ी को अवसर.. और संगठन को स्थिरता...लेकिन राजनीति में हर सम्मान अपने साथ एक संदेश भी लेकर आता है...यही कारण है कि यह सूची भाजपा के भीतर एक नए विमर्श को जन्म दे रही है....क्या यह केवल सम्मानित वरिष्ठों की सूची है....क्या यह भाजपा का अघोषित मार्गदर्शक मंडल है....या फिर यह 2028 से पहले पीढ़ी परिवर्तन की शुरुआती पटकथा है....फिलहाल इसका अंतिम उत्तर किसी के पास नहीं है...लेकिन इतना जरूर है कि हेमंत खंडेलवाल ने स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची के माध्यम से भाजपा के भीतर एक नई राजनीतिक बहस शुरू कर दी है....और यदि आने वाले समय में इन नेताओं की भूमिका सक्रिय चुनावी राजनीति से अधिक संगठनात्मक मार्गदर्शन की दिखाई देती है, तो इतिहास शायद इस सूची को केवल स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश भाजपा के "संक्रमणकालीन मार्गदर्शक मंडल" के रूप में याद करे...फिलहाल सवाल कायम है.. ..क्या यह सम्मान है....क्या यह संकेत है...या फिर भाजपा की अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बनाने की शांत लेकिन सुनियोजित राजनीतिक प्रक्रिया...आने वाला समय ही इसका उत्तर देगा..। बॉक्स : ( कप्तान सिंह की वापसी.. अनुभव का सम्मान या पीढ़ी परिवर्तन पर ब्रेक?) ..हेमंत खंडेलवाल की नई कार्यकारिणी में यदि किसी एक नाम ने राजनीतिक विश्लेषकों का विशेष ध्यान खींचा है तो वह हैं पूर्व राज्यपाल और भाजपा के वरिष्ठ संगठन शिल्पी कप्तान सिंह सोलंकी.. कप्तान सिंह की संगठन महामंत्री के तौर पर एंट्री मध्य प्रदेश में उस वक्त हुई थी जब उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा ने चुनाव लड़कर सरकार बनाई थी, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को इस कार्यकारिणी में कोई जगह एक बार फिर नहीं मिली.... प्रदेश अध्यक्ष हेमंत और उनकी टीम का मार्गदर्शन करने के लिए कप्तान सिंह की वापसी जरूर हो गई.. खंडेलवाल ने समन्वय की सियासत की लाइन को आगे बढ़ाते हुए एक अलग अंदाज में अपनी कोर टीम बनाकर संगठन को आगे बढ़ाया है.. कई पुराने चेहरों की चमक गायब कर संगठन में नए चेहरों की चमक के साथ खंडेलवाल की नई टीम में कप्तान की धमाकेदार एंट्री गौर करने लायक है.. प्रोफेसर कप्तान सिंह केवल एक पूर्व सांसद, पूर्व राज्यसभा सदस्य या पूर्व राज्यपाल भर नहीं रहे हैं.. भाजपा की संगठनात्मक राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने जनसंघ से भाजपा तक के विस्तार में सक्रिय भूमिका निभाई.. संगठन महामंत्री के रूप में उनकी पहचान केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे उन नेताओं में रहे जिन्होंने भाजपा की कैडर संस्कृति को मजबूत करने में योगदान दिया....यही कारण है कि सक्रिय संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद उनका प्रदेश कार्यकारिणी के स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में लौटना सामान्य राजनीतिक घटना नहीं माना जा रहा....इस वापसी के कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं....पहला संदेश अनुभव के सम्मान का है....हेमंत खंडेलवाल और उनके परिवार के कप्तान सिंह सोलंकी से पुराने आत्मीय संबंध रहे हैं.. राजनीतिक रूप से भी दोनों परिवारों के बीच निकटता किसी से छिपी नहीं है.. ऐसे में कार्यकारिणी में कप्तान सिंह की मौजूदगी व्यक्तिगत विश्वास और संगठनात्मक भरोसे दोनों का संकेत मानी जा रही है.. कप्तान सिंह के पुत्र संगठन में सक्रिय है और इंदौर में एक बड़ी जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं,..दूसरा संदेश पुरानी और नई पीढ़ी के बीच सेतु निर्माण का है...