राज्यसभा में दिग्विजय सिंह के तीखे आरोप, सरकार और संस्थाओं पर सवाल
आरएसएस और अमित शाह की सदस्यता पर विवाद
राज्यसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि अपने आरएसएस से जुड़े मित्रों से जानकारी लेने पर उन्हें बताया गया कि अमित शाह कभी आरएसएस में नहीं रहे।
दिग्विजय सिंह ने यह भी पूछा कि आरएसएस एनजीओ के रूप में पंजीकृत है या नहीं। उन्होंने कहा कि अगर वह पंजीकृत नहीं है, तो प्रधानमंत्री लाल किले से इसे दुनिया का सबसे लोकप्रिय एनजीओ बताते हैं, जिस पर कोई कानून लागू नहीं होता और जिसकी कोई आधिकारिक सदस्यता व्यवस्था नहीं है। गुरु दक्षिणा के माध्यम से आने वाले पैसों पर भी उन्होंने सवाल उठाया और पूछा कि यह धन किस खाते में जाता है।
कानून मंत्री का जवाब और अमित शाह का संघ संबंध
दिग्विजय सिंह के आरोपों पर केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि अमित शाह संसद में खुद कह चुके हैं कि वह 21 वर्ष की उम्र से नारे लगाते रहे हैं। मेघवाल ने कहा कि संघ में जो व्यक्ति एक बार भी शाखा में ध्वज प्रणाम कर लेता है, उसे संघ का सदस्य माना जाता है और अमित शाह ने यही बात कही थी।
चुनाव आयोग पर पक्षपात और पत्रों की अनदेखी का आरोप
दिग्विजय सिंह ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार उन्होंने और उनके सहयोगियों ने आयोग को कुल 21 याचिकाएं और कई पत्र भेजे, जिन पर संज्ञान नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि सितंबर 2024 में भेजे गए पत्रों सहित सभी दस्तावेज वे सदन के पटल पर रख रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने गृह मंत्री को गुमराह कर गलत बयान दिलवाया।
उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या चुनाव आयोग गृह मंत्री को गुमराह कर रहा है या गृह मंत्री संसद और जनता को। दिग्विजय के अनुसार इंडिया गठबंधन के नेताओं, जिनमें नीतीश कुमार भी शामिल थे, ने आयोग से मिलने का समय मांगा, लेकिन उन्हें समय और पावती तक नहीं दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि यह स्थिति पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के पद संभालने के बाद बनी।
संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे और फासिस्ट डिक्टेटरशिप का आरोप
दिग्विजय सिंह ने कहा कि 2014 के बाद से संवैधानिक संस्थाओं में एक खास विचारधारा के लोगों की नियुक्ति की जा रही है, चाहे वे योग्य हों या नहीं। उनके मुताबिक, इसके माध्यम से फासिस्ट डिक्टेटरशिप लागू करने की कोशिश हो रही है और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसका उदाहरण बताया।
उन्होंने हिटलर और मुसोलिनी का हवाला देते हुए कहा कि वे भी चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे और बाद में संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर फासिस्ट शासन स्थापित किया। दिग्विजय ने रूस के व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के किम जोंग उन का भी उल्लेख किया और कहा कि वे भी चुनाव जीतने का दावा करते हैं, लेकिन ऐसी ही प्रक्रिया भारत में दिख रही है। उन्होंने कहा कि अपने 50 साल के राजनीतिक अनुभव में उन्होंने किसी दल का 90 प्रतिशत वोट स्ट्राइक रेट नहीं देखा।
वोटर सूची, एसआईआर और नागरिकता पर सवाल
दिग्विजय सिंह ने मतदाता सूची और एसआईआर (स्पेशल समरी रिवीजन) प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार एक सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए त्रुटिहीन मतदाता सूची आवश्यक है और संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को यह जिम्मेदारी देता है। पहले बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर फॉर्म भरते थे, लेकिन अब एसआईआर के नाम पर नागरिकता से जुड़े सवाल पूछे जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि लोगों से उनके पिता-दादा के नाम मतदाता सूची में होने के प्रमाण और मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट तक मांगे जा रहे हैं, जबकि कई परिवारों में किसी ने मैट्रिकुलेशन नहीं किया। उन्होंने इसे नागरिकता चयन की तरह बताया, न कि सिर्फ मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया।
दिग्विजय ने कहा कि जब साल में चार बार समरी रिवीजन होता है तो अलग से एसआईआर की जरूरत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज की आरटीआई के जवाब में चुनाव आयोग ने एसआईआर 2025 के संबंध में फाइल पर किसी आदेश के न होने की बात कही। दूसरी आरटीआई में बिहार में एसआईआर पर भी ऐसा ही जवाब दिया गया।
