9 प्रतिशत.. कम मतदान किसके ग्रह बदलेंगे.. दतिया में महिलाओं ने मतदान क्यों कम किया ( सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)

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9 प्रतिशत.. कम मतदान किसके ग्रह बदलेंगे.. दतिया में महिलाओं ने मतदान क्यों कम किया ( सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)

✅सवाल दर सवाल✅ ✅ दतिया उपचुनाव में घटा मतदान... बढ़ा सियासी सस्पेंस भोपाल... चुनावों में केवल मतदान नहीं होता, बल्कि मतदाता का मन भी मतदान करता है... दतिया विधानसभा उपचुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में करीब 9 प्रतिशत कम मतदान ने परिणाम आने से पहले ही राजनीतिक विश्लेषण का नया विषय खड़ा कर दिया है... अधिकृत आंकड़ों में अंतिम अपडेट के साथ मतदान प्रतिशत में कुछ बदलाव संभव है... सवाल यह है कि यह 9 प्रतिशत आखिर किसका वोट है... किसका समर्थक घर से नहीं निकला... किसने नाराजगी दिखाई... क्या यह भाजपा से नाराज मतदाता था... क्या यह व्यक्तिगत तौर पर नरोत्तम मिश्रा से असंतुष्ट मतदाता था... आखिर किसने चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया... सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यही 9 प्रतिशत किसी एक दल के राजनीतिक ग्रह बदल देगा... ...दतिया का यह उपचुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं रहा... पर्दे के पीछे दो नाम लगातार चर्चा में रहे—पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और भाजपा नेता राजेंद्र भारती... भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी आशुतोष तिवारी और कांग्रेस के घनश्याम सिंह चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन राजनीतिक बहस में उन नेताओं की भूमिका भी केंद्र में रही, जिनका नाम मतपत्र पर नहीं था... ...2023 के विधानसभा चुनाव की याद इसलिए भी ताजा है क्योंकि नरोत्तम मिश्रा लगभग सात हजार वोटों से चुनाव हार गए थे... सवाल यह भी उठ रहा है कि पिछली बार जब मतदान प्रतिशत अधिक था, तब क्या अतिरिक्त मतदाता नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ मतदान करने निकला था... क्या इस बार वही मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा... पिछली हार का सबसे बड़ा कारण शहर का बदला हुआ मतदान व्यवहार माना गया था... लगातार तीन चुनावों तक शहर ने नरोत्तम को जीत दिलाई, जबकि गांवों से उन्हें अपेक्षित बढ़त नहीं मिली... इस बार भी यही सवाल है कि क्या शहर ने फिर नया संदेश दिया है या गांवों ने समीकरण बदल दिए हैं... ...यहीं पर 9 प्रतिशत कम मतदान सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है... चुनावी गणित में केवल कुल मतदान नहीं, बल्कि यह देखना अधिक जरूरी होता है कि मतदान कहां कम हुआ... यदि गिरावट शहर में अधिक है तो उसका अर्थ अलग होगा... यदि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है तो राजनीतिक संदेश अलग निकलेगा... बूथवार आंकड़े सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि मतदान में कमी किस वर्ग, किस इलाके और किस सामाजिक समूह में अधिक रही... महिला और पुरुष मतदाताओं के मतदान प्रतिशत का तुलनात्मक अध्ययन भी महत्वपूर्ण रहेगा... ...यदि पिछली बार लाड़ली बहना योजना के माहौल के बावजूद नरोत्तम मिश्रा चुनाव हार गए थे और इस बार भाजपा उपचुनाव जीत जाती है, तो कई नए राजनीतिक संदेश निकलकर सामने आएंगे... कांग्रेस से अधिक चर्चा भाजपा की इसलिए हो रही है क्योंकि सवाल केवल नरोत्तम का टिकट कटने का नहीं, बल्कि सरकार में रहते हुए पिछली हार से सीख लेकर संगठन को एकजुट रखने और चुनावी बढ़त बनाने का भी है... साथ ही यह भी देखा जाएगा कि भीम आर्मी के दामोदर यादव को मिलने वाले वोट परिणाम को कितना प्रभावित करते हैं... यदि उन्हें उल्लेखनीय संख्या में वोट मिलते हैं, तो चुनावी विश्लेषण का एक अलग आयाम सामने आ सकता है... ...भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से कम और अपने संगठनात्मक मनोबल को बनाए रखने की थी... नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के बाद पार्टी नेतृत्व ने पूरे संगठन को एकजुट करने का प्रयास किया... मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष, वरिष्ठ नेताओं और स्वयं नरोत्तम मिश्रा लगातार प्रचार में सक्रिय रहे... नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से आशुतोष तिवारी को अपना छोटा भाई बताते हुए समर्थन मांगा... इसके बावजूद यह चर्चा बनी रही कि क्या सभी समर्थक पूरी सक्रियता के साथ मतदान तक पहुंचे... ...राजेंद्र भारती का प्रभाव भी चुनावी चर्चा का हिस्सा रहा... ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदान में कमी कहीं उन क्षेत्रों में तो नहीं हुई, जहां व्यक्तिगत नेतृत्व का प्रभाव अधिक माना जाता है... हालांकि केवल मतदान प्रतिशत के आधार पर भीतरघात या क्रॉस वोटिंग का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी... इसका अधिक विश्वसनीय आकलन मतगणना और बूथवार परिणामों के बाद ही संभव होगा... ...कांग्रेस के लिए यह उपचुनाव सत्ता पक्ष को चुनौती देने का अवसर था... उम्मीदवार घनश्याम सिंह की स्थानीय पहचान, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी और अन्य नेताओं की सक्रियता तथा अंतिम दिनों की रैलियों ने मुकाबले को रोचक बनाया... यदि मतदान में कमी भाजपा के परंपरागत समर्थक क्षेत्रों में अधिक हुई है तो कांग्रेस को इसका लाभ मिल सकता है... लेकिन यदि कम मतदान विपक्षी मतदाताओं की उदासीनता का परिणाम है तो तस्वीर बिल्कुल अलग भी हो सकती है... ...इस चुनाव का एक प्रतीकात्मक पक्ष भी चर्चा में है... नरोत्तम मिश्रा ने दतिया में नवग्रह मंदिर के निर्माण के माध्यम से धार्मिक-सांस्कृतिक संदेश दिया था... अब राजनीतिक हलकों में प्रतीकात्मक रूप से यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या उनके राजनीतिक ग्रह अभी पूरी तरह अनुकूल नहीं हुए... यह केवल राजनीतिक रूपक है... इसका वास्तविक उत्तर मतपेटियों से ही निकलेगा... ...चुनावी राजनीति में कम मतदान का कोई एक निश्चित अर्थ नहीं होता... कभी यह सत्ता विरोधी मतदाता की उदासीनता का संकेत होता है तो कभी सत्ता समर्थक मतदाता के आत्मविश्वास का... कई बार स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, संगठन की सक्रियता और अन्य परिस्थितियां भी मतदान प्रतिशत को प्रभावित करती हैं... इसलिए केवल कम मतदान के आधार पर किसी दल के पक्ष या विपक्ष में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा... ...अब सबकी नजर बूथवार मतदान के विश्लेषण और मतगणना पर है... यदि शहर और गांव का मतदान पैटर्न 2023 से अलग निकलता है तो राजनीतिक निष्कर्ष भी बदलेंगे... यदि नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा मजबूत रहती है तो टिकट कटने के बावजूद उनके संगठनात्मक प्रभाव की चर्चा होगी... यदि ऐसा नहीं होता तो भाजपा के भीतर आत्ममंथन की जरूरत महसूस की जा सकती है... दूसरी ओर यदि कांग्रेस सत्ता में रहते भाजपा से यह सीट जीतती है तो उसे बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा... ...फिलहाल इतना तय है कि दतिया उपचुनाव का सबसे बड़ा उम्मीदवार शायद यह 9 प्रतिशत ही बन गया है... परिणाम आने के बाद यही स्पष्ट करेगा कि किस पार्टी के राजनीतिक ग्रह बदले, किसकी रणनीति सफल रही और किसे अपने संगठन तथा चुनावी गणित पर नए सिरे से विचार करना होगा... राजनीति में ग्रह नहीं, जनादेश बदलता है... उसका अंतिम निर्णय मतगणना ही करती है... ✅ बॉक्स दतिया उपचुनाव के 9 कारण... जो परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं ...1. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना। भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला यही रहा। पार्टी ने जो निर्णय लिया, नरोत्तम मिश्रा ने उसका सार्वजनिक रूप से पालन किया, लेकिन समर्थकों की वास्तविक भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे संगठन, कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मनोदशा पर कितना असर पड़ा, यह परिणाम का सबसे बड़ा फैक्टर बन सकता है।.. ...2. उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता। भाजपा के आशुतोष तिवारी और कांग्रेस के घनश्याम सिंह की व्यक्तिगत छवि, जनसंपर्क और स्थानीय समीकरणों ने पार्टी से अलग भी मतदाताओं को प्रभावित किया होगा। वहीं, भीम आर्मी के दामोदर यादव को मिलने वाले वोट भी जीत-हार का अंतर तय कर सकते हैं।.. ...3. 9 प्रतिशत कम मतदान। कम मतदान किस वर्ग, किस क्षेत्र और किस दल के परंपरागत वोटरों में हुआ, यही परिणाम का सबसे बड़ा गणित तय करेगा। बूथवार आंकड़े सामने आने के बाद ही इसकी स्पष्ट तस्वीर मिलेगी।.. ...4. भाजपा का संगठन बनाम कांग्रेस की साइलेंट रणनीति। भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी और मतदान से पहले अंतिम पांच दिनों में चुनाव को बेहद रोचक बना दिया। दूसरी ओर कांग्रेस ने अपेक्षाकृत शांत लेकिन केंद्रित अभियान चलाया, जिसकी झलक अंतिम दिन की रैली में भी दिखाई दी। अब फैसला मतदाता करेगा कि किसकी रणनीति ज्यादा प्रभावी रही।.. ...5. शहर और गांव का मतदान पैटर्न। दतिया में शहर और ग्रामीण क्षेत्रों का मतदान हमेशा अलग-अलग संदेश देता रहा है। इस बार भी दोनों क्षेत्रों का रुझान निर्णायक माना जा रहा है। भाजपा को शहर से बढ़त की उम्मीद है, जबकि कांग्रेस की निगाहें ग्रामीण वोट बैंक पर टिकी हैं।.. ...6. भीतरघात और कार्यकर्ताओं की सक्रियता। चुनाव के दौरान भीतरघात की चर्चाएं दोनों दलों के इर्द-गिर्द रहीं। यदि शहर में भाजपा अपने ही कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता या असंतोष का शिकार हुई है, तो उसका असर परिणाम पर पड़ सकता है। हालांकि इसकी पुष्टि केवल मतगणना के बाद ही होगी।.. ...7. सरकार बनाम सत्ता विरोधी माहौल। भाजपा ने सरकार, विकास और संगठन की मजबूती को चुनावी मुद्दा बनाया, जबकि कांग्रेस ने स्थानीय असंतोष और सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास किया। परिणाम बताएगा कि मतदाता ने किस तर्क को अधिक महत्व दिया।.. ...8. जातीय और सामाजिक समीकरण। ब्राह्मण, अनुसूचित जाति, ओबीसी और ग्रामीण वोट बैंक के समीकरण पूरे चुनाव में दोनों दलों की रणनीति के केंद्र में रहे। इन वर्गों का अंतिम मतदान रुझान परिणाम का निर्णायक आधार बन सकता है।.. ...9. स्टार प्रचारकों का प्रभाव। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी, जयवर्धन सिंह सहित दोनों दलों के दिग्गज नेताओं ने चुनाव प्रचार किया। लेकिन अंततः लोकतंत्र में अंतिम फैसला स्थानीय मतदाता के विश्वास और उसके मतदान व्यवहार से ही तय होता है।.. बॉक्स✅✅ सेंटर बॉक्स✅✅ ✅ बॉक्स✅ (नवग्रह, नौ प्रतिशत और नौ राजनीतिक संकेतों का चुनावी गणित) ... दतिया विधानसभा उपचुनाव में मतदान प्रतिशत में करीब 9 प्रतिशत की गिरावट ने परिणाम आने से पहले ही राजनीतिक विश्लेषण को नई दिशा दे दी है... संयोग यह भी है कि भारतीय परंपरा में नौ अंक का संबंध नवग्रहों से जोड़ा जाता है... राजनीति में इसका कोई ज्योतिषीय आधार नहीं है, लेकिन चुनावी प्रतीकों और संकेतों की अपनी अलग भाषा होती है... ऐसे में दतिया का यह "9 प्रतिशत" कई राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है... ...