भाजपा इस समय मध्य प्रदेश में पीढ़ी परिवर्तन के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है.. शिवराज सिंह चौहान के लंबे राजनीतिक युग के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में नई सत्ता संरचना खड़ी हुई है.. संगठन में भी नई पीढ़ी के नेताओं को जिम्मेदारियां मिल रही हैं.. ऐसे समय में कप्तान सिंह जैसे नेताओं की मौजूदगी संगठनात्मक स्मृति और अनुभव का स्रोत बन सकती है.... यदि कप्तान के अनुभव का पार्टी उपयोग करती है तो इससे बेहतर कुछ नहीं.. लेकिन यदि शोभा की सुपारी बनाकर कप्तान को सम्मान की आड़ में संगठन में जोड़ा गया है तो यह जरूरी है या मजबूरी समझ से परे.. यह सच है कि कप्तान के समर्थकों की टीम इस वक्त सक्रिय है, तो कप्तान के मार्गदर्शन और शुभचिंतक भी मध्य प्रदेश में अपने वर्चस्व का संदेश समय-समय पर देते हैं..लेकिन यहीं से बहस का दूसरा पक्ष शुरू होता है...क्या भाजपा अभी भी पुरानी पीढ़ी के प्रभाव से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रही है....क्या हर परिवर्तन के दौर में पार्टी को फिर उन्हीं वरिष्ठ नेताओं के सहारे लौटना पड़ रहा है जिन्होंने पहले भी संगठन का नेतृत्व किया था...और सबसे महत्वपूर्ण सवाल.. क्या इससे अगली कतार के नेताओं की संभावनाएं सीमित नहीं होंगी.. ..दरअसल भाजपा में ऐसी पूरी एक पीढ़ी मौजूद है जो न तो संस्थापक पीढ़ी का हिस्सा है और न ही नई पीढ़ी का.. यह वह मध्यवर्ती नेतृत्व है जो पिछले 15-20 वर्षों से संगठन और सरकार में सक्रिय रहा है और अब बड़ी भूमिकाओं की प्रतीक्षा कर रहा है.. ..ऐसे नेताओं के समर्थकों का तर्क है कि यदि संगठन में मार्गदर्शक भूमिका के लिए भी बार-बार वही चेहरे सामने आएंगे तो अगली पंक्ति के नेतृत्व का विकास कैसे होगा...यही कारण है कि कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची को "सम्मान और अवसर" के बीच संतुलन की परीक्षा मान रहे हैं.. ..कप्तान सिंह की मौजूदगी जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह सवाल भी है कि उनके बाद की पीढ़ी को क्या भूमिका मिलेगी.. राजधानी और इससे दूर कई जिलों में अभी ऐसे चेहरे मौजूद है जो एडजस्ट नहीं किए गए.. ..यह बहस इसलिए भी तेज हुई है क्योंकि एक क्राइटेरिया के तहत मोर्चा प्रकोष्ठ को जोड़ने के बाद अभी विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची आना बाकी है.. ..भाजपा ने संकेत दिया है कि भविष्य में और नाम भी जोड़े जा सकते हैं.. ऐसे में अनेक नेता अभी प्रतीक्षा की स्थिति में हैं.. ..भोपाल सांसद आलोक शर्मा इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं.. बदलती भाजपा के इस दौर में आलोक की गिनती उन नेताओं में होती है जिन्हें संगठन की खासी समझ है.. वे पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके हैं, संगठन और सरकार दोनों में सक्रिय रहे हैं, वर्तमान में सांसद हैं, लेकिन नई कार्यकारिणी में उन्हें स्थान नहीं मिला.. राजधानी भोपाल से गए इस संदेश को क्या पार्टी की गुटबाजी से जोड़कर देखा जाएगा.. प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने जिनके नेतृत्व में संगठन में काम किया आज उनमें से कई चेहरे प्रभावी भूमिका में दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे....इसी तरह कई सांसद, पूर्व सांसद, पूर्व विधायक और संगठन के प्रभावशाली चेहरे भी सूची से बाहर हैं.. ..राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या इन नेताओं को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में समायोजित किया जाएगा.. ..यदि ऐसा होता है तो हेमंत खंडेलवाल की रणनीति और स्पष्ट होगी.. लेकिन यदि ऐसा नहीं होता तो असंतोष की संभावनाओं पर भी चर्चा बढ़ सकती है.. ..दरअसल भाजपा की चुनौती केवल कार्यकारिणी बनाना नहीं है.. चुनौती यह है कि अनुभव, महत्वाकांक्षा, पीढ़ी परिवर्तन और संगठनात्मक संतुलन को एक साथ साधा जाए.... भोपाल सांसद आलोक की संगठन से विदाई और कप्तान सिंह सोलंकी की वापसी इसी बड़े प्रयोग का प्रतीक बन गई है.. ..