मोहन भागवत संग प्रदीप मिश्रा बोले, संघ शिव की तरह विष पीकर करता है राष्ट्र की रक्षा

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मोहन भागवत संग प्रदीप मिश्रा बोले, संघ शिव की तरह विष पीकर करता है राष्ट्र की रक्षा

सामाजिक सद्भाव बैठक में संघ, समाज और राष्ट्र पर मंथन

कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सामाजिक सद्भाव बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा और मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय सहित विभिन्न वर्गों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में सामाजिक सद्भाव, राष्ट्र निर्माण और हिंदू समाज की एकता जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

प्रथम सत्र की शुरुआत और प्रदीप मिश्रा का संबोधन

कार्यक्रम के प्रथम सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन और भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण से हुई। इसके बाद मंच पर उपस्थित पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने आशीर्वचन में समाज से राष्ट्र तक की सोच को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया।

प्रदीप मिश्रा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना भगवान शिव से करते हुए कहा कि जैसे शिव संपूर्ण सृष्टि के लिए विष पीकर उसकी रक्षा करते हैं, वैसे ही संघ भी प्रतिदिन आरोपों का विष पीकर संयम के साथ राष्ट्रहित में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि प्रश्न केवल यह नहीं है कि अलग-अलग समाज अपने स्तर पर क्या कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि हमने राष्ट्र के लिए क्या किया और राष्ट्र को क्या दिया।

उन्होंने कहा कि जन्म किसी भी जाति में हो, अंततः पहचान हिंदू, सनातनी और भारतीय की ही होती है। उनके अनुसार प्रत्येक भारतीय में राष्ट्रोत्थान और समाजोत्थान की अद्भुत क्षमता निहित है। धर्मांतरण को उन्होंने केवल वर्तमान पीढ़ी ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करने वाला गंभीर षड्यंत्र बताया और समाज से इसके प्रति सजग रहने की अपील की।

ग्रीन महाशिवरात्रि और सामाजिक समरसता का संदेश

अपने संबोधन में पंडित मिश्रा ने ‘ग्रीन महाशिवरात्रि’ जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि घर-घर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा सामाजिक समरसता का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने कहा कि सामाजिक सद्भाव बैठक का मूल उद्देश्य यह है कि व्यक्ति केवल स्वयं नहीं, बल्कि अपने पड़ोसी और व्यापक समाज को साथ लेकर आगे बढ़े।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे लंगर में किसी की जाति नहीं पूछी जाती, वैसे ही राष्ट्र निर्माण के लिए भी सभी को जाति-पंथ से ऊपर उठकर मिलकर कार्य करना चाहिए।

मोहन भागवत का संबोधन: विविधता में एकता और हिंदू समाज का स्वभाव

बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय समाज का स्वभाव रहा है। उन्होंने बताया कि समाज शब्द का अर्थ ही समान गंतव्य की ओर बढ़ने वाला समूह है और भारतीय समाज की कल्पना हमेशा ऐसी ही रही है, जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों स्तरों पर सुखी हो।

डॉ. भागवत ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से यह समझा कि अस्तित्व एक ही है, केवल उसे देखने की दृष्टि अलग-अलग है। इसी से देश और समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार हुई।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून समाज को नियंत्रित तो कर सकता है, लेकिन समाज को वास्तव में चलाने और जोड़े रखने का काम सद्भावना ही करती है। विविधता के बावजूद एकता को भारत की पहचान बताते हुए उन्होंने कहा कि बाहरी रूप से हम भिन्न दिख सकते हैं, लेकिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के स्तर पर हम सभी एक हैं।

डॉ. भागवत ने यह भी कहा कि हिंदू कोई संज्ञा मात्र नहीं, बल्कि एक स्वभाव है, जो मत, पूजा पद्धति या जीवनशैली के आधार पर झगड़ा नहीं करता। उनके अनुसार, समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को यह कहकर अलग दिखाने की कोशिश की गई कि वे भिन्न हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हजारों वर्षों से अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है।

सद्भावना, संवाद और समाज की जिम्मेदारी

सरसंघचालक ने कहा कि संकट के समय ही नहीं, बल्कि हर समय सद्भावना बनाए रखना आवश्यक है। मिलना, संवाद करना और एक-दूसरे के कार्यों को समझना ही सद्भावना की पहली शर्त है। उन्होंने यह संदेश दिया कि जो समर्थ हैं, उन्हें दुर्बलों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए।

बैठक के दौरान यह विचार भी रखा गया कि समाज को केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं आगे बढ़कर सामूहिक प्रयास करने चाहिए।

एक समाज, एक राष्ट्र की दिशा में संकल्प

सामाजिक सद्भाव बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि यह कार्यक्रम किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज से जुड़ा प्रयास है। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि उद्देश्य यही है कि पूरा समाज मिलकर पूरे समाज को बलशाली बनाए और एक समाज, एक राष्ट्र के रूप में दृढ़ता से खड़ा रहे।

Sharad Shrivastava