लोकसभा में SIR विवाद पर शाह बनाम राहुल टकराव

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लोकसभा में SIR विवाद पर शाह बनाम राहुल टकराव

लोकसभा में SIR, चुनाव आयोग और CCTV फुटेज पर तीखी बहस

लोकसभा में चुनाव सुधार, SIR और कथित वोट चोरी पर हो रही चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच जोरदार राजनीतिक टकराव देखने को मिला। शाह ने राहुल गांधी के तीन मुख्य सवालों का विस्तार से जवाब देते हुए विपक्ष के आरोपों को तथ्यहीन करार दिया।

चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सरकार की सफाई

राहुल गांधी ने सवाल उठाया था कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की समिति से मुख्य न्यायाधीश को क्यों हटाया गया। इसके जवाब में अमित शाह ने कहा कि 73 साल तक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कोई विशेष कानून ही नहीं था और सीधे प्रधानमंत्री ही नियुक्ति किया करते थे।

उन्होंने बताया कि 1950 से 1989 तक एकल चुनाव आयुक्त की व्यवस्था थी और उस दौरान भी नियुक्ति प्रधानमंत्री के माध्यम से हुई। बाद में जब तीन सदस्यीय आयोग बना, तब भी चुनाव आयुक्त प्रधानमंत्री की सिफारिश पर चुने जाते रहे। इस दौरान 21 आयुक्तों की नियुक्ति हुई।

शाह ने कहा कि 2023 तक चयन की प्रक्रिया को लेकर कोई विधायी प्रावधान नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता की बात उठाई, जिसके बाद सरकार ने अदालत की निगरानी में प्रक्रिया चलने पर सहमति दी और फिर नया कानून बनाया गया।

CCTV फुटेज 45 दिन बाद नष्ट करने पर विवाद

दूसरा सवाल राहुल गांधी ने 45 दिन बाद चुनाव आयोग द्वारा CCTV फुटेज नष्ट करने पर उठाया। शाह ने इसका जवाब देते हुए कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1991 के तहत चुनाव नतीजों को 45 दिन के भीतर ही चुनौती दी जा सकती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जब यह कानून बना था तब CCTV की व्यवस्था अस्तित्व में नहीं थी, बाद में चुनाव आयोग ने एक सर्कुलर जारी कर CCTV फुटेज को भी इसी 45 दिन की समय-सीमा से जोड़ दिया। शाह के अनुसार CCTV रिकॉर्डिंग कोई संवैधानिक दस्तावेज नहीं बल्कि आंतरिक प्रबंधन का हिस्सा है।

गृहमंत्री ने कहा कि यदि 45 दिन के भीतर कोई उम्मीदवार या पक्ष परिणाम को अदालत में चुनौती देता है, तो न्यायालय चुनाव आयोग को फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दे सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक एजेंट 45 दिन के भीतर अदालत के माध्यम से फुटेज की मांग कर सकता है।

अमित शाह ने आरोप लगाया कि जो लोग राहुल गांधी का भाषण तैयार करते हैं, वे प्रक्रियाओं का ठीक से अध्ययन नहीं करते और बिना पूरी जानकारी के सवाल खड़े करते हैं।

चुनाव आयुक्त को इम्यूनिटी पर कानून में बदलाव का मुद्दा

तीसरा सवाल राहुल गांधी ने दिसंबर 2023 के उस कानून पर उठाया, जिसमें कथित तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त को दंड से छूट देने की बात कही गई थी। शाह ने विपक्ष के इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि 2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 से अधिक कोई नई सुरक्षा नहीं दी गई है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि पहले से ही प्रावधान था कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर उनके आधिकारिक कार्यों को लेकर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और यही व्यवस्था नए कानून में भी बरकरार है, इसमें कोई अतिरिक्त इम्यूनिटी जोड़ी नहीं गई है।

SIR पर लंबी बहस और सदन में हंगामा

लोकसभा में SIR (स्पेशल समरी रिवीजन) और चुनाव सुधार पर दो दिनों से व्यापक चर्चा चल रही थी। 9 दिसंबर को राहुल गांधी ने अपने 28 मिनट के भाषण में आरोप लगाया था कि भाजपा और आरएसएस देश की संस्थाओं, खासकर चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, आईबी और इनकम टैक्स विभाग पर कब्जा कर रही हैं और चुनाव आयोग को नियंत्रित किया जा रहा है।

10 दिसंबर को अमित शाह के जवाबी भाषण के दौरान सदन में जोरदार हंगामा हुआ। राहुल गांधी और अमित शाह के बीच तीखी नोकझोंक हुई, राहुल ने गृहमंत्री को खुली बहस की चुनौती दी। टकराव बढ़ने पर कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों ने सदन से बहिर्गमन कर दिया।

विपक्ष के दबाव के बाद SIR पर चर्चा की सहमति

संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष SIR और कथित वोट चोरी पर विस्तृत चर्चा की मांग कर रहा था। सत्र के पहले दो दिनों में लगातार हंगामे के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने 2 दिसंबर को सरकार और विपक्ष के नेताओं से अलग-अलग बैठकों में बात की।

इन बातचीत के बाद 9 दिसंबर को लोकसभा में SIR पर 10 घंटे की विशेष चर्चा के लिए सहमति बनी, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपने तर्क रखने का मौका दिया गया।

SIR प्रक्रिया क्या है?

SIR चुनाव आयोग की एक औपचारिक प्रक्रिया है, जिसमें वोटर सूची को समय-समय पर अपडेट किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान 18 वर्ष से अधिक आयु के नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, जबकि जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है या जो अन्य स्थान पर स्थानांतरित हो गए हैं, उनके नाम सूची से हटाए जाते हैं।

इसके अलावा मतदाता सूची में दर्ज नाम, पते या अन्य विवरणों में हुई त्रुटियों को भी सुधारा जाता है। इस काम के लिए बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर मतदाताओं से फॉर्म भरवाते हैं और जानकारी एकत्रित करते हैं।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, लोकसभा में हुई इस बहस ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, पारदर्शिता, CCTV फुटेज की सुरक्षा और SIR जैसी प्रक्रियाओं पर जारी राजनीतिक मतभेदों को फिर से सामने ला दिया। सरकार का पक्ष है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के सुझावों के बाद कानून बनाकर प्रणाली को अधिक स्पष्ट किया है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि इन बदलावों के जरिए संस्थाओं पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है। अंतिम फैसला जनता की अदालत और लोकतांत्रिक विमर्श पर ही निर्भर करेगा।

L. N. Bhargava