एक पक्ष इसे वक्त की जरूरत संगठनात्मक परिपक्वता कहता है.. दूसरा इसे पुरानी पीढ़ी के प्रभाव की निरंतरता मानता है.. ..लेकिन अंतिम निष्कर्ष शायद अभी नहीं निकाला जा सकता.. ..क्योंकि असली सवाल कप्तान सिंह की मौजूदगी नहीं, बल्कि उनके साथ-साथ अगली पीढ़ी को मिलने वाली भूमिका का है.. ..यदि भाजपा अनुभव और उत्तराधिकार दोनों को साथ लेकर चलने में सफल होती है तो यह मॉडल उसकी ताकत बन सकता है....लेकिन यदि सम्मान की राजनीति अवसर की राजनीति पर भारी पड़ गई तो यही मॉडल भविष्य में नए सवाल भी खड़े कर सकता है..। बॉक्स (हेमंत की पहली कार्यकारिणी : 2028 का संगठनात्मक प्री-लॉन्च मॉडल ..) ..वर्तमान कार्यकारिणी को अंतिम तस्वीर नहीं, बल्कि बड़े संगठनात्मक कैनवास का प्रारंभिक खाका माना जाना चाहिए.. ..दरअसल हेमंत खंडेलवाल के सामने चुनौती केवल संगठन चलाने की नहीं है.. उन्हें एक साथ कई स्तरों पर सफलता हासिल करनी होगी.. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के साथ तालमेल बनाए रखना होगा.. वरिष्ठ नेताओं का विश्वास बनाए रखना होगा.. नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को अवसर देना होगा.. और 2028 के चुनावी लक्ष्य के अनुरूप संगठन को सक्रिय रखना होगा.. ..यही कारण है कि उनकी पहली कार्यकारिणी को सामान्य सूची की तरह नहीं देखा जा रहा.. ..यह सूची बताती है कि भाजपा अभी भी अपने सबसे बड़े संगठनात्मक गुण.. यानी समन्वय.. संतुलन और सामूहिकता.. पर भरोसा कर रही है.. ..आने वाले महीनों में यदि यह टीम मैदान में सक्रिय दिखाई देती है.. यदि स्थायी आमंत्रित सदस्यों की भूमिका स्पष्ट होती है.. यदि सरकार और संगठन के बीच तालमेल और मजबूत होता है.. तो यह कार्यकारिणी केवल एक संगठनात्मक दस्तावेज नहीं रहेगी.. ..यह मध्य प्रदेश भाजपा के अगले राजनीतिक अध्याय की आधारशिला भी साबित हो सकती है.. ..फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि हेमंत खंडेलवाल ने अपनी पहली कार्यकारिणी के जरिए एक साथ कई संदेश दिए हैं.. कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी का.. वरिष्ठ नेताओं को सम्मान का.. सरकार को सहयोग का.. और विपक्ष को यह संकेत कि भाजपा अभी भी अपने संगठनात्मक ढांचे को ही अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती है..। ..दिलचस्प बात यह भी है कि हेमंत खंडेलवाल की कार्यकारिणी को केवल वर्तमान संदर्भ में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के बदलते परिदृश्य के संदर्भ में भी पढ़ा जाना चाहिए.. भाजपा इस समय उस दौर में है जहां 2014 और 2019 की पीढ़ी के साथ-साथ 2029 और उसके बाद की पीढ़ी को तैयार करने की प्रक्रिया भी चल रही है.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व लगातार संगठनात्मक पुनर्संरचना, नेतृत्व निर्माण और राजनीतिक विस्तार पर जोर दे रहे हैं.. ऐसे में मध्य प्रदेश की कार्यकारिणी को राष्ट्रीय सोच के एक प्रादेशिक संस्करण के रूप में भी देखा जा सकता है.. ..यही कारण है कि सूची में अनुभव और ऊर्जा का मिश्रण दिखाई देता है.. एक तरफ ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने जनसंघ, भाजपा और संगठन के कठिन दौर देखे हैं.. दूसरी तरफ ऐसे नेता हैं जिन्हें अगले एक दशक की राजनीति का संभावित चेहरा माना जा रहा है.. भाजपा शायद यह संदेश देना चाहती है कि नेतृत्व परिवर्तन का अर्थ नेतृत्व विस्थापन नहीं होता.. ..राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह कार्यकारिणी भाजपा के भीतर एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक संतुलन भी स्थापित करती दिखाई देती है.. विधानसभा चुनाव के बाद सरकार का गठन हुआ.. मुख्यमंत्री बदले.. सत्ता का केंद्र बदला.. कई नेताओं की भूमिका बदली.. कुछ नेता दिल्ली की राजनीति में अधिक सक्रिय हुए.. कुछ प्रदेश में नई संभावनाएं तलाश रहे हैं.. ऐसे समय में संगठन की जिम्मेदारी केवल कार्यक्रम चलाने की नहीं होती, बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान को संभालने की भी होती है.. ..हेमंत खंडेलवाल की सूची में यह प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई भी बड़ा वर्ग स्वयं को पूरी तरह उपेक्षित महसूस न करे.. यही कारण है कि कार्यकारिणी को देखने वाले कई वरिष्ठ नेता इसे संतुलन और समन्वय की सूची भी बता रहे हैं.. ..यदि भाजपा की आंतरिक राजनीति को समझें तो यह सूची एक और संकेत देती है.. पार्टी अब व्यक्तियों की बजाय संस्थागत व्यवस्था पर अधिक जोर देती दिखाई दे रही है.. पहले कई बार बड़े नेताओं की उपस्थिति व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर दिखाई देती थी.. अब उन्हें पार्टी संविधान और संगठनात्मक संरचना के भीतर परिभाषित भूमिका देने का प्रयास हो रहा है.. ..यानी भाजपा धीरे-धीरे व्यक्ति आधारित प्रभाव को संस्था आधारित प्रभाव में बदलने की दिशा में बढ़ती दिखाई देती है.. ..स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है.. यह केवल सम्मान का मंच नहीं हो सकता.. क्योंकि भाजपा जैसी कैडर आधारित पार्टी बिना किसी उद्देश्य के इतनी बड़ी श्रेणी नहीं बनाती.. आने वाले समय में यदि इन वरिष्ठ नेताओं को प्रशिक्षण, वैचारिक संवाद, संगठनात्मक विस्तार, चुनावी मार्गदर्शन और सामाजिक समन्वय जैसी जिम्मेदारियां मिलती हैं तो यह प्रयोग अन्य राज्यों के लिए भी मॉडल बन सकता है.. ..एक और महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन का है.. भाजपा का विस्तार अब केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं है.. उसे शहरी, ग्रामीण, युवा, महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और नए सामाजिक समूहों तक लगातार पहुंच बनाए रखनी है.. कार्यकारिणी में विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों की मौजूदगी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है.. ..राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब चुनाव को केवल चुनाव नहीं मानती.. वह चुनाव को पांच वर्ष चलने वाली सतत प्रक्रिया के रूप में देखती है.. इसी कारण कार्यकारिणी का गठन भी चुनाव घोषणा से तीन महीने पहले नहीं, बल्कि चुनाव से वर्षों पहले किया जाता है.. ताकि संगठन को पर्याप्त समय मिल सके.. ..2028 के विधानसभा चुनाव को देखें तो भाजपा के सामने चुनौती केवल सत्ता विरोधी रुझान नहीं होगी.. उसे नए मतदाताओं को जोड़ना होगा.. पहली बार वोट देने वाली पीढ़ी तक पहुंचना होगा.. डिजिटल राजनीति के बदलते स्वरूप को समझना होगा.. और सरकार की उपलब्धियों को बूथ स्तर तक पहुंचाना होगा.. ..ऐसे में यह कार्यकारिणी यदि सक्रिय रहती है तो संगठन और सरकार के बीच संवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है.. ..यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाजपा ने अभी विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची घोषित नहीं की है.. राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यदि भविष्य में यह सूची आती है तो संगठनात्मक समीकरणों की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है.. कई ऐसे चेहरे जो अभी प्रतीक्षा में हैं, उन्हें भी भूमिका मिल सकती है.. बॉक्स (स्थाई आमंत्रित सदस्य से बने कार्यसमिति सदस्य) प्रदेश अध्यक्ष रहते वीडी शर्मा की कार्यसमिति में स्थाई आमंत्रित सदस्यों की संख्या 22 थी जबकि प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की नई कार्यसमिति में स्थायी आमंत्रित सदस्य 41 हैं..