क्या मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव मध्य प्रदेश को 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'की राजधानी बनाने की ओर अग्रसर है.. बात पते की (महेंद्र विश्वकर्मा)

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क्या मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव मध्य प्रदेश को 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'की राजधानी बनाने की ओर अग्रसर है.. बात पते की (महेंद्र विश्वकर्मा)

✅ उज्जैन से काशी, हरसिद्धि माता से बड़नगर और सिंहस्थ से मोदी के विजन 2047 तक... क्या यह केवल शासन नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना है... मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का हालिया संवाद केवल सरकार की उपलब्धियों का ब्यौरा नहीं था... उसमें एक ऐसे राजनीतिक-सांस्कृतिक विजन की झलक दिखाई देती है जो उन्हें पारंपरिक मुख्यमंत्री की भूमिका से अलग खड़ा करता है... दिलचस्प यह है कि उनके उत्तरों में रोजमर्रा की राजनीति, विपक्ष पर हमले या चुनावी गणित से अधिक स्थान संस्कृति, विरासत, तीर्थ, धार्मिक अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और 2047 की दीर्घकालिक कल्पना को मिला... यही वह बिंदु है जहां डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली का विश्लेषण आवश्यक हो जाता है... मध्य प्रदेश लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक प्रयोगशाला माना जाता रहा है... जनसंघ के दौर से लेकर आज तक यहां अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक प्रयोग हुए हैं... लेकिन मोहन यादव का दृष्टिकोण केवल हिंदुत्व की राजनीतिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं दिखता... वे उसे सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति में बदलने की कोशिश करते नजर आते हैं...इसका सबसे बड़ा उदाहरण उज्जैन और महाकाल लोक से आगे बढ़ती उनकी सोच है...उज्जैन की पहचान केवल महाकाल मंदिर तक सीमित नहीं है... मुख्यमंत्री लगातार उज्जैन की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, विक्रम संवत, वैदिक परंपरा, कालगणना, सिंहस्थ और धार्मिक पर्यटन को एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं... वैदिक घड़ी का काशी विश्वनाथ तक पहुंचना और फिर उसे देश के अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों तक ले जाने की बात इसी सोच का हिस्सा है... यहीं एक रोचक सांस्कृतिक प्रसंग भी जुड़ता है... उज्जैन की सिद्धि माता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैतृक क्षेत्र गुजरात के बड़नगर का धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध वर्षों से चर्चा का विषय रहा है... इतिहास और लोक परंपराओं में दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संपर्क के अनेक उल्लेख मिलते हैं... जब मुख्यमंत्री उज्जैन को केवल एक धार्मिक नगर नहीं बल्कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक धुरी के रूप में स्थापित करने की बात करते हैं... तो यह प्रयास कहीं न कहीं उन ऐतिहासिक सूत्रों को भी पुनर्जीवित करता दिखाई देता है जो उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत को साझा सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं... मोहन यादव की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उनका आत्मचिंतन भी है... इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि पीछे मुड़कर देखते हैं तो बहुत काम हुआ लगता है... लेकिन आगे देखते हैं तो लगता है कि अभी कुछ हुआ ही नहीं... यह कथन सामान्य राजनीतिक संतोष का नहीं बल्कि दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित करने वाली मानसिकता का संकेत देता है... 2047 तक प्रति व्यक्ति आय को 22 लाख 50 हजार रुपये तक ले जाने की बात हो... कृषि और दुग्ध उत्पादन में बड़े लक्ष्य हों... या धार्मिक पर्यटन के माध्यम से अर्थव्यवस्था को गति देने की रणनीति... इन सबमें एक साझा सूत्र दिखाई देता है... वह सूत्र है विकास और संस्कृति को एक साथ आगे बढ़ाना... यही कारण है कि सिंहस्थ 2028 को लेकर उनकी तैयारियां भी सामान्य नहीं हैं... सरकार केवल आयोजन नहीं देख रही... बल्कि प्रयागराज, काशी, वैष्णो देवी और अन्य बड़े धार्मिक आयोजनों के मॉडल का अध्ययन कर रही है... इसका उद्देश्य स्पष्ट है... उज्जैन को वैश्विक धार्मिक आयोजन की स्थायी पहचान देना... राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह भाजपा के लिए भी महत्वपूर्ण रणनीति बन सकती है... पिछले एक दशक में भाजपा ने कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लाभार्थी वर्ग का बड़ा आधार तैयार किया है... लेकिन मोहन यादव जिस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं... वह सामाजिक योजनाओं से अलग एक सांस्कृतिक जुड़ाव वाला वर्ग तैयार करने की कोशिश प्रतीत होती है... ऐसा वर्ग जो केवल सरकारी योजनाओं से नहीं... बल्कि सांस्कृतिक गौरव, धार्मिक पहचान, विरासत संरक्षण और सभ्यतागत चेतना के आधार पर राजनीतिक रूप से जुड़ता है... यह वही क्षेत्र है जहां संघ की वैचारिक सोच और भाजपा की राजनीतिक रणनीति एक-दूसरे की पूरक बनती दिखाई देती हैं... हालांकि इस मॉडल की सफलता केवल प्रतीकों से तय नहीं होगी... इसके लिए धार्मिक पर्यटन को रोजगार, निवेश, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आधारभूत संरचना से जोड़ना होगा... यदि उज्जैन, ओंकारेश्वर, चित्रकूट, अमरकंटक, दतिया, सलकनपुर और अन्य तीर्थ क्षेत्रों में विकास के नए मॉडल खड़े होते हैं... तो मध्य प्रदेश देश के सांस्कृतिक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान बना सकता है... डॉ. मोहन यादव के उत्तरों से एक बात स्पष्ट रूप से उभरती है... वे स्वयं को केवल पांच वर्ष के कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते... वे एक ऐसी दीर्घकालिक सांस्कृतिक-आर्थिक परियोजना के वाहक बनना चाहते हैं जिसमें मध्य प्रदेश विकास, आस्था, विरासत और राष्ट्रीय पहचान के संगम के रूप में उभरे... बड़ा सवाल अब यही है... क्या मोहन यादव का यह सांस्कृतिक विकास मॉडल मध्य प्रदेश को नई दिशा देगा... या फिर यह केवल एक महत्वाकांक्षी वैचारिक प्रयोग बनकर रह जाएगा... आने वाले वर्षों में सिंहस्थ 2028 और 2047 के लक्ष्यों की दिशा में उठने वाले कदम ही इसका उत्तर तय करेंगे...।

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