वोट चोरी, डुप्लीकेट नाम और सॉफ़्टवेयर बंद करने का आरोप
दिग्विजय सिंह ने कहा कि कई राज्यों में वोट चोरी के प्रमाण सामने आए हैं और एक व्यक्ति के नाम कई जगह मतदाता सूची में दर्ज पाए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के जरिए मिनटों में ऐसे नामों की पहचान हो सकती है, लेकिन जब यह मामला सामने आया तो चुनाव आयोग ने उस सॉफ्टवेयर का उपयोग ही बंद कर दिया। उनके मुताबिक, यह कदम पक्षपात को दर्शाता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि जिस दिन चुनाव की घोषणा हो, उसी दिन मतदाता सूची को फ्रीज कर देना चाहिए ताकि मतदान के दिन तक नाम जोड़ने और हटाने की गुंजाइश न रहे।
मॉडल आचार संहिता, दल-बदल और प्रतीकों पर सवाल
दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के लागू करने में पक्षपात हो रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा धार्मिक संदर्भों और विभाजनकारी मुद्दों का उपयोग आचार संहिता के दायरे में आता है, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं की गई।
उन्होंने पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट मांगने, महाराष्ट्र में दल बदल के मामलों, शिवसेना और एनसीपी के चुनाव चिह्नों के आवंटन और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के मामले का उल्लेख करते हुए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
दिग्विजय ने कहा कि डायरेक्ट कैश बेनीफिट ट्रांसफर योजनाओं पर चुनाव आयोग का रवैया भी असंगत रहा है। तेलंगाना और तमिलनाडु में चुनाव के दौरान ऐसी योजनाओं पर रोक लगी, जबकि बिहार में मतदान के दिन तक पैसा बांटा गया। उन्होंने एंटी-डिफेक्शन कानून के सख्त पालन और दल बदल करने वाले जनप्रतिनिधियों पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक की मांग की।
चुनावी खर्च, मनी पॉवर और राजनीतिक फंडिंग
दिग्विजय सिंह ने चुनावी खर्च की सीमा और मनी पावर पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि आधिकारिक सीमा 70 लाख रुपये है, लेकिन किसी भी लोकसभा चुनाव का खर्च इतने में संभव नहीं है और इस कारण उम्मीदवारों को, उनके अनुसार नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित, झूठे प्रमाण देने पड़ते हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि चुनावी खर्च की सीलिंग हटाई जाए, सुपर रिच टैक्स लगाया जाए और नेशनल इलेक्शन फंड बनाया जाए, जिसमें प्राप्त वोट प्रतिशत के आधार पर पार्टियों को धन वितरित किया जाए।
ईवीएम, वीवीपैट और बैलेट पेपर पर बहस
दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर ईवीएम पर अविश्वास दोहराया और कहा कि वह बैलेट पेपर के पक्षधर हैं। हालांकि, उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि ईवीएम जारी रखना ही है तो वीवीपैट की पर्ची मतदाता के हाथ में दी जाए, ताकि वह उसे देखकर खुद डब्बे में डाल सके और उसकी गिनती हो सके।
उन्होंने वीवीपैट की 100 प्रतिशत काउंटिंग की मांग की और कहा कि इसके लिए समय अधिक नहीं लगेगा। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने दावा किया कि पर्याप्त काउंटिंग टेबल बढ़ाने पर कुछ घंटों में पूरी गिनती संभव है।
वन नेशन वन इलेक्शन और डिलिमिटेशन पर आपत्ति
वन नेशन वन इलेक्शन के प्रस्ताव को दिग्विजय सिंह ने भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ बताया। उनके अनुसार, भारत की ताकत विविधता में एकता है और एक साथ चुनाव कराना फास्टेस्ट डिक्टेटरशिप की राह खोल सकता है।
डिलिमिटेशन पर उन्होंने कहा कि उत्तर और दक्षिण भारत के जनसंख्या अंतर के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, डिलिमिटेशन मौजूदा उत्तर-दक्षिण सीट अनुपात को बनाए रखते हुए किया जाना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित न हो।
निष्कर्ष
राज्यसभा की इस चर्चा में दिग्विजय सिंह ने आरएसएस, सरकार, चुनाव आयोग, चुनावी प्रक्रियाओं और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर व्यापक और कड़े सवाल उठाए। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने अमित शाह के संघ संबंध पर उनका जवाब दिया, लेकिन दिग्विजय के संस्थागत और प्रक्रियागत आरोपों पर बहस आगे बढ़ी, जिससे चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया।
Pushpendra Chaubey