पुरानी सूची में जो कई बड़े नाम स्थाई आमंत्रित सदस्य थे उन्हें कार्यसमिति सदस्य बनाया गया है..इनमें पूर्व सीएम और वर्तमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान,मप्र के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय,केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया,सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते,मप्र के मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल,मप्र सरकार में मंत्री राकेश सिंह,डॉ नरोत्तम मिश्रा,लालसिंह आर्य,ओमप्रकाश ध्रुर्वे के नाम शामिल हैं..जिन्हें पिछली सूची में स्थाई आमंत्रित सदस्यों में शामिल किया गया था..लेकिन अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने सभी को कार्यसमिति में सदस्य नियुक्त किया है.. रिपीट हुए स्थाई आमंत्रित सदस्य सत्यनारायण जटिया पहले भी स्थायी आमंत्रित सदस्यों में शामिल थे और अभी भी हेमंत खंडेलवाल की सूची में भी उनका नाम स्थायी आमंत्रित सदस्यों में है..इसके अलावा जो पुरानी सूची में नाम थे और अभी नई सूची में भी स्थायी आमंत्रित सदस्य है..उनमें सुमित्रा महाजन,विक्रम वर्मा,कृष्णमुरारी मोघे,विधायक गोपाल भार्गव,माया सिंह,माखन सिंह शामिल हैं. इनके नाम नहीं नई सूची में पुरानी स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची में जो कुछ बड़े चेहरे शामिल थे..उनमें से कुछ के दायित्व परिवर्तन हुए तो कुछ के नाम शामिल नहीं हैं..इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का है..जो वर्तमान में मप्र विधानसभा के अध्यक्ष का दायित्व निभा रहे हैं..इसके अलावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा दिवंगत हो चुके हैं..मंदसौर से सांसद सुधीर गुप्ता और जयभान सिंह पवैया का नाम नई सूची में शामिल नहीं हैं..पूर्व केंद्रीय मंत्री एल मुरूगन का नाम नई स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची में नहीं है..इसी तरह..दरअसल उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया है..वे मप्र से राज्यसभा सदस्य थे.केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का नाम भी पुरानी सूची में शामिल था नई में नहीं है. 34 नए स्थाई आमंत्रित सदस्य जोड़े गए पुरानी सूची में से 7 नाम रिपीट किए गए..तो 34 नाम नए जोड़े गए..इनमें पूर्व मंत्री गौरी शंकर बिसेन,पूर्व मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार,पूर्व सांसद ढाल सिंह बिसेन,कैलाश चावला,पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी,पूर्व केंद्रीय मंत्री भागीरथ प्रसाद,डॉ. जितेन्द्र जामदार,पूर्व केंंद्रीय मंत्री कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए सुरेश पचौरी,बाबू सिंह रघुवंशी,पूर्व विस अध्यक्ष डॉ. सीताशरण शर्मा,वेदप्रकाश शर्मा,पूर्व विस अध्यक्ष गिरीश गौतम,तपन भौमिक,पूर्व मंत्री विधायक जयंत मलैया,पूर्व मंत्री और पूर्व राज्यपाल अनुसुईया उईके,दीपक सक्सेना,कैलाश सोनी,पूर्व सांसद विवेकनारायण शेजवलकर,रघुनंदन शर्मा,पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता,पूर्व मंत्री कुसुम मेहदेले,पूर्व मंत्री विधायक अजय विश्नोई,हिम्मत कोठारी,पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया,नानाभाऊ माहोड़,सुधा जैन,कृष्णकांता तोमर,अलका जैन,जगदीश अग्रवाल,पूर्व मंत्री विधायक बिसाहूलाल सिंह,विधायक नागेन्द्र सिंह,विधायक मधु वर्मा,पूर्व मंत्री ज्ञान सिंह और पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा के नाम शामिल हैं.
क्या हेमंत का अघोषित ‘मार्गदर्शक मंडल’ अब चुनाव नहीं लड़ेगा?(स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची ने भाजपा में खड़ा किया नया राजनीतिक सवाल, टिकट के दावेदारों का क्या होगा) राकेश अग्निहोत्री ( सवाल दर सवाल)