यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे... पीछे संतोष, आगे संकल्प... यही है मोहन मंत्र...(विशेष साक्षात्कार : महेंद्र विश्वकर्मा के साथ राकेश अग्निहोत्री)

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यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे... पीछे संतोष, आगे संकल्प... यही है मोहन मंत्र...(विशेष साक्षात्कार : महेंद्र विश्वकर्मा के साथ राकेश अग्निहोत्री)

यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे... पीछे संतोष, आगे संकल्प... यही है मोहन मंत्र... क्या यही है मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सफलता का मूल मंत्र... ढाई साल बाद भी उपलब्धियों से अधिक भविष्य के लक्ष्यों, चिंतन, संस्कृति, विकास और जनसेवा पर केंद्रित दृष्टि... इंट्रो "यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे"... भारतीय दर्शन का यह सूत्र बताता है कि व्यक्ति का चिंतन ही उसके कर्मों को दिशा देता है और वही आगे चलकर समाज और राष्ट्र के स्वरूप में दिखाई देता है... मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक और प्रशासनिक यात्रा को देखें तो यह भाव उनकी कार्यशैली में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है... राजनीति में अक्सर उपलब्धियों की चर्चा होती है... लेकिन कुछ नेता ऐसे भी होते हैं जो उपलब्धियों से अधिक संभावनाओं की बात करते हैं... डॉ. मोहन यादव उन्हीं नेताओं में से एक हैं... अपने कार्यकाल के ढाई वर्ष पूरे होने पर जब उनसे इस सफर का मूल्यांकन करने को कहा गया तो उनका जवाब था... "जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि बहुत कुछ किया है... लेकिन जब आगे देखता हूं तो लगता है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है..." यह केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं... बल्कि उनके नेतृत्व दर्शन का सार भी है... डॉ. मोहन यादव अक्सर कहते हैं... "जहां चाह है... वहां राह निकल ही आती है..." शायद यही कारण है कि उन्होंने शासन को केवल योजनाओं और फाइलों तक सीमित नहीं रखा... बल्कि उसे सामाजिक सरोकारों... सांस्कृतिक चेतना और जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया... अध्ययन उनका स्वभाव है... लेकिन केवल पढ़ना ही नहीं... चिंतन और मनन के आधार पर निर्णय लेना भी उनकी पहचान है... सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रशासनिक प्राथमिकताओं से जोड़ना हो... धार्मिक पर्यटन को रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना हो... तीर्थ दर्शन योजना... प्रस्तावित तीर्थ मेला प्राधिकरण... या धार्मिक लोकों के संरक्षण और प्रबंधन की दीर्घकालिक व्यवस्था... हर क्षेत्र में उनकी सोच केवल निर्माण तक सीमित नहीं... बल्कि उसके स्थायी संचालन... सामाजिक उपयोगिता और जनकल्याण तक जाती दिखाई देती है... ढाई वर्षों में उन्होंने यह भी साबित किया है कि राजनीति केवल सत्ता संचालन का माध्यम नहीं... बल्कि समाज को जोड़ने... सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करने... और नई संभावनाओं का वातावरण तैयार करने का भी माध्यम हो सकती है... शायद यही वजह है कि आज वे किसी के दिल में हैं... तो किसी के चिंतन का विषय भी... तो राजनीति की रोजमर्रा की बहसों से अलग... मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के व्यक्तित्व... चिंतन... सामाजिक सरोकार... अध्यात्म प्रेम... सनातन दृष्टि... सांस्कृतिक चेतना... विकास के विजन और भविष्य की योजनाओं पर एक विशेष संवाद... मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मन की बात... (विशेष साक्षात्कार : महेंद्र विश्वकर्मा एवं राकेश अग्निहोत्री) *डॉ. मोहन यादव : सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, उभरती विशिष्ट नई पहचान* (सवाल दर सवाल) ( राकेश अग्निहोत्री) मुस्कान से संदेश... संदेश से संवाद... संवाद से स्वीकार्यता... ढाई साल के कार्यकाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहचान केवल एक प्रशासक या राजनीतिक नेता तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने सत्ता के साथ संस्कृति... शासन के साथ गौरव... और विकास के साथ वैचारिक विमर्श को जोड़ने का प्रयास किया है। यही कारण है