महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिरा, बहुमत की कमी से मोदी सरकार की बड़ी हार

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महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिरा, बहुमत की कमी से मोदी सरकार की बड़ी हार

लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल गिरा, बहुमत जुटाने में नाकाम रही सरकार

संसद के निचले सदन लोकसभा में महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने की कोशिश विफल रही। सदन में हुई वोटिंग के दौरान इस बिल के पक्ष में 298 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में वोट डाला। चूंकि यह एक संविधान संशोधन विधेयक था, इसलिए इसे पारित करने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी।

बहुमत के आंकड़े से पीछे रही सरकार

सदन में कुल 489 सांसदों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया। इस संख्या के आधार पर विधेयक को पास कराने के लिए कम से कम 326 वोटों की जरूरत थी, लेकिन सरकार केवल 298 वोट ही जुटा पाई। इस तरह यह बिल 28 वोटों के अंतर से गिर गया। 11 साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर है जब केंद्र सरकार सदन में अपना कोई विधेयक पारित कराने में असफल रही है।

सदन में तीखी बहस और आरोप-प्रत्यारोप

वोटिंग से पहले सदन में करीब 21 घंटे तक लंबी चर्चा चली, जिसमें 130 सांसदों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि यह बिल महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए जरूरी है और इसके लागू होने से 2029 के चुनावों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। दूसरी ओर, विपक्ष ने इसके वर्तमान स्वरूप पर कई आपत्तियां जताईं।

विपक्ष की मांगें और आपत्तियां

विपक्ष ने विधेयक में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए अलग से उप-आरक्षण और तुरंत जाति जनगणना कराने की मांग की। विपक्षी नेताओं का तर्क था कि बिना जनगणना और ओबीसी कोटे के यह बिल अधूरा है। वहीं, दक्षिण भारतीय राज्यों से आने वाले सांसदों ने आशंका जताई कि नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से भविष्य में संसद के भीतर उनके राज्यों की सीटों का अनुपात प्रभावित हो सकता है।

विधेयक गिरने के बाद अब महिला आरक्षण के भविष्य को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। जहां सत्ता पक्ष ने इसे ऐतिहासिक अवसर खोना बताया है, वहीं विपक्ष इसे अपनी एकजुटता की जीत और सरकार की नीतियों की विफलता करार दे रहा है।

L. N. Bhargava