सूर्य और सत्ता... सूर्य को नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है... भाजपा सरकार में है, इसलिए कम मतदान का पहला राजनीतिक असर उसी के नेतृत्व पर आंका जाएगा... यदि उसके पारंपरिक मतदाता घर से नहीं निकले, तो सत्ता के लिए यह चिंता का विषय होगा... यदि विपक्षी मतदाता निष्क्रिय रहे, तो भाजपा राहत महसूस करेगी... ...चंद्र और मतदाता का मन... मतदान केवल संख्या नहीं, मतदाता की मानसिक स्थिति का भी संकेत होता है... 9 प्रतिशत कम मतदान बताता है कि कहीं न कहीं उत्साह अपेक्षा से कम रहा... अब सवाल यह है कि यह उदासीनता किस खेमे में अधिक थी... इसका उत्तर मतगणना के बाद ही मिलेगा... ...मंगल और संगठन की परीक्षा... भाजपा ने पूरा चुनाव संगठन के दम पर लड़ा... मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता लगातार मैदान में रहे... कांग्रेस ने भी शांत लेकिन लगातार अभियान चलाया... अब कम मतदान यह बताएगा कि किसका संगठन अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में अधिक सफल रहा... ...बुध और चुनावी रणनीति... भाजपा का बूथ प्रबंधन और कांग्रेस की साइलेंट रणनीति दोनों इस चुनाव में चर्चा का विषय रहे... मतदान प्रतिशत में आई गिरावट इस बात का भी संकेत दे सकती है कि किस दल की रणनीति मतदाता तक प्रभावी ढंग से पहुंची और किसकी नहीं... ...गुरु और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका... नरोत्तम मिश्रा, दिग्विजय सिंह, गोपाल भार्गव, कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद सिंह पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पूरे चुनाव में चर्चा के केंद्र में रही... परिणाम यह संकेत देगा कि अनुभव की राजनीति अभी भी निर्णायक है या नई पीढ़ी का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है... ...शुक्र और उम्मीदवार की स्वीकार्यता... भाजपा के आशुतोष तिवारी और कांग्रेस के घनश्याम सिंह की व्यक्तिगत छवि भी इस चुनाव का महत्वपूर्ण पहलू रही... कई बार मतदाता पार्टी से पहले उम्मीदवार को तौलता है... परिणाम बताएगा कि स्थानीय स्वीकार्यता किसके पक्ष में गई... ...शनि और कार्यकर्ता की परीक्षा... टिकट बदलने के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना थी... नरोत्तम मिश्रा लगातार प्रचार करते रहे, लेकिन राजनीतिक गलियारों में भीतरघात की चर्चाएं भी चलती रहीं... इन चर्चाओं की वास्तविकता का आकलन केवल परिणाम और बूथवार रुझानों से ही संभव होगा... ...राहु-केतु और चुनावी भ्रम... चुनाव के दौरान अफवाहें, कयास और राजनीतिक चर्चाएं भी माहौल बनाती हैं... 9 प्रतिशत कम मतदान ने भी ऐसा ही भ्रम पैदा किया है... फिलहाल कोई भी दल यह दावा नहीं कर सकता कि इसका सीधा लाभ उसे मिला है... तस्वीर मतगणना के बाद ही साफ होगी... ...नवग्रह और बदलते राजनीतिक ग्रह... दतिया में नौ अंक महज संयोग हो सकता है, लेकिन राजनीति में संयोग भी कई बार प्रतीक बन जाते हैं... भाजपा के लिए यह अपनी संगठनात्मक ताकत की परीक्षा है, तो कांग्रेस के लिए सत्ता के खिलाफ जनमत को अवसर में बदलने की चुनौती... अंततः ग्रह नहीं, जनता का मत ही राजनीतिक भविष्य तय करेगा... ...निष्कर्ष... दतिया उपचुनाव में 9 प्रतिशत कम मतदान फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक रहस्य बन गया है... यह भाजपा के लिए चेतावनी भी हो सकता है और कांग्रेस के लिए उम्मीद भी... लेकिन अंतिम निष्कर्ष केवल मतगणना और बूथवार विश्लेषण के बाद ही निकलेगा... राजनीति में अच्छे दिन ग्रह नहीं, जनादेश तय करता है...