ओरछा से भाजपा का' पृथक बुंदेलखंड' से साफ इनकार) (रामराजा सरकार के दरबार से ये पार्टी लाइन क्या बनेगा चुनावी मुद्दा)✅ राकेश अग्निहोत्री (सवाल दर सवाल)*

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ओरछा से भाजपा का' पृथक बुंदेलखंड' से साफ इनकार) (रामराजा सरकार के दरबार से ये पार्टी लाइन  क्या बनेगा चुनावी मुद्दा)✅ राकेश अग्निहोत्री (सवाल दर सवाल)*

(*ओरछा से भाजपा का पृथक बुंदेलखंड से साफ इनकार) ✅ राकेश अग्निहोत्री (सवाल दर सवाल)* (भाजपा प्रदेश कार्य समिति के पहले दिन पार्टी की दो टूक पृथक बुंदेलखंड का सवाल ही खड़ा नहीं होता) ✅✅✅ भाजपा ने पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग पर साफ तौर पर पूर्ण विराम लगा दिया है.. छोटे राज्यों की पक्षधर रही भाजपा, जिसने उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के गठन में निर्णायक भूमिका निभाई, उसी पार्टी ने रामराजा सरकार की नगरी ओरछा में अपने सबसे बड़े प्रदेश स्तरीय मंच से अलग बुंदेलखंड की संभावनाओं को खारिज कर दिया.. खास बात यह है कि यह बयान उस वक्त आया, जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य 2028 की रणनीति पर मंथन कर रहे हैं.. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है.. क्या यह भाजपा की स्पष्ट पार्टी लाइन है या जल्दबाजी में दिया गया राजनीतिक जवाब? और अगर पार्टी ने रास्ता बंद कर दिया है तो 2028 के विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड की राजनीति पर इसका असर क्या होगा? अब नजर कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों और सबसे ज्यादा भाजपा की पुरानी पीढ़ी के उन नेताओं पर रहेगी, जो कभी अलग बुंदेलखंड के सवाल पर अपनी राय रखते रहे हैं.. ओरछा से उठे इस स्पष्ट संदेश के बाद क्या बुंदेलखंड की सियासत में नया सवाल खड़ा होगा.. या पुराना मुद्दा हमेशा के लिए राजनीतिक हाशिये पर चला जाएगा..✅ ✅✅ ✅✅✅ ओरछा के रामराजा सरकार के दरबार से मध्य प्रदेश भाजपा ने पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग को लेकर अपनी स्थिति साफ कर दी है.. प्रदेश भाजपा कार्यसमिति के पहले दिन के सत्रों के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी ने कहा कि पृथक बुंदेलखंड राज्य को लेकर ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं उठता है.. खास बात यह रही कि यह जवाब बुंदेलखंड की ही राजनीतिक जमीन से आया और उस वक्त सामने आया जब उनके साथ राज्यसभा सांसद महेश केवट और विधायक अनिल जैन भी मौजूद थे.. यानी ओरछा की कार्यसमिति में जहां भाजपा 2028 के लिए संगठन, बूथ मैनेजमेंट और राजनीतिक रणनीति पर मंथन कर रही है, वहीं इसी बीच अलग बुंदेलखंड राज्य का सवाल उठना और उस पर पार्टी की ओर से तत्काल स्पष्ट जवाब आना अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है.. बुंदेलखंड की धरती पर उठे सवाल का सीधा जवाब पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग कोई नया राजनीतिक मुद्दा नहीं है.. मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र को मिलाकर अलग राज्य की मांग लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक मंचों से उठती रही है.. कभी यह मांग आंदोलन का रूप लेती है तो कभी चुनावी राजनीति में इसका उल्लेख दिखाई देता है.. बुंदेलखंड के पिछड़ेपन, पानी, रोजगार, सिंचाई, पलायन और विकास के असमान अवसरों को अलग राज्य की मांग के आधार के तौर पर सामने रखा जाता रहा है.. इस मुद्दे से भाजपा के कई नेता भी अलग-अलग समय पर भावनात्मक रूप से जुड़े रहे हैं.. ऐसे में ओरछा जैसे बुंदेलखंड के सबसे बड़े सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीक स्थल से भाजपा की ओर से यह कहना कि अलग बुंदेलखंड राज्य का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया से कहीं ज्यादा स्पष्ट पार्टी लाइन के रूप में देखा जा सकता है.. छोटे राज्यों की पक्षधर भाजपा, फिर बुंदेलखंड पर दूरी क्यों? इस बयान का सबसे दिलचस्प पहलू भाजपा की पुरानी राजनीतिक स्थिति से जुड़ा है.. भाजपा ने अतीत में छोटे राज्यों के गठन का समर्थन किया है.. उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के गठन की राजनीति में भाजपा की महत्वपूर्ण भूमिका रही.. मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद भी नए राज्यों के अनुभव को पार्टी की राजनीतिक यात्रा का हिस्सा माना जाता है.. लेकिन बुंदेलखंड का मामला अलग है.. यहां सवाल केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की राजनीति, क्षेत्रीय