कि उनकी छवि पारंपरिक मुख्यमंत्रियों से अलग और अधिक व्यापक दिखाई देती है। संस्कृति से सरोकार... सरोकार से संवाद... संवाद से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद... डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली का यह सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बनकर उभरा है। महाकाल लोक से लेकर सिंहस्थ की तैयारियों तक... राजा विक्रमादित्य से लेकर भगवान श्रीकृष्ण की उज्जैन परंपरा तक... जनजातीय नायकों से लेकर सनातन संस्कृति के प्रतीकों तक... उन्होंने बार-बार मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को शासन के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास किया है। यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान को एक अलग आधार देता है। अध्ययन से आत्मविश्वास... आत्मविश्वास से नेतृत्व... नेतृत्व से नई पहचान... इतिहास... धर्म... पुराण... और भारतीय ज्ञान परंपरा पर उनकी पकड़ उन्हें केवल राजनीतिक वक्ता नहीं बल्कि वैचारिक अभिव्यक्ति वाले नेता के रूप में स्थापित करती है। वे विकास की चर्चा करते हैं तो उसके पीछे सांस्कृतिक संदर्भ भी रखते हैं... और संस्कृति की बात करते हैं तो उसे समाज और राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हैं। सहजता से सम्मान... सम्मान से संबंध... संबंध से विश्वास... यही वह शैली है जिसने उन्हें जनता... संगठन... प्रशासन और नेतृत्व के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में स्थापित किया है। मंच पर विनम्रता... निर्णय में दृढ़ता... और संवाद में स्पष्टता उनकी कार्यशैली की पहचान बन चुकी है। यही समन्वय उन्हें विशिष्ट बनाता है... यही विशिष्टता उन्हें अलग पहचान देती है... और यही पहचान ढाई साल बाद डॉ. मोहन यादव को केवल मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं... बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद... सामाजिक सरोकार... और विकास के समन्वित मॉडल के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। आज वे एक पद नहीं... एक प्रवृत्ति... एक प्रयोग और मध्य प्रदेश की राजनीति में उभरती हुई एक विशिष्ट पहचान बन चुके हैं। 🙏 बदले-बदले से डॉ. मोहन यादव : आत्मविश्वास, अध्ययन और समन्वय की नई राजनीतिक शैली मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जब दिसंबर 2023 में सत्ता के शीर्ष पद पर पहुंचे थे, तब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या वे लंबे समय तक अपनी अलग पहचान बना पाएंगे... ढाई साल बाद यह सवाल लगभग अप्रासंगिक हो चुका है... अब चर्चा इस बात की है कि आखिर डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली, व्यक्तित्व और राजनीतिक दृष्टिकोण उन्हें दूसरे मुख्यमंत्रियों से अलग कैसे बनाते हैं... ढाई साल के कार्यकाल ने डॉ. यादव को केवल प्रशासनिक अनुभव ही नहीं दिया, बल्कि उनके व्यक्तित्व के अनेक ऐसे पक्ष भी सामने लाए हैं, जो उन्हें एक पारंपरिक राजनेता की सीमाओं से बाहर खड़ा करते हैं... आज वे एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में दिखाई देते हैं, जिनकी राजनीति केवल सत्ता संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति, इतिहास, सामाजिक सरोकार, धार्मिक चेतना और वैचारिक प्रतिबद्धता से भी गहराई से जुड़ी हुई है... उनके करीब रहने वाले लोग कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनमें सबसे बड़ा बदलाव आत्मविश्वास का आया है... पहले जो बातें सीमित दायरे में होती थीं, अब वे सार्वजनिक मंचों पर उसी स्पष्टता और बेबाकी के साथ दिखाई देती हैं... उनका अंदाज सहज है, लेकिन संदेश बेहद स्पष्ट... मुस्कुराते हुए बात करना, माहौल को हल्का बनाना और फिर उसी बातचीत के बीच कोई गंभीर राजनीतिक या प्रशासनिक संदेश दे देना उनकी विशेषता बन गई है... डॉ. मोहन यादव का स्वभाव परिस्थितियों के अनुसार बदलता जरूर है, लेकिन उसमें कृत्रिमता दिखाई नहीं देती... मंच पर यदि कोई वरिष्ठ नेता मौजूद हो तो उनका पूरा व्यवहार सम्मान और मर्यादा से भरा होता है... उम्र और अनुभव का सम्मान करना उनकी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है... लेकिन जब बात मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी और अधिकार की