पहचान और विकास की राजनीति से भी जुड़ा है.. यही वजह है कि राहुल कोठारी का बयान पार्टी की मौजूदा प्राथमिकताओं को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेत देता है.. भाजपा फिलहाल बुंदेलखंड को अलग राज्य के सवाल से नहीं, बल्कि मौजूदा मध्य प्रदेश के भीतर विकास और संगठनात्मक मजबूती के एजेंडे से जोड़कर देखना चाहती दिखाई दे रही है.. ओरछा का चुनाव भी संदेश से कम नहीं भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के लिए ओरछा का चयन केवल धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर नहीं देखा जा सकता.. यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा के निकट बुंदेलखंड की राजनीतिक धुरी है.. रामराजा सरकार की नगरी में प्रदेश भाजपा का पूरा संगठन जुटा है.. ऐसे समय पृथक बुंदेलखंड पर सवाल उठना और उसी मंच के बाद पार्टी के प्रदेश महामंत्री का स्पष्ट जवाब देना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है.. भाजपा का संदेश फिलहाल यह दिखता है कि बुंदेलखंड पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अलग राज्य के रूप में नहीं.. मध्य प्रदेश के राजनीतिक भूगोल के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में। मोहन-हेमंत की भाजपा का बुंदेलखंड फॉर्मूला? मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में भाजपा के सामने 2028 की तैयारी है.. बुंदेलखंड में भाजपा का राजनीतिक आधार मजबूत रहा है, लेकिन क्षेत्र की अपनी समस्याएं भी हैं.. पानी, सिंचाई, रोजगार, सड़क, धार्मिक पर्यटन और निवेश जैसे मुद्दे यहां राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं.. ऐसे में अलग राज्य की मांग को हवा देने के बजाय भाजपा संभवतः यह संदेश देना चाहती है कि बुंदेलखंड की समस्याओं का समाधान मध्य प्रदेश की मौजूदा सत्ता और संगठनात्मक ढांचे के भीतर किया जाएगा। यह रणनीति राजनीतिक रूप से इसलिए भी अहम है क्योंकि पृथक राज्य की मांग को यदि क्षेत्रीय असंतोष से जोड़ा जाता है तो विपक्ष को नया मुद्दा मिल सकता है.. भाजपा इसके बजाय विकास के एजेंडे को सामने रखकर क्षेत्रीय भावनाओं को साधना चाहती है.. उमा भारती के संदर्भ में भी बयान महत्वपूर्ण पृथक बुंदेलखंड का सवाल भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की राजनीति के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो जाता है.. उमा का बुंदेलखंड से गहरा राजनीतिक और भावनात्मक रिश्ता रहा है.. वह समय-समय पर क्षेत्र के विकास, पानी और बुंदेलखंड की समस्याओं को लेकर मुखर रही हैं.. ऐसे में एक तरफ उमा भारती का हालिया बुंदेलखंड दौरा, ओरछा में रामराजा सरकार के दर्शन और झांसी से उनका बेबाक राजनीतिक बयान.. दूसरी तरफ भाजपा कार्यसमिति से पृथक बुंदेलखंड पर साफ इनकार.. इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखने पर बुंदेलखंड की राजनीति का बदलता विमर्श दिखाई देता है.. हालांकि इसे उमा भारती के बयान या उनकी राजनीति से जोड़ना जल्दबाजी होगी.. लेकिन इतना जरूर है कि बुंदेलखंड की पहचान, विकास और राजनीतिक भविष्य को लेकर भाजपा का संस्थागत रुख अब पहले से अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। क्या 2028 में बनेगा यह मुद्दा? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पृथक बुंदेलखंड की मांग आने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक मुद्दा बन सकती है.. राहुल कोठारी का बयान फिलहाल इस संभावना को भाजपा की तरफ से बंद करता दिखाई देता है.. लेकिन राजनीति में किसी मुद्दे का भविष्य केवल पार्टी के बयान से तय नहीं होता.. क्षेत्रीय संगठन, सामाजिक समूह और स्थानीय नेतृत्व भी उसे दिशा देते हैं.. भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि अलग राज्य की मांग को खारिज करने के साथ-साथ वह बुंदेलखंड की उन वास्तविक समस्याओं पर कितना ठोस काम दिखा पाती है, जिनके कारण अलग राज्य की मांग समय-समय पर जन्म लेती रही है.. रामराजा सरकार की नगरी से निकला संदेश फिलहाल साफ है.. बुंदेलखंड भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, बुंदेलखंड की समस्याएं भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग को पार्टी अपनी राजनीतिक प्राथमिकता नहीं मानती.. ओरछा से भाजपा ने एक तरह से लकीर खींच दी है.. बुंदेलखंड रहेगा मध्य प्रदेश का हिस्सा.. अब सवाल यह है कि मोहन-हेमंत की भाजपा इस बुंदेलखंड को 2028 से पहले विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मोर्चे पर क्या देती है..