आती है तो वही मोहन यादव अपने निर्णयों और विचारों को पूरी दृढ़ता से रखते हैं... यही कारण है कि कई बार सार्वजनिक मंचों पर उनका नरम और गरम दोनों रूप देखने को मिलता है... जहां जरूरत हो वहां विनम्रता... और जहां संदेश देना हो वहां कठोरता... प्रशासनिक बैठकों में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश देना हो या सार्वजनिक मंच से किसी मुद्दे पर सरकार की प्राथमिकता बतानी हो... उनका लहजा परिस्थितियों के अनुसार बदलता है लेकिन संदेश कभी अस्पष्ट नहीं होता... उनकी सबसे बड़ी ताकत शायद उनका अध्ययन है... मध्य प्रदेश की राजनीति में ऐसे नेताओं की संख्या बहुत अधिक नहीं है जो इतिहास, धर्म, संस्कृति और सामाजिक आंदोलनों पर इतनी विस्तार से बात कर सकें... डॉ. यादव किसी भी मंच पर जब बोलते हैं तो केवल राजनीतिक भाषण नहीं देते, बल्कि उसके साथ संदर्भ, प्रसंग और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी जोड़ देते हैं... चाहे राजा भोज की चर्चा हो... विक्रमादित्य का गौरव हो... भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा स्थली सांदीपनि आश्रम का उल्लेख हो या फिर किसी जनजातीय नायक का संघर्ष... उनके पास हर विषय का संदर्भ मौजूद रहता है... कई बार ऐसा लगता है कि वे केवल राजनीतिक नेता नहीं बल्कि इतिहास और संस्कृति के विद्यार्थी की तरह संवाद कर रहे हों... सनातन परंपरा... वेद... पुराण और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति उनकी रुचि केवल औपचारिक नहीं है... उनके भाषणों में बार-बार दिखाई देने वाले संदर्भ यह बताते हैं कि उन्होंने इन विषयों का गंभीर अध्ययन किया है... यही कारण है कि अवसर मिलते ही वे किसी भी विषय को वर्तमान से जोड़कर उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि समझाने लगते हैं... दरअसल यहीं से उनकी राजनीति का वह पक्ष भी सामने आता है जिसे भाजपा की वैचारिक भाषा में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है... महाकाल से लेकर महर्षि सांदीपनि तक... विक्रमादित्य से लेकर भगवान श्रीकृष्ण तक... जनजातीय नायकों से लेकर लोक परंपराओं तक... डॉ. मोहन यादव बार-बार यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि विकास केवल सड़कों, भवनों और परियोजनाओं का नाम नहीं है... बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों के साथ समाज को जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है... मुख्यमंत्री के रूप में उनकी एक और विशेषता संवाद क्षमता है... पत्रकारों के साथ उनकी बातचीत अक्सर औपचारिकता से आगे निकल जाती है... यदि विषय उनकी रुचि का हो तो वे केवल जवाब नहीं देते, बल्कि पूरा संदर्भ समझाते हैं... कई बार सवाल पूछने वाला व्यक्ति यह महसूस करता है कि वह उत्तर सुनने आया था, लेकिन उसे एक पूरा व्याख्यान मिल गया... दिलचस्प बात यह है कि कई बार सवाल का जवाब देने से पहले वे सामने वाले से ही जवाबी सवाल कर देते हैं... यह उनकी पुरानी शैली है... इससे वे बातचीत को एकतरफा नहीं रहने देते और सामने वाले को सोचने पर मजबूर कर देते हैं... यही कारण है कि उनके साथ बातचीत अक्सर रोचक और अप्रत्याशित हो जाती है... जनता के बीच उनकी छवि भी लगातार बदली है... शुरुआत में उन्हें संगठन से निकले नेता के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब वे एक जननेता की भूमिका में अधिक दिखाई देते हैं... प्रदेश के विभिन्न अंचलों के लगातार दौरे... स्थानीय मुद्दों पर त्वरित प्रतिक्रिया और लोगों के बीच सहज उपस्थिति ने उनकी स्वीकार्यता बढ़ाई है... विरोधियों के प्रति उनका रवैया भी दिलचस्प है... व्यक्तिगत कटुता से दूर रहते हुए भी कांग्रेस पर राजनीतिक हमला करने का कोई अवसर वे छोड़ते नहीं हैं... जब मंच राजनीतिक हो तो उनका आक्रामक रूप सामने आता है... लेकिन गैर-राजनीतिक मंचों पर वही नेता संस्कृति... समाज और विकास की बात करता दिखाई देता है... ढाई साल में उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी अपनी अलग पहचान बनाई है... अधिकारियों को केवल वल्लभ भवन तक सीमित न रहने की सलाह हो या जिलों में लगातार फील्ड विजिट की अपेक्षा... उन्होंने प्रशासन को जमीन से जोड़ने का प्रयास किया है... उनका मानना है कि शासन का वास्तविक चेहरा राजधानी में नहीं बल्कि गांव... कस्बों और जिलों में दिखाई देता है... राजनीतिक दृष्टि से भी डॉ. मोहन यादव अब पहले से कहीं अधिक मजबूत दिखाई देते हैं... दिल्ली में उनकी स्वीकार्यता और संवाद क्षमता लगातार बढ़ी है... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी... गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा नेतृत्व के साथ उनका तालमेल राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय रहा है... यही कारण है कि कई बड़े निर्णयों और कार्यक्रमों में मध्य प्रदेश को अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिलता दिखाई देता है... दिल्ली और भोपाल के बीच बेहतर समन्वय उनकी राजनीतिक ताकत माना जाता है... भाजपा संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने की उनकी क्षमता ने भी उन्हें मजबूत किया है... शायद यही वजह है कि ढाई साल बाद भी उनके नेतृत्व को लेकर किसी प्रकार की असहजता दिखाई नहीं देती... सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं माना... उन्होंने इसे सांस्कृतिक और वैचारिक नेतृत्व का अवसर भी बनाया... महाकाल... उज्जैन... सिंहस्थ... धार्मिक पर्यटन... सांस्कृतिक धरोहर और जनजातीय गौरव जैसे विषयों को उन्होंने शासन की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है... आज के डॉ. मोहन यादव को देखकर यह कहना कठिन नहीं कि वे केवल सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नहीं हैं... वे एक ऐसी राजनीतिक शैली गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें विकास के साथ संस्कृति... प्रशासन के साथ संवेदना... और राजनीति के साथ वैचारिक प्रतिबद्धता भी शामिल हो... ढाई साल बाद उनका व्यक्तित्व पहले से अधिक परिपक्व... आत्मविश्वासी और प्रभावशाली दिखाई देता है... मुस्कुराहट अब भी वही है... सहजता भी वही है... लेकिन उसके पीछे अनुभव का वजन और नेतृत्व का आत्मविश्वास साफ दिखाई देता है... शायद यही वजह है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में आज डॉ. मोहन यादव केवल एक मुख्यमंत्री नहीं... बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नई अभिव्यक्ति... संगठन और सरकार के बीच समन्वय का नया मॉडल... और भाजपा की उभरती पीढ़ी के उन नेताओं में शुमार हैं जो सत्ता को केवल प्रशासन नहीं बल्कि विचार और विरासत के विस्तार का माध्यम मानते हैं...। (संस्कृति से संवाद... संवाद से सरोकार... सरोकार से समाज...) मध्य प्रदेश की राजनीति में डॉ. मोहन यादव केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि संस्कृति, संस्कार और सामाजिक चेतना के ऐसे संवाहक के रूप में उभरे हैं, जिनकी पहचान सत्ता से अधिक विचारों और वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ती दिखाई देती है। उनकी राजनीति में धर्म से दर्शन... दर्शन से दिशा... और दिशा से विकास का स्पष्ट सूत्र दिखाई देता है। उज्जैन की पावन परंपरा से निकले डॉ. यादव के व्यक्तित्व में महाकाल का महात्म्य... महर्षियों का मंथन... और मातृभूमि के प्रति समर्पण सहज रूप से दिखाई देता है। वेदों का विमर्श... पुराणों का परिप्रेक्ष्य... इतिहास का गौरव और पौराणिक प्रसंगों का संदर्भ उनके सार्वजनिक जीवन और भाषणों में बार-बार दिखाई देता है। यह केवल ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन में उन मूल्यों को आत्मसात करने का प्रयास भी है। संवाद से समझ... समझ से संवेदना... और संवेदना से समन्वय—शायद यही उनकी कार्यशैली का सबसे सशक्त पक्ष है। वे विकास की बात करते हैं तो उसके साथ विरासत को जोड़ते हैं... आधुनिकता की चर्चा करते हैं तो परंपरा को साथ रखते हैं... और शासन की प्राथमिकताओं में सामाजिक सरोकारों को भी स्थान देते हैं। इस विशेष संवाद से यह स्पष्ट होता है कि डॉ. मोहन यादव के लिए राजनीति केवल पद और प्रशासन का विषय नहीं है... बल्कि संस्कृति का संरक्षण... समाज का सशक्तीकरण... और सनातन मूल्यों का संवर्धन भी उतना ही महत्वपूर्ण है.. यही सोच उन्हें एक अलग पहचान देती है... और यही पहचान उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि विचार, विरासत और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतिनिधि चेहरे के रूप में स्थापित करती है..

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